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कह मुकरी छंद

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पल-पल जो साथी बन रहता चलता साथ नहीं कुछ कहता उसने ऐसा मन भरमाया हे सखि साजन? ना सखि साया। करूँ प्रतीक्षा निशदिन उसकी, दिखता जब खुशियाँ हैं मिलती। मिले मुझे तो करता चेतन, का सखि साजन?ना सखि वेतन। जिसे देख कर हँसती हूँ मैं, जिसके कारण सजती हूँ मैं। जिसको सब कर देती अर्पण। का सखि साजन?ना सखि दर्पण। पीत वसन पहने मुस्काए, रूप सलोना मन को भाए। शोभा उसकी सदा अनंत। का सखि साजन?ना सखि वसंत। मुझे देख कर जो खुश होता, साथ सदा वह जगता- सोता। प्रीत हमारी चढ़े परवान। का सखि साजन?ना सखि श्वान। अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक