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कुंदलता सवैया छंद

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           "कुंदलता सवैया" कुंदलता वार्णिक सवैया छंद है।इस छंद की रचना आठ सगण और दो लघु वर्ण से होती है। इसमें कुल छब्बीस वर्ण होते हैं।इसके चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में बारह वर्णों के बाद यति होती है। 1 जीवन सत्य दिन जीवन के अब बीत चले,मन में हरि का बस नाम जपे हम। चित चंचल है उर भी भटके,अब ध्यान धरें बस मोह करें कम।क्षण-भंगुर जीवन में हमने,कुछ भी न किया मद चूर बढ़ा तम। सच झूठ कभी कब भेद किया, सुख में अटके दुख में भरते दम। 2 जीवन लक्ष्य चल रे मन तू हरि को सुमिरै,इस जीवन का बस लक्ष्य यही रख। वह पालक भी वह तारक भी,बस जीवन में रस देख यही चख। सब नश्वर है बस सत्य वही,नित वंदन पूजन मूरत को लख। मनमीत बना उर में रख ले,यह भाव बना तब वे बनते सख। 3.प्रभू भक्ति  जग में अति सुन्दर नाम सदा, घनश्याम कहो रघुनंदन राघव। तन श्यामल हैं जिनके नयना, कमलों सम वे जग के हित बांधव। जग पालक तारक हारक वे, समझो अपना जग में तुम लाघव। उर ध्यान धरो मन नाम जपो, परमार्थ करो बनके तुम साधव। अभिलाषा चौहान   

चकोर सवैया

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"चकोर सवैया " यह वर्णिक छंद है।इस छंद में चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में सात भगण और गुरू-लघु की यति से 23 वर्ण होते हैं।इसका प्रमुख गुण इसकी गेयता है। वर्ण गणना विधान - 211 211 211 211 211 211 211 21 ********************** राम रटे रसना नित ही मन में बसते सबके बस राम। मोह मिटे सब क्षोभ मिटे मिटता तन से मन से रति काम। मोक्ष मिले भव सागर से मिलता प्रभु के चरणों बस धाम। राम वही घनश्याम वही धर ध्यान सदा जप लो हरि नाम। ********************* आज विराजत राम लला पुर,मंदिर सुंदर निर्मित आज। मंडप अद्भुत शिल्प मनोहर,संत उमंगित पूरण काज। विश्व करे जयकार लगे हर ओर सुहावत राम सुराज। ढोल मृदंग बजे चहुँ ओर गँवे नित गीत बजें सब साज। *****"**************** राम सिया अति सुन्दर शोभित ,देख रहे पुर के सब लोग। आनन पंकज रूप असीम सु, हास सजे तन सज्जित जोग। भाग्य जगे उनके जिनके बन, चातक रूप करें रस भोग। भक्त सदा मन राम रखें उर, प्रेम बसे मिटते सब रोग। ********************** राम पधार रहे पुर में मन, फूल खिले उर हर्षित जान। साध सधी प्रण पूर्ण हुआ जब, मंदिर राम बना पहचान। दीप जले हर ओर सखी जग, में...

मदिरा सवैया(मोहन माधव नाम जपें)

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मदिरा सवैया दीन दयाल दया निधि हे,भव सागर का मद मारक है। मोहन माधव नाम जपें,सुखधाम वही भव तारक है। प्राण बसे जिनके उनमें,सब कष्टन के वह हारक है। जीवन मंदिर सा बनता,हिय केशव का जब धारक है। ________________________ चकोर सवैया माधव मोहन की मुरली सुन,भूल गई सखियाँ सब काज। केशव की छवि मोहक सी मन, डोल रही तन छूटत लाज। भूल गई घर द्वार सभी बस,मोहन का मन मंदिर राज। प्रीत करी जबसे उनसे बस,पीर बढ़ी बिखरे सब साज। ________________________ माधव मोहन मोह रहे मन,देख सखी सिर शोभित मोर। राज करे मुरली अधरों पर,चंचल हास्य लिए चितचोर। पीत पटा तन पे अति शोभित, भानु दिखे नभ पे जस भोर। नैनन से उनकी छवि देखत,चंद्र लगे हम देख चकोर। ________________________ अभिलाषा चौहान 

सवैया छंद प्रवाह

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सवैया छंद सीखते हुए कुछ पदों का सृजन  ।                सुमुखि सवैया 121 121 121 12,1 121 121 121 12 1-सिय वियोग चले रघुवीर तुणीर लिए, मन में सिय का बस़ ध्यान रहे। अनेक विचार उठे मन में,हर आहट वे पहचान रहे। प्रयास करें पर कौन सुने,वन निर्जन से सुनसान रहे। दिखे सब सून प्रसून दुखी,मन पीर वियोग निशान रहे। ========================= 2-राम वन गमन चले रघुवीर सुवीर बडे,मुख चंद्र समान लगे जिनका। सहोदर संग प्रवीण दिखे,बस रूप अनूप लगे उनका। सजे पुर बाग प्रदीप जले,मन मोहित मोद लगे छनका। कहें सब आज तुणीर धरे, ऋषि वेश सुवेश लगे इनका। =========================               गंगोदक सवैया गंगोदक सवैया को लक्षी सवैया भी कहा जाता है। गंगोदक या लक्षी सवैया आठ रगणों से छन्द बनता है। केशव, दास, द्विजदत्त द्विजेन्द्र ने इसका प्रयोग किया है। दास ने इसका नाम 'लक्षी' दिया है, 'केशव' ने 'मत्तमातंगलीलाकर'। 212 212 212 212, 212 212 212 212 1-गोपी विरह देखती राह हैं गोपियाँ राधिका,श्याम भूले नहीं याद आते रहे। आज सूनी पड़ी गाँव की ये गली,प...

सवैया छंद- कृष्ण प्रेम

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1.भक्त की प्रार्थना माधव मोहन श्याम सदा तुम,भक्तन के बनके रखवारे। हे मुरलीधर प्राण बसे तुम,जीवन के बनके उजियारे। दास कहे मनकी सुनलो अब,मोह फँसे हम हैं दुखियारे। मीन बिना जल के तड़पे अब,घेर रहे तम बादल कारे। 2.कृष्ण सौंदर्य पट पीत सजे वनमाल गले,अधरों पर चंचल हास्य सखी। सिर मोर पखा लड़ियाँ लटके,मुरली कर में अभिराम दिखी। मन मोह लिया सुध भूल गई,नयना तकते अविराम सखी। यमुना तट धेनु चरावत वे,छवि नैनन से दिन-रात लखी। अभिलाषा चौहान

राम वनवास

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सवैया छंद राम चले वनवास सखी,नयना सबके नदियाँ बहती। लोचन पंकज से दिखते,सुन बात सभी सखियाँ कहती। लक्ष्मन संग सिया चलती,मुनि वेश धरे महलों रहती। आज अनाथ हुए सब हैं,यह शूल चुभे बस हैं सहती। अभिलाषा चौहान

सवैया छंद (गोपी व्यथा)

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सवैया छंद 1. मुरली बजती सुन माधव की, सखियाँ यमुना तट दौड़ चली। अखियाँ तरसे हरि दर्शन को, मन में पलती इक आस भली। मन में बसते बस श्याम सखी,उनसे मिलना यह चाह पली। दिन-रात बसे छवि नैनन में ,उनसे अनुराग विराग जली। 2. भँवरे सम श्याम सखी लगते, रस जीवन का सब लूट गए। जबसे हमको वह छोड़ दिए ,सुख तो हमसे सब छूट गए। लिखदीं पतियाँ उनको कितनी, कितने सपने अब टूट गए। लगता अब जीवन शून्य हुआ, मुझसे जबसे वह रूठ गए। अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक