संदेश

प्रकृति लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अनोखी धरा

चित्र
अखिल भुवन में धरा अनोखी जीवन से जो संचारित सूर्य-चंद्र रक्षक सम बैठे पंचभूत पर आधारित।। नील-हरित आभा से मंडित रत्नों के भंडार भरे सरिता,सागर और सरोवर कल-कल-कल का नाद करे षडऋतुओं का चक्र निरंतर करता इसको श्रृंगारित सूर्य-चंद्र रक्षक सम बैठे पंचभूत पर आधारित।। समरसता का भाव हृदय में ममता की बरसात करे देवों को भी प्रिय लगती है आकर वे अवतार धरे वेदों ने महिमा गाई है काल करे सब निर्धारित सूर्य-चंद्र रक्षक सम बैठे पंचभूत पर आधारित।। हरती सब संताप जीव का सहन करे अपघातों को करुणा कलित क्षमा करती है मानव की सब बातों को बन तपस्विनी धरणी तपती सूर्य मंत्र कर उच्चारित भानु-चंद्र रक्षक सम बैठे पंचभूत पर आधारित।। अभिलाषा चौहान

आखिर कब तक ??

चित्र
इस ब्रह्मांड में जीवन से परिपूर्ण हरित-नीलाभ्र ओ मेरी पृथ्वी!! तुझसे ही है मेरा वजूद अपने हरितांचल में दिया दुलार तू है तो मैं हूँ ओ मेरी पृथ्वी!! मैं कृतघ्न भूल तेरे उपकार तेरी देह को करता छलनी बाँट दिया खंड-खंड बोने लगा काँटे नफ़रत विद्वेष के उजाड़ता तेरा रूप धूल-धुसरित कर छीनता तेरा जीवन हूँ नहीं अनभिज्ञ स्वार्थी हूँ मैं बड़ा अपने जीवन के लिए छीनता तुझसे तेरे अनमोल रत्न जहर घोलता मैं दूषित करता पर्यावरण सहनशीला,ममतामयी करती क्षमा अक्षम्य अपराध ओ मेरी पृथ्वी!! आखिर कब तक?? अभिलाषा चौहान'सुज्ञ' स्वरचित मौलिक

जब मुस्काता है गुलमोहर

चित्र
गर्मियों के तपते दिन , लाल फूलों से लदा गुलमोहर। हर लेता है मन का संताप, चटकती बिखरी तेज धूप में, खिलखिला उठता है मन। देख उसे लगता है ऐसे, जैसे किशोरी पर आया यौवन। या ग्रीष्म में पथिक को, जैसे मिल जाता है संजीवन। तन-मन हो उठे प्रफुल्लित, मुस्काता है जब गुलमोहर। हरे-भरे वृक्षों पर खिल उठते, सुर्ख लाल रंग के सुमन। उजड़ी प्रकृति की सुंदरता, खिल उठती पाकर जीवन। केवल वृक्ष नहीं हो तुम, इस सृष्टि का हो जीवनधन। ग्रीष्म तपे और तुम लहलहाए, प्यार तुम्हारा खिलता जाए। बेनूरी ही इस सृष्टि में, नूर तुम्हारा निखर कर आए। नयन नहीं हटते हैं तुमसे, नयनों को मिलता आलंबन। आग बरसती जब अम्बर से, तुम भावों का करते उद्दीपन। अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक

रंग सुरंग बने हैं सारे

चित्र
इतनी सुंदर रंग बिरंगी प्रकृति की सुंदरता प्यारी भांति भांति के पुष्प खिले हैं महक उठे जीवन की क्यारी बह उठती जब हवा बासंती सरसों की फूले फुलवारी ओढ चुनरिया धानी धरती मन के सब संताप है हरती चमक उठे हिमगिरि सोने सा जब दिनकर की किरणें हैं पडती देख नीलिमा जलधि गगन की हो जाती हूं पूर्ण मगन सी चहचहाते हैं पक्षी प्यारे कितने सुंदर कितने सारे घिर आता जब घोर अंधेरा तब परिवर्तन ने डाला डेरा प्रेम का रंग है सबसे न्यारा इससे बंधा संसार है सारा रंग सुरंग बने है सारे आंखों को भावे हैं प्यारे श्वेत  श्याम में फंसा ये जीवन देखे नित नए रंग मनभावन केवल कोई चित्र नहीं ये विचित्र है पर विचित्र नहीं ये। अभिलाषा चौहान

चित्रकार की चित्रकृति

चित्र
चित्रकार की चित्रकृति चित्रलिखित सी देखती कौन सुघड़ सोच सोच कर अंतर्मन टटोलती जिसने रंग भरे हैं न्यारे कितने सुंदर कितने प्यारे कितनी सुघड़ है उसकी कूची गलती  की न कोई सूची देख देख संसार की शोभा मन ही मन सोचती किसकी है ये सुंदर रचना जिज्ञासा मन डोलती हरा रंग बना खुशहाली लाल बना है मंगलकारी श्वेत बना शांति का दूत है काला बना अज्ञान प्रतीक है इंद्रधनुषी रंगों से ये दुनिया कितनी सुन्दर लगती नित दिखते नए रंग इसमें कूची कोई न दिखती पीला रंग बन बसंत जीवन में खुशियां भरता जलधि आसमां का रंग मन का संताप है हरता इन रंगों से सजी ये धरती कितनी सुंदर दिखती चित्रकार की चित्रकृति मन को है हर्षित करती। अभिलाषा चौहान    

जीवन में समस्याओं का कारण

चित्र
कभी-कभी मन वैचारिक झंझावातों में घिर जाता है जीवन को लेकर अनेक प्रश्न उठने लगते हैं ? न हमें जन्म से पूर्व का पता होता है और न मृत्यु के बाद का, फिर भी हम इस संसार की माया में उलझ कर जीवन को इस कदर मुश्किल बना लेते हैं कि जीना भूलकर समस्याओं का समाधान करने में पूरी उम्र निकल जाती है। सही मायने में में जीवन को जीना भूल जाते हैं और अंत समय पछताते हैं।    माना कि जीवन जीने के लिए मिला है, तो जियो न, किसने रोका है , किन्तु उसे इतनी  संकीर्ण सोच के साथ मत जियो कि जैसे उस पर तुम्हारा ही एकाधिकार है। सच पूछो तो यही भ्रम  सभी समस्याओं की जड़ है।     अपनी संतान से लेकर निर्जीव वस्तुओं पर एकाधिकार जमाने और उसके लिए लडने की प्रवृति ने मनुष्य को सत्य से भटका दिया है मत भूलो कि ईश्वर ने हमें किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु मानव जन्म दिया है इसलिए बिना किसी चाह के अपने कर्तव्यों की पूर्ति करो,तभी सच्चा सुख मिलेगा। अभी दूरदर्शन पर एक परिवार का झगड़ा चल रहा था । माता पिता पुत्र से अपेक्षा कर रहे थे कि उन्होंने उसे पढाया लिखाया इसलिए वह धन कमाए और उनकी सेवा करे जबकि...

क्षणिकाएं (घटा, फुहार, गर्जना.....)

चित्र
    **   घटा  ** घिर के आई फिर घटा याद आने लगा फिर जीवन में जो भी था घटा।      ** फुहार** गिरने लगी रिमझिम फुहार मन मचल करता गुहार मत खोलो अब यादों के द्वार।     **गर्जना** गरजते हैं जोर से बादल धडकने लगता मेरा दिल और भी मैं होती विकल ।      **दामिनी** कड़क उठती जब दामिनी तब दर्द की यादें घनी बढा जाती हैं बैचेनी।      **छटा** निखरने लगी प्रकृति की छटा हटने लगी सारी धुंध भी छाया था मन में जो अंधकार धीरे धीरे वो भी छटा।       **ऊषा** हुआ ऊषा का अब आगमन हुआ दर्द का तब निगमन खिल उठा फिर खुशियों का चमन। अभिलाषा चौहान

धरा की व्याकुलता

चित्र
धरती मां है सह रही है सब कुछ निशब्द नहीं चाहती वह देना संतानों को पीड़ा देती ही आई है सदा जीवन... जीने के साधन हरे - भरे वृक्ष लहलहाते खेत निर्मल नदियाँ हिमगिरी जलधि पर कब तक...? थक चुकी है वह तुम्हारी उपेक्षा से तुम्हारे व्यवहार से नष्ट कर उसकी सुंदरता खड़े किए कंक्रीट के जंगल नष्ट कर दिए हरे भरे वन जिनमें बसता था जीवन दूषित कर दी नदियाँ हिमगिरि जलधि सबकुछ गर्भ से उसके खींच लिया अमृत जल भभकने लगी है धरती सुलगने लगी क्रोध की आग बदल गया मौसम चक्र दरकने लगे पहाड़ सूख गईं नदियाँ मिटा कर प्रकृति को खुद को कहां से पाओगे? मां भी देती है दंड सुधर जाओ इसे बचाओ वृक्ष लगाओ वन बचाओ जल बचाओ अपना कल बचाओ(अभिलाषा चौहान) 

मेघ गाते आ रहे मल्हार नभ में.....

चित्र
मेघ गाते आ रहे मल्हार नभ में विहग अवली झूमती जाती गगन में बन गलहार मेघ का सत्कार करने पवन मुक्त छंद स्वागत गान करते वृक्ष भी लय ताल संग नृत्य करते मोर दादुर कोयल पपीहा राग छेडें मेघ मल्हार संग अपनी तान जोडें बरस उठी चहुंओर रसधार है अब प्रकृति भी रसरंग में डूबी हुई अब प्रिय प्रेम की बूंदो का स्पर्श पाकर अवनि ने कर लिए श्रृंगार सोलह प्रिय मिलन की घड़ी  समीप आई देख प्रिय को विरहिणी है लजाई चंचला दामिनी पल-पल बताए मेघ मल्हार अलापते आ गए हैं प्रियतमा पर प्रेमरस बरसा रहे हैं मिलन का संगीत है देखो अनूठा धरा से नवजीवन का अंकुर फूटा हर्ष का पारावार है चहुंओर अब ओढ ली अवनि ने धानी चुनर जब सृष्टि भी निखरती जा रही अब मेघ सारे कलुष को धो रहे हैं मेघ मल्हार गाते आ गए हैं छिड़ गया है राग अब क्रांति का है नहीं समय अब विश्रांति का हो गया अवनि का जीवन रसमय अब होगा मनुज का जीवन रसमयी कब ? अभिलाषा चौहान              फोटो गूगल से संगृहीत