मातृदिवस पर मेरी भावनाएं
'मां' जिसके बिना अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती।जो कितने कष्ट सहकर शिशु को जन्म देती है।पीड़ा भोगती है किन्तु यह पीड़ा उसे मातृसुख देती है, इसलिए वह इस पीड़ा में भी मुस्कराती है।अपनी संतान का लालन-पालन करने के लिए रात-दिन एक कर देती है।उसकी एक ही ख्वाहिश होती है, कि उसकी संतान को कोई कष्ट न हो,वह एक समर्थ इंसान बने। वर्षों की तपस्या पूर्ण होती है,संतान समर्थ बनती है,किंतु मां के त्याग का मूल्य भूल जाती है। मैं नहीं कहती कि सारी संतानें ऐसी होती है,पर फिर भी ऐसा आस-पास देखने में आता है कि वही मां उनके लिए बंधन और बोझ प्रतीत होती है।जिसने अपना सुख न देखा,वह सदा अपने दुख में अकेली होती है।सबकी अपनी जिम्मेदारियां और मजबूरियां होती हैं,आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में समय का अभाव भी होता है, लेकिन इसका खामियाजा मां को ही भुगतना पड़ता है,जिसने अपना सुख-दुख नहीं देखा,जो बुढ़ापे में भी बस अपनी संतान के सुख की कामना करती है,वही दो मीठे बोल सुनने को तरसती है,आश्चर्य होता है मुझे ऐसी संतानों पर ,जिनके लिए अपनी मजबूरियां मां की तकलीफ़ से बड़ी होती हैं। जो मां क...