ये तितलियां डरी-डरी
ये तितलियाँ डरी-डरी,भय से जो हैं अधमरी। सबकी हैं जो सहचरी,सुनो कथा ये दुख भरी। बाग भी उजड़ गए पात-पुष्प झड़ गए काल ये कराल है कौन करे ख्याल है ये भ्रमर दुष्ट डोलते नित रूप-रंग तोलते पंख भी झड़े -झड़े धरा पर पड़े-पड़े प्राण भी अब छोड़ती सबसे मुख हैं मोड़ती आह मन भरी-भरी,चाह भी धरी-धरी। ये तितलियाँ डरी-डरी,भय से जो हैं अधमरी। उड़ सकी न चार दिन जी सकी न आस बिन संग साथ छूट गया और हृदय टूट गया चुभे सब शूल सा स्वप्न उड़े धूल सा भोगती ये दंड क्यों भ्रमर यूँ उद्दंड क्यों बहेलियों के जाल में वासना के ताल में गिद्ध की निगाह से मनचलों की आह से लुटी-लुटी ये तितलियाँ गिरी इन्हीं पे बिजलियाँ सुन रही खरी-खरी,दुख से ये मरी-मरी। ये तितलियाँ डरी-डरी,भय से जो हैं अधमरी। अभिलाषा चौहान