संदेश

सामयिक रचनाएं लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विरह पर दोहे(प्रयास मात्र)

चित्र
 विरह पर चंद दोहे(प्रयास मात्र) """""""""""""""""""""""""""""""""""""" विरह वेदना बढ़ रही,नयना बरसें नीर।    आत्मा बंदी गात में,कैसे पालें धीर।। """""""""""""""""""""""""""""""""""""" विरह-अग्नि में जल रहा,प्रभु का दिया शरीर। बंदी बनी है आत्मा, कैसे पहुंचें तीर।। """"""""""""""""""""""""""""""""""""""" दुनिया कारागार है,बंदी तन-मन होय। माया में उलझा रहे,सत्य न समझे कोय। """""""...

कल,आज और कल

चित्र
तीक्ष्ण वाणी के प्रहार, झेलता वह मासूम। सुबकता,सिसकता, आंसू पौंछता। खोजता अपने अपराध, शनै-शनै मरता बचपन! आक्रोश का ज्वालामुखी, उसके अंदर लेता आकार। शरीर पर चोटों की मार, बनाती उसे पत्थर! पनपता एक विष-वृक्ष जलती प्रतिशोध की ज्वाला! पी जाती उसकी मासूमियत। वक्त से पहले ही होता बड़ा, समझता शत्रु समाज को, चल पड़ता पाप की राह। कहलाता अपराधी! यही तो होता है, अक्सर मासूमों के साथ, नहीं होती जिनकी मां! होता जिनका अपहरण, वे बेरहम वक्त की चोट से, बन जाते पाषाण! समाज लगता शत्रु सम, लेते प्रतिकार, बस करते जाते वार! बिना सोचे बिना समझे, अंदर की आग! जलाती उन्हें पल-पल, जिसमें जल जाता , कल आज और कल!! अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक

आया चुनाव का मौसम

चित्र
आया चुनाव का मौसम नेता बुन रहे जाल, लोक-लुभावन वादों के बुनते मायाजाल। फैलाए मायाजाल  नित चलते नई चाल, नेताओं की नीतियाँ बनी जी का जंजाल। सत्ता के भूखे जनता का रखें न ख्याल, जनता बेचारी निशदिन होती है हलाल। हाथ जोड़ते फिरते मासूम बना के हाल , वोटो की राजनीति नित करती खड़ा बवाल। सत्ता में आकर नेताजी होते हैं मालामाल, कब लोगे सुधि हमारी जनता पूछे सवाल। अभिलाषा चौहान                  छायाचित्र गूगल से साभार 

सुनसान वादियाँ

चित्र
**(1)** ये वादियाँ, ये लहराते दरख्त, नीले आसमां तले, नीली आभा में ढले, दिखते हैं मायूस, बिखरी नीम खामोशी, बनती है गवाह हर पल की। ये शांत सुरम्य वातावरण, प्रकृति का अनंत सौंदर्य, अनिर्वचनीय, अद्वितीय, बन गया पनाहगार, निर्मम आतंक का। ये सूने मकान, ये दरोदीवार, जीवनोल्लास से रहित, भय से ग्रसित, ये जन्नत !! बन गई कैद खाना, दुबके घरों में लोग, हताश व निराश। छिन गई जीवन की सरलता, हर और दिखती विकलता, प्रकृति में भी नहीं सहजता, जीवन में आ गई दुरूहता।। ****(2)***** प्रकृति की गोद में रचा-बसा मैं आज रोता हूँ अपनी वीरानी पर शहरीकरण ने उजाड़ दिया मुझे छीन लिए मुझसे मेरे अपने जो यहाँ पले-बढ़े वे बन गए सपने नहीं गूंजती यहाँ खिलखिलाहट नहीं होती आने की आहट उजड़ा हुआ मैं अकेला क्या-क्या न मैंने झेला ये दरख्त ये वादियाँ गवाह हैं मेरे दुख की बीते हुए सुख की नीलाभ नभ सी छाई शून्यता मैं अकेलेपन को ताकता किसे भाता है गांव इन दरख्तों की छांव अब न मनती दीवाली होली बस सब है खाली-खाली बचे इक्के-दुक्के लोग मेरी तरह खामोशी रहे भोग। अभिलाषा चौहान

जिन्दगी बेवजह नहीं होती

चित्र
जिन्दगी बेवजह नहीं होती अगर होती तो ये जद्दोजहद न होती आंखों में सिमटी हुई कितनी आशाएं पलकों में बंद जाने कितने सपने कोई तो वजह होगी इनके होने की तभी तो आस जगती है फिर जीने की। भावों का उमड़ता जो तूफान कहीं टूटते-बिखरते हैं जज्बात कहीं कोई हौले-हौले मुस्कराता है कोई छुप-छुप कर आंसू बहाता है कोई तो वजह होगी इनके होने की नफरतों के तूफान भी उमड़ते हैं मेघ स्नेह के भी बरसते हैं लोग मिलते हैं फिर बिछड़ते हैं संबंध बनते हैं फिर बिगड़ते हैं कोई तो वजह होगी इनके होने की आंखें करती किसी का इंतजार सदा नींद नहीं आती है रातों को जरा चुभती शूलों सी ये खामोशी हालत होती है जब दीवानों सी ऐसा बेवजह तो नहीं होता कोई तो वजह होगी ऐसा होने की। अभिलाषा चौहान स्वरचित

विषमता जीवन की

चित्र
ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं के समक्ष बनी ये झुग्गियां विषमता का देती परिचय मारती हैं तमाचा समाज के मुख पर चलता है यहां गरीबी का नंगा नाच भूखे पेट नंगे तन भटकता भारत का भविष्य मांगता जीवन की चंद खुशियां जिंदगी जीने की जद्दोजहद मजदूरी करते मां-बाप दो वक्त की रोटी की चिंता में जूझता जीवन न सुविधा, न शिक्षा न स्वच्छता, न पोषण बस शोषण ही शोषण मारता है तमाचा देश की व्यवस्था पर जो बंद एसी कमरों में बैठकर बनाती भारत के विकास की योजनाएं करके बड़ी - बड़ी बातें जो धरातल पर कम ही होती साकार इसलिए झुग्गियों का हो रहा विस्तार भारत में पनपता एक भारत जीता विषमताओं का जीवन सिसकता बचपन कचरे के ढेर में ढूंढता खुशियां मारता है तमाचा उन समाज के ठेकेदारों पर जो करते समाज-सुधार की बातें बातों से किसी का कहां भला होता है बातों से कहां किसी का पेट भरता है?? अभिलाषा चौहान स्वरचित चित्र गूगल से साभार 

महिमा अपरंपार है इनकी

चित्र
मेरी इस रचना का उद्देश्य किसी वर्ग विशेष पर आक्षेप करना नहीं है बल्कि मैं उस सत्य को शब्द रूप में प्रकट कर रहीं हूँ जो प्रतिदिन हमारे सामने आता है। बड़ा अच्छा धंधा है, शिक्षा का न फंदा है। न ही कोई परीक्षा है, लेनी बस दीक्षा है। बन जाओ किसी बाबा के चेले। नहीं रहोगे तुम कभी अकेले। इस धंधे में मिली हुई सबकोआजादी कोई कितना बड़ा चाहे हो अपराधी मनचाहा पैसा है, मनचाहा वातावरण है। जिसने ले ली ढोंगी बाबाओं की शरण है। उसने कर लिया अपनी चिंताओं का हरण है । भविष्यवाणियाँ करके जनता को खूब डराते। सेवा-मेवा पाते, जनता को उल्लू बनाते । आलीशान होती है इनकी जीवन शैली । ऐशो आरामों से भरी रहती है हवेली। हाथ जोड़कर बैठी रहती है जनता भोली। खुलने लगी है अब इनकी पोलम पोली। संत-असंत का भेद कैसे समझे जनता? जिसको कहीं जगह नहीं वही संत बन जाता। चौपहिया वाहनों के होते हैं ये स्वामी ऊपर से बनते संत अंदर से होते कामी। सुरक्षा में इनके रहती नहीं कोई खामी। डिजिटल हो गए आज के साधु - संत इनकी महिमा का कोई नहीं है अंत। चोला राम नाम का पहनते राम नाम का मरम न समझते। सुविधा त्याग राम भए संन्यास...

उलझन है तो समाधान है

चित्र
दोराहे पर खड़ा जीवन समस्याओं से घिरकर भूल जाता है आगे बढ़ना तब जन्म लेती है उलझन जिसमें फंसकर जीवन मुक्ति की चाह में छटपटाता है दूर करना चाहता है उलझन उलझाती नहीं है उलझन प्रेरित करती आत्मशक्ति को देती चुनौती बुद्धि-विवेक को करती  है मार्गदर्शन कराती है आत्मचिंतन जिससे होता शक्ति का स्फुरण उलझनों में उलझना जीवन है उलझनों से निकलना परिवर्तन है उलझने बनाती मनुष्य को क्रियाशील इससे होता है जीवन गतिशील यूं ही चलता है अनवरत जीवन उलझन से ही उन्नति करता जीवन समस्या है तो उलझन है उलझन है तो समाधान है समाधान है तो संधान है संधान है तो जीवन आसान है। अभिलाषा चौहान चित्र गूगल से साभार 

उलझन ही उलझन है

चित्र
कैसे देश चलेगा आगे ! कैसे देश बढ़ेगा आगे ! सबको कैसे खुश रख पाएं, कैसे वोट जनता का पाएं ? ये बहुत बड़ी उलझन है। जाल वोट का बहुत बड़ा है, सबका ध्यान वोटों पर गड़ा है। कैसे जनता को उलझाएं ? उल्लू अपना सीधा कर पाएं। जाति-धर्म को ढाल बनाकर, मंदिर-मस्जिद की बात उठाकर, आरक्षण की आग लगाकर, प्रांतवाद की लहर उठाकर ये पैदा करते उलझन हैं। बढ़ती महंगाई रोक न पाएं, नित नए - नए ये टैक्स लगाएं, जीवन जनता का उलझाएं, जनता इनसे बच न पाए, जीवन जीने की उलझन है। महंगी सुविधा सस्ता जीवन, आसानी से न मिलते साधन, सबके जीवन में है उलझन, चिंता में गल जाता है तन, फिर भी न सुलझे ऐसी उलझन। कथनी-करनी में फर्क बड़ा है जनता की कौन सुनने खड़ा है समस्याओं से घिरी है जनता, हर कोई अपना सिर धुनता, हर ओर यही उलझन है। अभिलाषा चौहान चित्र गूगल से साभार 

बिछ गई है चौसर

चित्र
बिछ गई चुनावी चौसर जुट गए हैं सभी धुरंधर लेकर अपने अपने पांसे चलने लगे चुनावी दांव शुरू हुआ आरोपों प्रत्यारोपों का दौर त्याग कर मर्यादा जिसका ओर न छोर लगे उखडने गडे़ मुर्दे बोलने लगे अपने बोल आरक्षण व राम मंदिर लगे पीटने ढोल गडबड घोटालों की लगे खोलने पोल किसान की पीड़ा पर राजनीति गरमाई हिंदू मुस्लिम समुदायों की चिंता भी हो आई सुरसा के मुख सी बढती जाती है महंगाई सबको अपनी कुर्सी की चिंतां जनता किसको प्यारी पांच वर्ष तक इन्हें भुगतते अपना सब कुछ हारी फिर से वही बिसात बिछी है सत्ता पाने की होड़ मची है जनता की किसी ने न सुनी है जहां देखो खींच तान मची है  देश की चिंता किसी को नहीं है। अभिलाषा चौहान चित्र गूगल से साभार 

दीवार को दीवार ही रहने दो !

चित्र
ये दीवारें जो कभी नहीं बोलती जो कभी नहीं सुनती बनी रहती हैं मूक देखती हैं सब घटते हुए गवाह हैं बीते कल की नहीं बांटती किसी का सुख दुख खड़ी रहती हैं निर्जीव निश्चल फिर भी हैं बदनाम लोग कहते हैं कि दीवारों के कान होते हैं। सच तो यह है कि दीवार हमने बनाई है अपने-अपने दरम्यान तभी तो दूर हैं अपने अपनों से बच्चे सपनों से समाज हकीकत से लोग इंसानियत से मत करो दीवारों को बदनाम । आओ मिलकर दीवार हटाएं जो हमने खड़ी की हैं अपने-अपने दरम्यान जाति, धर्म, ऊंच-नीच और अमीर-गरीब की आओ जोडें दिलों के तार हट जाएं सारे भेद मिट जाए मतभेद मिल जाएं मन बनें सुंदर, सरल, जीवन इंसान फिर इंसान कहलाए इंसानियत अपना परचम लहराए सब हो जाए एकसार दीवार को दीवार ही रहने दो इन्हें अपने भीतर खड़ा मत करो । अभिलाषा चौहान

हौंसले को सलाम (माउंटेन मैन - दशरथ मांझी)

चित्र
माउंटेन मैन "दशरथ मांझी" के हौंसले को सलाम। जिन्होंने 25 वर्षों की अथक मेहनत से अकेले ही पहाड़ काटकर अपने गांव को शहर से जोड़ने के लिए सड़क बनाई। लोगों का उपहास भी उन्हें रोक नहीं पाया । बाधाएं भी उन्हें हतोत्साहित नहीं कर सकी । उनकी प्रेरणास्रोत थी उनकी पत्नी 'फाल्गुनी देवी ', जिनकी उस पहाड़ से गिरकर मृत्यु हो गई थी । उन्हें समर्पित कविता - - - - आर्थिक स्थिति जर्जर किंतु हौंसला अपार , बाधाओं से उसने कभी न मानी हार। काट रहा था लकड़ी पर्वत के उस पार , पत्नी खाना लेकर आती थी हर बार। वक्त बुरा था उस दिन न कर पाई पर्वत पार, पर्वत से गिरकर जीवन से गई हार। पत्नी की मृत्यु से व्यथित बेकरार, पर्वत को शत्रु समझा कर बैठा इकरार। जब तक पर्वत से न निकलेगी राह, तब तक न बैठूंगा चैन से न मानूंगा हार। हाथ हथौड़ा लेकर करता पर्वत पर प्रहार, विषम परिस्थितियों में भी न मानी उसने हार। लोगों ने पागल कहकर उपहास किया हरबार, अपनी धुन का पक्का था हौंसला अपार। कितने बीते वर्ष बीते जीवन दिया निसार,        पर्वत से बना दी राह किया इच्छा को साकार। अगर मन में किसी ...

हौंसलों की उड़ान

चित्र
जिनके हौंसलों में अभी जान बाकी है, उनके लिए पूरा आसमान बाकी है। मंजिलें ही जिनके जीवन का लक्ष्य हो, मुश्किलें उनके लिए बन जाती साकी हैं। बुरा या अच्छा वक्त वे देखते नहीं, वक्त को बदलने का उनमें हुनर काफ़ी है। जिंदगी का जोशे जुनून जिसमें बाकी है, उसमें ही नया करने का संधान बाकी है। बाधाएं नित खड़ी हो या छाए अंधकार घना, करते हैं सामना वे लहू में उबाल बाकी है। मुड़ के पीछे देखना उन्हें गवारा नहीं, आगे बढ़ने की उनमें ललक काफी है। जीते हैं शान से औ मरते हैं शान से, क्योंकि उनमें अभी स्वाभिमान बाकी है। अभिलाषा चौहान स्वरचित

ओ नंदलाला

चित्र
ओ नंदलाला कृष्ण कन्हैया कितनी व्याकुल तेरी गैया न कोई ग्वाला न रखवाला दर दर की ठोकर हैं खाए तुम बिन उनका कौन सहाए ओ कान्हा ओ नंदलाला ब्रज की बहुत दशा बुरी है अब न बजत तेरी बांसुरी है व यमुना किस्मत को रोए जाने कबहुं तेरे चरण धोए अब तो बन गई गंदा नाला तेरे बिन कोई नहीं रखवाला अब न रहीं व कदंब की छैंया जहां पडे थे तेरे पैंया वे मधुवन वृंदावन सांवरे अब तो बन गए तीर्थ धाम रे तीरथ करने हर कोई जाए मन का तीरथ न कर पाए आके ब्रज की दशा विचारो दुखियन को तुम उपकारो ओ नंदलाला कृष्ण कन्हैया हर ओर कालिया नाग फुफकारे को करे कालिया दहन सांवरे तुम बिन कोई नहीं सुनवईया पाप की गगरी अब तो भर गई अब तो बात हाथ से निकल गई एक बार फिर जन्मों नंदलाला करो लीला यशोमती के लाला अभिलाषा चौहान

स्वभाव मेरा

चित्र
लकीर पीटना स्वभाव नहीं मेरा बंधनों में बंधना स्वभाव नहीं मेरा परंपरा का पालन स्वभाव नहीं मेरा मैं हूं प्रगतिवादी समय के साथ ढल जाती हूं लेती हूं सांस खुली हवा में नवीनता की सुगंध महसूस करना है स्वभाव मेरा बंधी हुई परिपाटी से आती दुर्गंध मुझे विचलित करती है बेड़ियों में जकड़ा ये बैरी समाज काट देना चाहता है मेरे पर घोंट देना चाहता है मेरी आवाज़ कितनी ही आवाजें दफन हो गई कितने ही बलि चढ गए कुप्रथाओं के बने लकीर के फकीर दुहाई देते दकियानूसी विचारधारा की परिवर्तन से है एतराज इन्हें घुट रहा है दम जाने कितने मासूमों का कुचल जाते हैं न जाने कितने अरमान इसके तले इससे आंखें मूंदें रहना मेरा स्वभाव नहीं परिवर्तन की आवाज उठाना है स्वभाव मेरा अभिलाषा चौहान

मेरा अनोखा वतन

चित्र
मेरे वतन की माटी की बात अनोखी है सारे जहाँ में इसकी शान अनोखी है धर्म भाषा संस्कृति के भेद कितने हो एकता के सूत्र बंधने की रीत अनोखी है देख लो कुदरत के सारे रंग इसमें है हिमगिरि रक्षा प्रहरी की साख अनोखी है वादियां कश्मीर की इसकी जन्नत है प्रकृति के रंगों की यहां शोभा अनोखी है गले में हार गंगा का सोहता जिसके जलधि भी पांव नित पखारता जिसके शस्य श्यामल भूमि जिसकी शोभा हो अनोखा है वतन मेरा इसकी शान अनोखी है वीरप्रसविनी भूमि इसकी वीर रत्न  उगले बनी वीरों से विश्व में पहचान अनोखी है विश्वगुरू है ये वंदनीय इसकी है माटी यहां प्राण न्योछावर करने की रीत अनोखी है। अभिलाषा चौहान चित्र गूगल से साभार 

कही-अनकही

चित्र
कुछ कही अनकही बातें अंतरतम में सदा मचाती शोर है उत्ताल तरंगें भावों की लहराती पुरजोर हैं अनुभूति की अभिव्यक्ति में मुझको आता जोर है मेरे मन की मैं ही जानू न जाने कोई और है भावों की इस नगरी का न कोई ओर या छोर है शब्द चुनूं तो कम पड़ जाए वाणी में न जोर है कैसे बांधू मन को मन से पकड़ बडी़ कमजोर है सपने बुनती खुली आंखों से बंद आंखों की किनोर है भावमेघ ऐसे उमडे हैं बरसी बूंदे जोर है बरस बरस के ऐसे बरसी भीगी आंखों की कोर है । अभिलाषा चौहान

भारत या इंडिया

चित्र
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मेरी ओर से आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। अपने मन की अनुभूति को प्रस्तुत कविता में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। वतन की शान प्यारी हो वतन की आन प्यारी हो वतन के सामने किसी को न अपनी जान प्यारी हो । बडी़ मुद्दत से मिली है जो आजादी है हमको बडी़ शिद्दत से वीरों ने दिलवाई है हमको बहा के खुद लहू अपना सच किया आजादी का सपना वतन के सामने उनको न कुछ भी और था प्यारा वतन के लिए उन्होंने  अपना सब कुछ था हारा वही वतन है आज हम वतन के वाशिंदे  बना कर धर्म जाति की दीवारें और वोट के फन्दे लडें आपस में और पहुंचाए वतन की संपत्ति को नुकसान आरक्षण बन गया है ढाल चुनावी वादों में बने मंदिर और मस्जिद भी अब चुनावी मुद्दे हैं बना कश्मीर भी देखो रण का अखाड़ा है गुलामी की वो जंजीरें तब जो टूटी थीं बनी गलहार हैं देखो देश की जनता की वादों और इरादों का फर्क तुम देखो अभी भी देश में छाई कितनी गरीबी है भर गए घर हैं उनके कुर्सी पर जो बैठे अभी भी एक भारत में दो भारत हैं जीते एक इंडिया है कहलाता एक भारत है कहला...

भीष्म पितामह की भीषण प्रतिज्ञा.......

चित्र
भीष्म पितामह की भीषण प्रतिज्ञा से रच गया था महाभारत सही समय पर निर्णय न लेने से छिड़ गया था गृहयुद्ध आंखों के सामने देखा द्रोपदी का चीरहरण फिर भी न मुख खोला कुछ भी न मुख से बोला उनकी चुप्पी समझ नहीं आई न एक अबला की लाज बचाई अन्याय का न किया प्रतिकार हो गई प्रतिष्ठा तार-तार बंधे थे भीषण प्रतिज्ञा से बने लकीर के फकीर आज भी बैठे हैं चुप समाज में भीष्म पितामह देखते अन्याय, अत्याचार लुटते अबला की लाज सत्ता की खातिर सब कुछ है स्वीकार अधर्म की अनीति की ढाल जाति पांति की ये चुप्पी और आंखों पर बंधी पट्टी रखती इन्हें सच से बहुत दूर हर घर महाभारत हर ओर महाभारत इन्हें है स्वीकार नहीं छोड़ा इन्होंने आज भी सत्य को अनदेखा करना तभी तो बंटता देश समाज परिवार क्योंकि इन्हें बस स्व से है प्यार इनके लिए बाकी सब बेकार अभिलाषा चौहान

विकास फिर रूठ जाता है...

चित्र
ऊंची-ऊंची गगनचुंबी इमारतों के पास ही बनी झुग्गियां देती विपन्नता का परिचय जीवन को जैसे तैसे जीते फटेहाल विपन्न लोग यह विषमता की खाई बढ़ रही सुरसा के मुख की तरह दिनरात बहाते जो पसीना वो और भी ज्यादा हो जाते गरीब न बच्चों की अच्छी शिक्षा न उनको अच्छा पोषण शोषण बस शोषण वस्त्र पर लगे पैबंद के सम ये झुग्गियां हर ओर दिखाई देती है एक पल में खाक होता विकास का स्वप्न स्वच्छता व डिजिटल इंडिया ठेंगा दिखाते गंदगी और कचरे के बीच असुविधाओं में पनपता जीवन अनेक कुंठाओं से ग्रस्त देता अनचाहे अपराधों को जन्म इस महानगरीय जीवन में बलवती दिखावे की प्रवृति दोहरे जीवन का बन प्रतिबिंब असमानता और आर्थिक विषमता की खाई को और बढ़ा देता ये झुग्गियां मारती तमाचा विकास के मुख पर धो देती एक पल में सारे ख्बाव मुंह चिढ़ाती उन गगनचुंबी इमारतों को सुंदर मुख पर ज्यों निकला हो कोई मुहासां जितनी तेजी से बढ़ रही इन झुग्गियों की संख्या उतनी स्पीड बुलेट ट्रेन की भी नहीं होगी उतनी ही तेजी से बढ़ रहे अपराध, टूटे स्वप्न अधूरी आकांक्षाएं लालसा अधूरी प्यास देती एक अलग ही संस्कृति को ज...