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सवैया छंद (गोपी व्यथा)

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सवैया छंद 1. मुरली बजती सुन माधव की, सखियाँ यमुना तट दौड़ चली। अखियाँ तरसे हरि दर्शन को, मन में पलती इक आस भली। मन में बसते बस श्याम सखी,उनसे मिलना यह चाह पली। दिन-रात बसे छवि नैनन में ,उनसे अनुराग विराग जली। 2. भँवरे सम श्याम सखी लगते, रस जीवन का सब लूट गए। जबसे हमको वह छोड़ दिए ,सुख तो हमसे सब छूट गए। लिखदीं पतियाँ उनको कितनी, कितने सपने अब टूट गए। लगता अब जीवन शून्य हुआ, मुझसे जबसे वह रूठ गए। अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक