कुण्डलिया
१. चंचल चपला सी लली,खोले अपने केश। मुख चंदा सा सोहता,सुंदर उसका वेश। सुंदर उसका वेश,चली वो लेकर गजरा। देखा उसका रूप,आँख से दिल में उतरा। कहती 'अभि' निज बात,मचा है हिय में दंगल। देख सलोना रूप,प्रेम में तन-मन चंचल। २. पायल पैरों में सजे,बेंदी चमके माथ। कानों में कुंडल सजे,कंगन पहने हाथ। कंगन पहने हाथ,गले मोती की माला। ओढ़ चुनरिया लाल,कमर में गुच्छा डाला। कहती 'अभि' निज बात,करे वो सबको घायल। गोरी घूमें गाँव,पहन पैरों में पायल। ३. वामा बोली प्रेम से,आया है त्योहार। सजना अबकी से मिले, नया नौलखा हार। नया नौलखा हार,साथ में कान के बाले। कंगन ला दो नाथ,जड़ाऊ हीरे वाले। वामा की सुन बात,सजन ने माथा थामा। करती मांग अनेक,याद कर करके वामा। अभिलाषा चौहान