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बस इतनी सी बात

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मौत से पहले मौत की आहट सुन काँपती रूहें अधमरी गिरती टूटती साँसे खौफ से काले पड़े चेहरे पर पथराई फटी आँखें देखती मंजर अपने जनाजे का जिससे दूर है काँधा गैरों सी जिंदगी हमनवा मौत की बन खीसें निपोरती पल्ला झाड़कर दूर खड़ी अगूँठा दिखाती आदमी से दूर होता आदमी आँखों में सूखे सागर को पीता हुआ धरती और आसमान के बीच सूखे तिनके सा बस जल रहा है अपने न होने का  धुधँला अहसास चौतरफा मार अव्यवस्था में गेंद सा न जाने किस-किस के हाथों में उछलता करता पूरा है से था बनने का सफर बस इतनी सी बात ??

अंधा बाँटे …????

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पुरखों के त्याग सूद संग जो वसूलते हैं। जनता की भावना से खेल नित खेलते हैं। श्वेत वस्त्रों में छिपे काले उनके कारनामे कागज़ों में देश का विकास वो तोलते हैं। सत्ता- शक्ति का चहुँओर बोलबाला है। झूठों की जय, सच्चों का मुँह काला है। भ्रष्टाचार के वस्त्र तंत्र पहने बैठा है। आदमियत पर अंधेपन का मुखौटा है। भानुमती का कुनबा गठजोड़ कर बैठा है। हर कोई एक-दूसरे से लगे ऐंठा-ऐंठा है। जाति धर्म असमता की बढ़ती लकीर है। सत्य- ईमान आज सबसे बड़े फकीर है। अंधा बाँटे रेवड़ी अपनों को देता है। योग्य बेचारा सिर धुनकर रोता है। अपनों में बाँटी जाती खूब मलाई है। ईमान - योग्यता ने मुँह की खाई है। अंधों के आगे नैना वाले हार मान बैठे हैं। रोते-रोते अंधों के तलवे ही चाट बैठे हैं। अंधों के राज्य में आँखों का काम है। लाठी जिसके हाथ बस उसका ही नाम है। आजादी की छाँव में धूप से तन सेंके हैं। जिंदगी की नाव को बिन पानी खींचें हैं। बँटती जो रेवड़ियाँ , नंबर कहाँ आता है। बैठै-बैठे अंधों का बस मुँह देखा जाता है। अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक