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मातृदिवस पर मेरी भावनाएं

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'मां' जिसके बिना अस्तित्व की  कल्पना नहीं की जा सकती।जो कितने कष्ट सहकर शिशु को जन्म देती है।पीड़ा भोगती है किन्तु यह पीड़ा उसे मातृसुख देती है, इसलिए वह इस पीड़ा में भी मुस्कराती है।अपनी संतान का लालन-पालन करने के लिए रात-दिन एक कर देती है।उसकी एक ही ख्वाहिश होती है, कि उसकी संतान को कोई कष्ट न हो,वह एक समर्थ इंसान बने। वर्षों की तपस्या पूर्ण होती है,संतान समर्थ बनती है,किंतु मां के त्याग का मूल्य भूल जाती है। मैं नहीं कहती कि सारी संतानें ऐसी होती है,पर फिर भी ऐसा आस-पास देखने में आता है कि वही मां उनके लिए बंधन और बोझ प्रतीत होती है।जिसने अपना सुख न देखा,वह सदा अपने दुख में अकेली होती है।सबकी अपनी जिम्मेदारियां और मजबूरियां होती हैं,आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में समय का अभाव भी होता है, लेकिन इसका खामियाजा मां को ही भुगतना पड़ता है,जिसने अपना सुख-दुख नहीं देखा,जो बुढ़ापे में भी बस अपनी संतान के सुख की कामना करती है,वही दो मीठे बोल सुनने को तरसती है,आश्चर्य होता है मुझे ऐसी संतानों पर ,जिनके लिए अपनी मजबूरियां मां की तकलीफ़ से बड़ी होती हैं। जो मां क...

मैं की तलाश

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तलाश स्व की अंतहीन स्वयं में ,मैं को खोजते कब सरक जाती है जिंदगी हाथ से..। अहम और मैं अंतर हैं सूक्ष्म अहम में सर्वोपरि सत्ता स्वयं की जबकि ,मैं जानना ,उस अनादि सत्य को। मैं ,से साक्षात् उस अनंत से तादात्म्य जिसमें समाहित अखिल ब्रह्माण्ड मैं,तुम और सब। मैं और बस मैं जनक है अहम का जबकि जैसा मैं वैसे सब जनक है समत्व का। मैं ,आखिर है अनादि ,अनंत ,अखंड सर्वेश,सर्वव्यापी। मैं की पहचान है स्वयं से पहचान जीवन-उद्देश्य से साक्षात् तुच्छ मनोवृत्ति का त्याग। दरअसल मैं, को पकड़ना है भ्रमजाल, सिर्फ मैं अहंकार का जनक यह ,मैं वह ,जो कभी नहीं बन सकता ,किसी का स्वयं का भी। अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक

ये नीला अनंत विस्तार

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ये नीला अनंत विस्तार, ये रहस्यमयी संसार। कौन रहता है वहां, उस नील नभ के पार। सुना है एक लोक, गगन के उस पार है। नहीं कोई दुख वहां, सुखद वह संसार है। ये ज्योतिर्मय सूर्य नभ में, उस लोक का पता बता रहा। ये गगन की नीलिमा है या, पट किसी का फहरा रहा। लो रजनी ने डाला डेरा , खो गई अब नीलिमा। पहन कर तारों का हार, शोभती है ये कालिमा। वो झांकता है चंद्र या, चंद्र मुख कोई झांकता। या गगन ही चंद्र रूप में, रहा धरा को ताकता। मिलकर भी मिलते नहीं, धरती-गगन साथ में। दूर क्षितिज पर लग रहा, डाले हाथों में हाथ हैं। अभिलाषा चौहान स्वरचित

हटा लो घूंघट

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अज्ञान का घूंघट हटा, देख तो उसकी छटा। तू जिसे है ढूंढ़ता, बंदे तेरे ही पास है। माया का घूंघट पहन, मोह का तू करे जतन। माया का घूंघट हटा, अंतर्मन की ज्योति जला। आत्मा है अपने पिय की, प्यारी सी दुल्हनिया। भटकती रहती सदा, पिय मिलन को बावरी। कितने घूंघट पहने हैं तू, संसार के भ्रमजाल में। एक बार हटा दे इनको, सत्य होगा फिर सामने। क्यों छिपाता है इसे, जो कभी छिपता नहीं। प्रिय मिलन को रोकना, है तेरे बस में नहीं। कह गए हैं संत सारे, अज्ञान का घूंघट हटा। निखरने दे संवरने दे, आत्मा की सुंदरता। अभिलाषा चौहान स्वरचित

खंडहर-सी जिंदगी

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दरकते मकान, आखिर  ढह ही जाते हैं। दरकते रिश्ते भी , आखिर टूट ही जाते हैं। जरूरत है दोनों को, समय पर सम्हाला जाय। कोई कमी हो , तो उसे संवारा जाए। खंड-खंड होते , कहीं खंडहर ही न बाकी बचे। जिंदगी कहीं, वीरान न होने लगे। छिन न जाए , कहीं लबों की मुस्कुराहट                              अकेलेपन,                  की सुन लेना जरा आहट। दरार का, अंदेशा हो तो मरम्मत कर लेना। दरारों को , बेवजह बढ़ने मत देना। खंडहर-सी, जिंदगी में भटकती ये आत्मा। कैसे पाएगी चैन खुशियों का होगा खात्मा। उजड़ जाएगा , चमन निशां बाकी रह जाएंगे। पछताने, से फिर कहां कुछ पाओगे ! आंधियां , तुम्हारे कदमों के निशां मिटाएंगी। इतिहास , बन कर भी नजर नहीं आओगे। अभिलाषा चौहान

दर्शन है यात्रा...!!

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दर्शन है, यात्रा! द्वैत से अद्वैत की असत्य से सत्य की। दर्शन कराता बोध, इहलौकिक जगत , के प्रपंचों की सत्यता का, संसार की नश्वरता का। दर्शन मार्ग है, मिलन का , आत्मा का परमात्मा से! आधार अध्यात्म का। ईश्वरीय सत्ता , के आभास का। दर्शन कराता, साक्षात्कार, आत्मा के सर्वव्यापी रूप का। दर्शन से मिटता, करणीय-अकरणीय , का द्वंद्व। सांसारिकता से होता, मोह भंग । यह पथ है , अंत से अनंत की, अंधकार से प्रकाश की, अज्ञान से ज्ञान की यात्रा का। दर्शन से मिटता देह से मोह, उद्देश्य का होता बोध, कर्त्तव्य-कर्म होता प्रधान। सृष्टि के रहस्य , जगाते जिज्ञासा। खुलता चिंतन का मार्ग, लोक-कल्याण का, मार्ग होता प्रशस्त। इसी पथ पर , मिलता निर्वाण। दर्शन है, भगवतगीता का सार, आत्मा का प्रसार, चिंतकों, विचारकों, के चिंतन का मार्ग, भक्ति मार्ग का आधार। अभिलाषा चौहान स्वरचित

जिंदगी से इतने नाराज़ क्यों हो?

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जिंदगी से इतने नाराज़ क्यों हो! छुपाए इतने राज क्यों हो! कब सरक जाएगी हाथों से ये! बैठे किसी के इंतजार में क्यों हो? फितरतें इंसान की समझोगे कैसे, जिंदगी को जिंदगी समझोगे कैसे? साथ में हो सच्चा कोई हमराही, तो अकेले जिंदगी में रहोगे कैसे? तड़प अपनी दिल में न दबाना, जख्म को न कभी नासूर बनाना, हो अगर दर्द सहना मुश्किल,  तुम कभी आवाज तो उठाना। जिंदगी जिंदादिली से जीते हैं जो, हंसते-हंसते गमों से लड़ते हैं जो, लुत्फ जिंदगी का वो पूरा उठाएं, पल दो पल कभी उनके साथ बिताना। जिंदगी की खूबसूरती न भुलाओ, जिंदगी को बोझ तुम मत बनाओ। प्यार से इस पौधे को सींचना तुम, खुशियों से इसको आबाद बनाओ। अभिलाषा चौहान

आशियाना आत्मा का

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आत्मा का आशियाना , प्रभु का दिया शरीर। जिसमें रमती आत्मा जैसे मलय समीर। जिसमें रमती आत्मा, प्रभु मिलन की रखें चाह। पंचविकारों की बंदी बन, न पावे प्रभु की थाह। तड़पे है दिन-रात, चैन पल भर न पावे। बन कर बंदी आत्मा, मुक्ति की आस लगावे। जेल बना है आशियाना, कैदी सी फड़फड़ावे। भौतिकता में लीन, यह आशियाना न भावे। करती रहती सचेत, बुद्धि समझ न पावे। नश्वरता से मोह करे, यह आत्मा को न भावे। अभिलाषा चौहान स्वरचित

उजड़ते आशियाने

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जीविका की तलाश में, दर-बदर वे भटकते। टीन-टप्पर जोड़कर, बनाते अपने आशियाने। वक्त की मार को, हंसते हुए झेलते। आशियाने में अपने, छोटे-छोटे सपने जोड़ते। चाह नहीं अट्टालिका की, या बड़े-बड़े महलों की। छोटी-छोटी बातों में ही, जीवन की खुशियां ढूंढते। जो भी है पास उनके, उसी का सुख हैं भोगते। नियति को स्वीकार कर, हंसकर जीवन जीते। व्यवस्था और बाहुबली, जब उनके सपने रोंदते। आंखों से छलकते आंसू, आशियाने जब उजड़ते। पाई-पाई जोड़ कर, दुनिया थी जो बसाई। निष्ठुरों ने अतिक्रमण, के नाम पर थी मिटाई। कुचल गए सपने सारे, उजड़ते इन आशियानों में। रह गए बाकी निशां बस, बाकी बचे जो अरमानों में। अपने ही देश में, बन जाते बेगाने से। एक फकत आशियाने की तलाश में घूमते। अभिलाषा चौहान

वह मीठी मुस्कान

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"मुस्कान"कितना प्यारा है ये शब्द।  मनुष्य के व्यवहार का अनिवार्य अंग है ' मुस्कान'।मुस्कान के कई रूप होते हैं। अलग-अलग अवसरों पर मुस्कान भी अलग-अलग ही होती है। सबसे मासूम और निश्छल मुस्कान होती है,छोटे बच्चों की,एक पल में स्वर्गिक आनन्द की प्राप्ति करा देती है।सारी थकान और सारी परेशानी इस मुस्कान में तिरोहित हो जाती है। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं और बाहरी दुनिया से उनका सरोकार होता है, उनकी मुस्कान में औपचारिकता का समावेश होने लगता है और हम जैसे दुनियादारी में फंसे लोग तो अक्सर मुख पर झूठी मुस्कान लपेटे रहते हैं।ऐसा करने में हम भूल जाते हैं कि हम सच में कब मुस्कराए थे? मुझे आज भी याद है ,वह 'मुस्कान'जो मैंने उस बच्चे के चेहरे पर देखी थी।हुआ यूं कि मैं दिल्ली से जयपुर लौट रही थी,रास्ते में कोटपुतली पर बस रूकी,मैंने खिड़की से बाहर देखा,एक दस-बारह साल का लड़का मैले-कुचैले कपड़े पहने लोगों से खाने को मांग रहा था लेकिन किसके पास इतनी फुर्सत है कि उसकी सुने।मेरे पास दो-तीन बिस्किट के पैकेट और कुछ संतरे थे,मैंने उसे बुलाया और पूछा कि'...

शहनाई और बिस्मिल्ला खां

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शहनाई का जिक्र भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खां के जिक्र के बिना अधूरा है, एक सामान्य से लोक वाद्य-यंत्र को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने में उनका योगदान अभूतपूर्व रहा है। बिहार के डूमरांव में जन्मे अमीरूद्दीन का पालन-पोषण संगीत की लय और तान के बीच ही हुआ था।५-६ वर्ष की अवस्था में वे अपने नाना के यहां काशी आ गए।नाना और मामा काशी के पुराने बालाजी मंदिर के नौबतखाने में शहनाई वादन करते थे। यहां बालक अमीरूद्दीन को अपने चारों ओर शहनाईयां ही दिखाई देती। फिर उसे भी रियाज के लिए बालाजी के मंदिर के नौबतखाने में भेजा जाने लगा।काशी तो है ही संगीत की नगरी, नौबतखाने की ओर जाते हुए अमीरूद्दीन को हर घर से संगीत की स्वर-लहरियां सुनाई देती। जिन्हें सुन-सुनकर उसे संगीत के आरोह-अवरोह का बखूबी ज्ञान हो गया था। धीरे-धीरे शहनाई और बिस्मिल्ला खां एक-दूसरे के पूरक बन गए।काशी में आयोजित संगीत समारोह उनके बिना अधूरे रहते। बढ़ती ख्याति केसाथ ही शहनाई-वादन में उनकी सिद्धहस्तता बढ़ती चली गई। देश-विदेश में होने वाले शास्त्रीय संगीत समारोह में उनका शहनाई-वादन अनिवार्य सा हो गया। शहनाई में तो जैसे उनकी जान बसती थी।...

जीवन में समस्याओं का कारण

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कभी-कभी मन वैचारिक झंझावातों में घिर जाता है जीवन को लेकर अनेक प्रश्न उठने लगते हैं ? न हमें जन्म से पूर्व का पता होता है और न मृत्यु के बाद का, फिर भी हम इस संसार की माया में उलझ कर जीवन को इस कदर मुश्किल बना लेते हैं कि जीना भूलकर समस्याओं का समाधान करने में पूरी उम्र निकल जाती है। सही मायने में में जीवन को जीना भूल जाते हैं और अंत समय पछताते हैं।    माना कि जीवन जीने के लिए मिला है, तो जियो न, किसने रोका है , किन्तु उसे इतनी  संकीर्ण सोच के साथ मत जियो कि जैसे उस पर तुम्हारा ही एकाधिकार है। सच पूछो तो यही भ्रम  सभी समस्याओं की जड़ है।     अपनी संतान से लेकर निर्जीव वस्तुओं पर एकाधिकार जमाने और उसके लिए लडने की प्रवृति ने मनुष्य को सत्य से भटका दिया है मत भूलो कि ईश्वर ने हमें किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु मानव जन्म दिया है इसलिए बिना किसी चाह के अपने कर्तव्यों की पूर्ति करो,तभी सच्चा सुख मिलेगा। अभी दूरदर्शन पर एक परिवार का झगड़ा चल रहा था । माता पिता पुत्र से अपेक्षा कर रहे थे कि उन्होंने उसे पढाया लिखाया इसलिए वह धन कमाए और उनकी सेवा करे जबकि...

जीवन के मायने

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अपने आस पास जब भी देखती हूं तो मुझे लोग किसी न किसी परेशानी का रोना रोते दिखाई देते है या परनिंदा में संलग्न दिखाई देते हैं। यह देखकर मैं सोच  में पड़ जाती हूं कि क्या ये लोग जीवन के मायने समझते हैं ? मेरा - तेरा, अपना-पराया, करते हुए छोटी-छोटी बातों पर लडते हुए ये जिंदगी का रस लेना ही भूल जाते हैं, इन्हें अपने सिवा किसी की फिक्र नहीं होती रिश्ते नाते इनके लिए बोझ होते हैं। स्वार्थ इन पर इस तरह हावी होता है कि उसके आगे दूसरों का सुख - दुख इन्हें दिखाई नहीं देता । इनका जीवन खुद से शुरू होकर खुद पर ही खत्म हो जाता है। वास्तव में जीवन क्या है? इन्हें कभी समझ नहीं आता । जीवन के उद्देश्य से अपरिचित ये लोग सांसारिक माया को सर्वोपरि मान कर धन - सम्पत्ति के लिए आजीवन परेशान रहते  हैं । मैं ये नहीं कहती कि ये वस्तुएं जरूरी नहीं पर उन्हें ही जीवन मान लेना गलत है। जब जीवन पर ही किसी का हक नहीं तो वस्तुओं पर हक जमाना, उसके लिए अपनों को कष्ट पहुंचाना बेमानी है। अगर आप खुश रहना चाहते हो तो तो जीवन के प्रति नजरिया बदलना होगा। जितना खुश रहोगे और दूसरों को रखोगे, उतना ही मन तृप्त रहेगा। ...

दुख का कारण

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बहुत दिनों से मन को एक बात परेशान कर रही है कि आदमी के दुख का कारण असुविधाएं हैं या उसकी अपनी प्रवृति ? मुझे लगता है कि असुविधाओं में आदमी जीवन जी सकता है किंतु उसकी अपनी प्रवृति ही उसके दुख का सबसे बडा कारण है क्योंकि यदि सुविधाएं सर्वोपरि होती तो सुविधासम्पन्न लोग ज्यादा प्रसन्न होते लेकिन ऐसा नहीं है बल्कि वे ज्यादा दुखी हैं, जिन लोगों को भौतिक सुविधाओं की चाह है वेज्यादा से ज्यादा पाना चाहते हैं, ऐसे लोग छोटे घर से भी परेशान होते हैं और बड़े घर से भी । उनका पूरा जीवन झींकते हुए या नुक्ताचीनी करते हुए बीतता है। इस जद्दोजहद में वे अपने अनमोल जीवन को व्यर्थ गंवा देते है । उनका अपना जीवन तो समस्याओं से घिरा होता है किन्तु वे साथ वालों का जीवन भी दूभर कर देते हैं। उनका सारा जीवन उपभोग की वस्तुओं को एकत्र करने में निकल जाता है पर वे उसका सुख नहीं भोग पाते। इसका कारण असंतोष है और असंतोष से मन की शांति नष्ट हो जाती है और जीवन अशांत हो जाता है।  सोचने वाली बात ये है कि मूर्ख लोग इस अनमोल जीवन को जीने की बजाए सांसारिक वस्तुओं के लिए लडते झगडते रहते हैं और अंतत संसार से चले जाते ...

आप बीती

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हम पांच भाई बहन प्रगाढ़ बंधन में बंधे सदा पांच पांडव कहलाते थे। वक्त के साथ हम तीनों बहनों की शादी हुई और हम सब दूर हो गए पर स्नेह का बंधन दूरियां नहीं देखता और हम सब एक बंद मुट्ठी के समान थे। बचपन का लडना झगडना, रूठना मनाना बदस्तूर जारी था  मैं सबसे बड़ी थी, मुझसे छोटा मेरा भाई लोकेन्द्र, जिसे हम बबलू बुलाते थे, वह मेरे बहुत करीब था उसका कोई भी काम और मेरा कोई भी काम कभी एक दूसरे के बिना पूरा न होता  ।मुझे बस कहने भर की देर होती वह कैसे भी आता पर मेरे सामने खड़ा होता। बडी खुशहाल चल रही थी हमारी जिंदगी किंतु अचानक हमारी खुशियों को नजर लग गई, एक मामूली से फ्रेक्चर और डाॅक्टर के गलत इलाज से उसने ऐसा बिस्तर पकडा कि लाख कोशिशों के बाद भी हम उसे ठीक नहीं कर पाए। काल और नियति हमारी कोशिशों पर भारी पड़ गए और हम उसे खो बैठे। आज सात महीने होने को आ रहे हैं, पर अभी भी स्वीकार करना मुश्किल हो रहा है । ऐसा लगता है,माला टूट गई और मनके  बिखर गए । अब तो ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उनकी अमानत दो छोटे-छोटे बच्चों को हम लायक बना सके तो शायद उसके प्रति हमारा नेह सच हो जाएगा। आज क...

मेरी नजर में मित्रता के मायने

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मित्रता दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं दोस्ती का रिश्ता सबसे अनोखा और प्यारा होता है । पर सच्चा सखा या दोस्त किस्मत से नसीब होता है। कृष्ण - सुदामा,  कर्ण - दुर्योधन जैसी मित्रता के उदाहरण अब कहां मिलते हैं। आजकल स्वार्थ ने मित्रता को अपनी गिरफ्त में ले लिया है ।" विपत्ति कसौटी जे कसे ते ही सांचे मीत   "यह कथन पूर्णरूपेण सत्य है। सभी रिश्ते प्यारे होते हैं, पर सबसे अनोखा और प्यारा रिश्ता दोस्ती का है। यह दोस्ती ही है जो अटूट बंधन में बांधती है और अगर यह रिश्तों में समा जाय तो सोने पर सुहागा हो जाती है। अतः दोस्ती के महत्व को समझना आवश्यक है। दोस्ती में स्वार्थ विष के समान है। अतः जहां स्वार्थ है वहां दोस्ती नहीं हो सकती। किसी मकसद के लिए कई गई  मित्रता सदैव हानिकारक और पतन की ओर ले जाने वाली होती है। जेब में पैसो की खनक सुन ऐसे मित्र मक्खियों के समान भिनभिनाने लगते हैं और दोस्ती की कसमें खाते नहीं थकते जैसे ही आपकी जेब खाली हुई  , वे फिर नजर नहीं आते। दोस्तों की भीड जुटाने से अच्छा तो यही है कि एक मित्र हो पर सच्चा हो जो आपके साथ हर अच्छे या...

केवल पल ही सत्य है.....

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अक्सर लोग भूत और भविष्य की स्मृतियों और चिंताओं में डूबे रहते हैं और वर्तमान को जीना भूल जाते हैं,वे नहीं जानते या जानकर भी नहीं जानना चाहते कि जो समय अतीत बन चुका है, उसे पुनः नहीं जिया जा सकता। हां,  वह प्रेरणास्पद भी हो सकता है और दुखदायी भी । इसी प्रकार भविष्य को सुखद बनाने के सभी संभव प्रयास किए जा सकते हैं किंतु सिर्फ चिंताओ से उसे सुखद नहीं बनाया जा सकता है । इस भूत-भविष्य के द्वंद्व में वर्तमान उपेक्षित हो जाता है और वह एक पल जो सत्य है, हमारे हाथ से कब रेत के समान फिसल जाता है, हमें पता ही नहीं चलता। ईश्वर ने सबके प्रस्थान का समय निश्चित कर रखा है। पता नहीं हमें कब जीवन यात्रा को छोड़कर अनंत यात्रा पर जाना पड जाए इसलिए पल के महत्व को समझो और हर पल को जियो और भरपूर जियो। यही जीवन का सत्य है ।                             अभिलाषा चौहान गूगल से संगृहीत

" बूढ़ा दरख्त "

वर्तमान परिवेश पर अपने विचार साझा कर रही हूं..... ************************************************************** जाने कितने वर्षों से वह बरगद का वृक्ष उस चौपड पर खड़ा अतीत की न जाने कितनी घटनाओं का साक्षी था , न जाने कितने जीव-जंतुओं, पथिकों की शरणस्थली था। आज उदासी से घिरा था,वर्तमान परिवेश में उसे अपने ऊपर आने वाले संकट का एहसास था, लोगों की बदली हुई मानसिकता ने उसे हिला दिया था ! सोच रहा था, क्या समय आया है जिससे स्वतंत्रता व ऐशोआराम में बाधा पडे, उसे रास्ते से हटा दो, चाहे वे हरे-भरे वृक्ष हों या फिर बूढ़े मां-बाप ! देखती हूं तो सोचती हूं क्या वास्तव में हम राम-कृष्ण व श्रवण के देश में रहते हैं ? क्या यही हमारे नैतिक मूल्य हैं ? ये कैसे संस्कार हैं, जो वृद्ध माता-पिता को दर - दर भटकने के लिए छोड़ देते हैं या वृद्धाश्रम जाने को मजबूर कर देते हैं। कहां गई हमारी मानवता जो ईश्वर तुल्य माता-पिता पर हाथ उठाने में भी किसी को शर्म नहीं आती! माना वैचारिक मतभेद बढ़ रहे हैं संबंधों में तल्खियां बढ़ रही हैं तो इसका क्या यही समाधान है? आज जब कहीं ऐसा होते देखती हूं तो मन खून के आंसू...

पर्यावरण दिवस

आज विश्व पर्यावरण दिवस है भाषणबाजी और कई तरह के ढोंग होंगे, पर क्या वास्तव में हम चिंतित हैं,  नहीं ! यदि होते तो पृथ्वी का यह हाल न होता। तापमान में वृद्धि और पीने के पानी की कमी का दंश बडे-बडे बंगलों और एसी में रहने वालों को नहीं झेलना पड़ता। महज कागजी कार्रवाई करके पर्यावरण की सुरक्षा करने वाले नौकरशाहों की कथनी-करनी में जमीन-आसमान का अंतर है। मानसून पर निर्भर रहने वाले इस देश में पारंपरिक पेयजल  स्रोतों की उपेक्षा ने भयावह जल संकट खड़ा कर दिया है। हम निरंतर धरती का सीना फाड कर जलदोहन कर रहें है , पर कब तक?  नदियां हमने दूषित कर दी, वन हमने उजाड दिए, हरे - भरे वृक्षों को काटने में हम तनिक देर नहीं करते और बात करते हैं पर्यावरण की! बंजर होती धरती किसी को नहीं दिखती, तड़पते पशु-पक्षी किसी को नहीं दिखते, बस खानापूर्ति की जाती है और कुछ नही , नियम बन जाते हैं पालन हो रहा है या नहीं किसी को नहीं देखना  । मैंने बैंगलोर में एक घर देखा जहां घरमालिक ने पेड को काटा नहीं बल्कि छत ऐसे बनवाई की पेड़ घर के अंदर  आ गया नतमस्तक हो गई उस वृक्षप्रेमी के प्रति। ऐसा जज्बा ...

जीवन दर्शन "भारतीय संस्कृति और परिवार"

भारत में संयुक्त परिवार की प्रथा थी। समय के साथ परिस्थितियों में परिवर्तन आया और एकल परिवारों का जन्म हुआ। इस परिवर्तन के साथ ही जीवन शैली में भी बदलाव आया और मूल्यों का पतन प्रारंभ हुआ। जहां कई पीढियां एक साथ मिलकर रहती थीं, वहां माता-पिता का साथ रहना भी मुश्किल माना जाने लगा। मेरा-तेरा,अपना-पराया, धन-संपत्ति की लिप्सा, बंधनों से मुक्ति, स्वार्थ और भौतिक चकाचौंध ने व्यक्ति की सोच को संकीर्ण बना दिया। परिणाम स्वरूप रिश्ते मरने लगे , प्रेम की जगह स्वार्थ ने ले ली। धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति इतनी हावी होने लगी कि स्वसुख की लालसा में पति-पत्नी का संबंध भी भेंट चढ़ने लगा , जिसका सबसे बड़ा खामियाजा उनकी संतानों को भुगतना पड़ा है जो संतानें पहले परिवार के बीच में प्रेम , त्याग, समर्पण, व सदाचार का पाठ पढती थीं, वे स्वार्थ , एकाधिकार , वर्चस्व का पाठ पढने लगी ।यही कारण है कि समाज में नैतिक मूल्यों का पतन दिनोंदिन बढ़ रहा है। सर्वत्र उच्छृंखलता दिखाई दे रही है। आज भी ऐसे परिवार है समाज में, जो मिसाल बनें हुएहैं जहां अपनापन है वहाँ अलग रहकर भी व्यक्ति अलग नहीं होता और जहां अपनापन नहीं होता वहां...