निष्ठा वीर सपूतों की
मातृभूमि के वीर सपूत, थी निष्ठा उसकी सेवा की। बांध कफ़न वे निकल पड़े, पीछे मुड़कर फिर देखा नहीं। खायी थी कसम मरमिटने की, मुखमंडल पर था तेज बड़ा। भुजाओं में थी शक्ति बड़ी, शत्रु का दिल भी धड़क उठा। मृत्यु उनकी थी सहचरी, निष्ठा में थी न कोई कमी। मृत्यु को भी थे जीत चले, पीठ कभी भी दिखाई नहीं। हंसकर फांसी पर झूले, थे वतन के वो परवाने। धधक रही थी आजादी की, शमा के थे वो बस दीवाने। मां-बाप वतन ही था उनका, आंखों में था बस सपना एक। लहराए तिरंगा अपना फिर, सबका था लक्ष्य यही बस नेक। पूरी निष्ठा और समर्पण से आजादी की लड़ी लड़ाई थी वह शुभ-दिन जीवन में आया कसमें जिसकी उन्होंंने खाई थी अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक