संदेश

आलेख लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मैं कर्त्ता हूं...!!

चित्र
"मैं कर्त्ता हूं "यह सत्य मानकर कर मनुष्य सदा भ्रम का जीवन जीता है।वह स्वयं को सदैव अंधेरे में रखता है।यह जानते हुए भी कि उसके पैदा होने से पहले और उसके जाने के बाद भी यह दुनिया उसी तरह चलती रहेगी जैसे उसके सामने चल रही है। सही मानिए कि जिस मनुष्य इस भ्रम से मुक्त हो जाएगा ,उस दिन ना जाने कितनी समस्याओं का अंत स्वत ही हो जाएगा।पर युग बीत गए लेकिन मनुष्य इस भ्रम को सत्य मानकर जीवन जीता आ रहा है। भौतिक सुखों का दास बनकर जीवन भर भौतिक सुखों का संग्रह करता है और फिर उनका मालिक बनकर स्वयं को कर्ता मान बैठता है, यहीं से सारी समस्याएं जन्म लेती हैं,जीवन का उद्देश्य क्या है?जीवन का वास्तविक अर्थ क्या है?जीवन का आनंद क्या है?वह कभी जान नहीं पाता!! एक मनुष्य के लिए गृहस्थ जीवन सबसे बड़ा तप है।अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने और सृष्टि के सृजन में अपना योगदान देने के लिए संतानोत्पत्ति करना, उन्हें अच्छे संस्कार देना, उन्हें योग्य बनाना और संसाधन जुटाना यहां तक तो ठीक है, सब बढ़िया है पर जब संतान योग्य हो जाए तो भी स्वयं को सर्वेसर्वा मानकर परिवार का संचालन अपने ही हाथों में रखना ग़लत...

मन की मन में मत रहने दो

चित्र
मेरे अपने विचार  जीवन कितना भी निष्ठुर हो, हालत कितने भी अस्थिर हों। चाहे घोर निराशा घेरे हो, तू हार नहीं तू हार नहीं। कहना सरल है लेकिन करना भी मुश्किल नहीं है।आज पढ़ने वाले बच्चों को जीवन हारते देखतीं हूं तो सोच में पढ़ जाती हूं,ये कैसा समय है,कैसी परवरिश है कि बच्चे संघर्ष नहीं कर पा रहे।कोटा कोचिंग सेंटरों के लिए विख्यात है। यहां पूरे देश से बच्चे पढ़ने आते हैं। माता-पिता बड़ी उम्मीदों से बच्चों को पढ़ने भेजते हैं।सबकी यही चाह होती है कि बच्चा डाक्टर बने या इंजीनियर बने,या उच्च पदों पर आसीन हो। माता-पिता उम्मीद तो कर लेते हैं,पर बच्चे का मन नहीं पढ़ पाते।वो घर से दूर रह पाएगा या नहीं?वह इतनी मेहनत कर पाएगा या नहीं?उसके साथ वहां क्या हो रहा है?क्या वह स्थितियों के अनुसार खुद को ढाल पाने में सक्षम है या नहीं?ऐसे बहुत सारे प्रश्न हैं जिनका जबाव शायद किसी के पास नहीं है।आए दिन बच्चे आत्महत्या कर रहें हैं, जिंदगी का मोल समझे बिना कैसे ये बच्चे अपने जीवन का अंत कर देते हैं और क्यों?इसका जबाव शायद उनके माता-पिता के पास भी नहीं है।        सब कुछ अच्छा है लेकिन फिर भ...

ये कहाँ जा रहें हम??

चित्र
समाज के बिगड़ते स्वरूप को देख मन बड़ा व्यथित हैं।हम आगे बढ़ रहें हैं या पतन की ओर बढ़ रहें हैं।हमने क्या पाया है?एक ऐसी पीढ़ी जिसका भविष्य अंधकारमय है।इस अंधकार का जनक संस्कारों का पतन है। साहित्य का सदा से यही प्रयास रहा है कि समाज से अंधकार मिटे ।लोग संस्कारों का महत्व समझें।एक स्वस्थ और सुंदर समाज की रचना हो।पर ऐसा स्वस्थ और सुंदर समाज सदा से कल्पनाओं में देखा है,हकीकत तो बहुत ही दुखदाई है। हमारे पूर्वजों ने समाज को व्यवस्थित रखने के लिए कुछ नियम निर्धारित किए थे।आज वे नियम कहीं दिखाई नहीं देते। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। समाज में बढ़ता अनाचार इसका प्रतीक है।यदि संस्कार नहीं तो शिक्षा का भी कोई औचित्य नहीं है।जैसे बिना मूल के वृक्ष का अस्तित्व नहीं है वैसे ही बिना संस्कार के शिक्षा भी निरर्थक है।आज समाज का अपराधीकरण हो गया है। समाचार पत्र उठाइए तो हत्या,धोखा लूटपाट, आत्महत्या, बलात्कार की खबरों का ही बोलबाला होता है और न्यूज़ चैनल लगाइए तो भी यही सब सुनाई देता है।ऐसा लगता है कि समाज में इसके अलावा और कुछ होता ही नहीं है।टूटते-बिखरते परिवार,बढ़ता अविश्वा...

ये कैसी पर्दादारी..!!

नशा मुक्ति केंद्र में बेटे को तड़पता देख ममता की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी,मात्र अठारह वर्ष का था उसका बेटा। बड़ी मनौतियां मांगी थी,तब गोद भरी और आज यह दशा...!उसे पश्चाताप हो रहा था कि उसने बेटे की गलतियों पर सदा पर्दा डाला...कभी पति को सच नहीं बताया,परिजनों की बात अनसुनी की और आज.?    ऐसे ही न जाने कितने प्रसंग हमें अपने आस-पास देखने को मिलते हैं...पिता बेटे के परीक्षा-परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा है, परिणाम नदारद,कारण मटरगश्ती और काॅलेज बंक, ममता के अंधे पर्दे में उन्हें कभी बेटे की गलतियां नजर नहीं आई।और आज सब कुछ हाथ से निकलता नजर आ रहा है..!    कहने का तात्पर्य यही है कि जीवन में कई बार समस्याओं को पर्दे में छिपाकर समाधान ढूंढा जाता है,जबकि यह किसी समस्या का समाधान नहीं बल्कि एक नयी समस्या का जन्म है।मां के द्वारा बच्चों की गलतियों पर पर्दा डालने की बात हो या पति -पत्नी के मध्य अविश्वास का पर्दा हो या फिर किसी भी बात को एक-दूसरे से छिपाने का प्रयत्न।ये सभी पारिवारिक क्लेश के जन्मदाता है। झूठ,अविश्वास,क्रोध,अज्ञानअहम,लोभ,मोह मानव आत्मा पर पड़े हुए पर्दे ...