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कुछ मन की

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कल विश्व गुर्दा दिवस है।इसका उद्देश्य है लोगों में गुर्दे और गुर्दे से संबंधित बीमारियों को लेकर जागरूकता पैदा करना। ईश्वर न करे कभी किसी को गुर्दे से संबंधित बीमारियों का सामना करना पड़े और यदि ऐसा हो जाए तो अपनों के जीवन को बचाने के लिए हमें गुर्दा प्रत्यारोपण से पीछे नहीं हटना चाहिए।आज के इस युग में यह तकनीक लोगों जीवन दान दे रही है,कृपया भय त्यागकर जीवन रक्षा के इस पुनीत कार्य को आगे बढ़ाएं और लोगों को जागरूक करें।मुझे जब पता चला कि मेरे पति की जीवन रक्षा अब गुर्दा प्रत्यारोपण से ही सकती है तो मैंने गुर्दा दान करना ही श्रेयस्कर समझा।यह ईश्वर की अनुकम्पा ही है कि शायद उसने मुझे इसीलिए बनाया था।सच मानिए एक माह होने को आ रहा है और मुझे कोई परेशानी नहीं है। यह सब यहाँ लिखने का मात्र एक ही उद्देश्य है कि अधिक से अधिक लोगों तक यह बात पहुँचे ताकि लोग जागरूक हो, नीम-हकीम के फेर में पड़कर जीवन से खिलवाड़ न करें और अपनों को और गैरों को जीवन दान देने के लिए आगे आएँ।

जिंदगी एक पहेली

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"जिंदगी कैसी है पहेली हाए, कभी ये हंसाए कभी ये रूलाए।" सच पूछो तो ये जिंदगी एक  पहेली ही है।जब हमें लगता है कि सब अच्छा हो रहा है,सब ठीक है तभी ये  अपना रंग बदल देती है।हम पहेलियां सुलझाते हैं और यह हमें पहेलियों में उलझाती रहती है। 'जिंदगी इम्तिहान लेती है' यह गीत भी इसी फलसफे को सच सिद्ध करता है। मां की कोख में पलने वाला जीवन, उसके ममतामयी आंचल में बढ़ने वाला जीवन ,पिता की छत्रछाया में भविष्य की नीवं रखता बचपन, हंसता-खेलता आगे बढ़ता है। फिर शुरू होते हैं इम्तिहान।ये एक बार शुरू होते हैं तो खत्म ही नहीं होते,ऐसा लगता है जैसे-" जिंदगी हर कदम इक नई जंग है।" इस जिंदगी को कोई मस्तमौला बनकर जीता है और"हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया, मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया"की तर्ज पर जिंदगी जीता है तो कोई इसे बोझ समझ लेता है। "न कोई उमंग है न कोई तरंग है,मेरी जिंदगी तो बस कटी पतंग हैं।"किसी को ये सफर बड़ा सुहाना लगता है-"जिंदगी इक सफ़र है सुहाना, यहां कल क्या हो ,किसने जाना" सही भी है,भला कौन जा...

कीमो एक अनुभव

आज-कल मुझे अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं,क्योंकि मेरी मां को कैंसर हुआ है और उनकी कीमोथेरेपी चल रही है। मैं एक जीवन को बचाने की जद्दोजहद में लगी हूं। आपको यह सब बता रही हूं,इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि मैं अपना दुखड़ा आपसे रो रही हूं,बल्कि वहां जो अनुभव मुझे हुआ,उसे आपसे बांटना चाहती हूं। मैंने वहां जाकर देखा कि जिंदगी की कीमत क्या है?? और कितनी बेवस है जिंदगी हर तरह के कैंसर से पीड़ित लोग,दर्द सहते,मौत से लड़ते और कीमो कीे असहनीय तकलीफ को झेलते,कराहते, बस एक आस लिए कि शायद...। कीमो सिर्फ कैंसर पीड़ितों की नहीं होती बल्कि उनके परिजनों की भी होती है। अपनों की जिंदगी बचाने के लिए बेकरार भागते-दौड़ते,कराहते मरीजों के बीच पता चलता है कि जिंदगी का क्या मोल है?? एक ओर चलती है जिंदगी की जद्दोजहद और दूसरी ओर मानव इसी ज़िंदगी को किस तरह जहन्नुम बनाता है। मैं वहां बैठे-बैठे यही सोचती रहती हूं।जो आदमी मृत्योन्मुख होता है,उसे बचाने की हर संभव कोशिश और जो जीना चाहता है,खुश रहना चाहता  है,उसे मृत्यु-मुख में ढकेलने की कोशिश!! यह फलसफा मेरी समझ से परे है। मेरे कहने क...