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ध्वस्त होती सर्जना

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शब्द भेदी बाण चलते टूटती हर वर्जना रक्त रंजित प्रेम तड़पे क्रोध की सुन गर्जना । टूट बिखरे नीड़ सारे,आँधियां ऐसी चली। सूखते मधुवन यहाँ पर,आग कैसी ये जली। मेघ भी अश्रु बहाते,और धरा मृत सी पड़ी। स्वार्थ शासक बन गया,लोभ की कीलें गड़ी। रोप दी विष बेल ऐसी ध्वस्त होती सर्जना रक्त रंजित प्रेम तड़पे क्रोध की सुन गर्जना। मीत सच्चे स्वप्न से हैं,प्रीत भी बदली हुई। कौन रांझा हीर कैसी, पहेलियां उलझी हुई। पत्थरों से उर हुए हैं,तन दिखें बस फूल से। आचरण ओछे हुए हैं,रिश्ते बने सब धूल से। भोगवादी संस्कृति में  त्याग संन्यासी बना। रक्त रंजित प्रेम तड़पे क्रोध की सुन गर्जना। काल ये कैसा समक्ष है,चूल्हों में सारे घर जले। वो छतें अब मिट गईं हैं,प्रेम फूला जिनके तले। ठौर छीनी तरुवरों की,दरबदर उनको किया। जिंदगी का मोल भूले,करुणा का बुझता दिया। सूर्य डूबा सत्य का लो घिर रहा है तम घना। रक्त रंजित प्रेम तड़पे क्रोध की सुन गर्जना। अभिलाषा चौहान स्वरचित