कुंडलियाँ छंद-अभिलाषा चौहान
सागर सम संसार में,मानव बूँद समान। नश्वर जीवन पर भला ,क्यों करता अभिमान। क्यों करता अभिमान,मोह में रहता अटका। माया में मन हार,स्वार्थ में रहता भटका। कहती 'अभि' निज बात,बूँद से भरती गागर। करले अच्छे कर्म,बूँद बनती है सागर। माटी से ये तन बना,साँसों की है डोर। प्राण-पतंगा मन बसा,धड़कन करती शोर। धड़कन करती शोर,करें तू क्यों मनमानी। तेरा किस पर जोर,समझ पर फेरा पानी। कहती 'अभि' निज बात,घड़ी मस्ती में काटी। धड़कन होगी बंद,मिले माटी में माटी। अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक