अश्कों को छुपाके
अपनी ही लबों पर मुस्कानो के पैबंद लगाके, जी रहा हूं यार,अपने गमों को छिपाके। दिल चाक-चाक है,अपनों के रहमो-करम से, फिर भी मुस्कुराता हूं,अपने अश्कों को छुपाके। जख्मों से तार-तार है दामन ये मेरा, जख्मों को रखता हूं परदों में छिपाके। उधड़ती गई ये जिंदगी,मिली जो ठोकरें, पहन तो इसी को रहा हूं अभी रफू कराके। ----------------------------------------------- छिपाने की कोशिशें नाकाम हो रहीं, फिर भी ना हारा हूं , हालातों से घबराके। अभिलाषा चौहान स्वरचित (नोट-रेखांकित पंक्ति मुझे किसी ने दी थी कि इस पर रचना बनाएं,तो यह रचना बनी,अगर इसके लिए किसी को आपत्ति हो तो क्षमाप्रार्थी हूं।)