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कुंडलियाँ छंद-अभिलाषा चौहान

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सागर सम संसार में,मानव बूँद समान। नश्वर जीवन पर भला ,क्यों करता अभिमान। क्यों करता अभिमान,मोह में रहता अटका। माया में मन हार,स्वार्थ में रहता भटका। कहती 'अभि' निज बात,बूँद से भरती गागर। करले अच्छे कर्म,बूँद बनती है सागर। माटी से ये तन बना,साँसों की है डोर। प्राण-पतंगा मन बसा,धड़कन करती शोर। धड़कन करती शोर,करें तू क्यों मनमानी। तेरा किस पर जोर,समझ पर फेरा पानी। कहती 'अभि' निज बात,घड़ी मस्ती में काटी। धड़कन होगी बंद,मिले माटी में माटी। अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक

'अभि' की कुण्डलियाँ

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                 " वेणी"                  ****** वेणी गजरे से सजी, चंचल सी मुस्कान। कान्हा के उर में बसी,गोकुल की है शान। गोकुल की है शान,सभी के मन को मोहे। जैसे हीरक हार,रूप राधा का सोहे। कहती 'अभि' निज बात,प्रेम की बहे त्रिवेणी। दीप शिखा सी देह ,सजा के सुंदर वेणी।                " कुमकुम"                 ******* कुमकुम जैसी लालिमा,बिखरी है चहुँ ओर। जग जीवन चंचल हुआ,हुई सुनहरी भोर। हुई सुनहरी भोर,सजे हैं बाग बगीचे। जाग उठे खग वृंद,कौन अब आंखें मीचे। कहती 'अभि' निज बात,रहो मत अब तुम गुमसुम। सुखद नवेली भोर ,धरा पर बिखरा कुमकुम                  " कजरा"                   ******* भोली सी वह नायिका,चंचल उसके नैन। आनन पंकज सा लगे,छीने दिल का चैन। छीने दिल का चैन,आंख में काजल डाले। मीठे उसके बोल, ...

सड़कों का हाल

सड़कें मेरे देश की,कैसा इनका हाल। टूटी-फूटी ये रहे,लोग रहें बेहाल। लोग रहें बेहाल,गिरे गड्ढों में गाड़ी। मरते कितने लोग,बनी हैं जैसे खाड़ी। कहती अभि निज बात,चलो तो दिल है धड़के। लेती जीवन लील, बनी गड्ढा ये सड़कें। २ सड़कों का देखो सखी, बहुत बुरा है हाल। जनता धक्के खा रही, मरे किसी का लाल। मरे किसी का लाल, किसी के घर हैं उजड़े। नेता सुने न बात, हाल सड़कों के बिगड़े। कहती अभि निज बात, लगे अंकुश लड़कों पर। हुए निरंकुश देख, तेज वाहन सड़कों पर। अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक

औकात

कठिन समय पर ही सदा,लगता है आघात। मित्र,बंधुवर की सदा,दिख जाती औकात। दिख जाती औकात,काट वे कन्नी जाते। संकट में जब जान,फटी वे जेब दिखाते। कहती अभि निज बात,पता चलता है पल-छिन। अपनों की पहचान, करा देता समय कठिन। सत्ता के पड़ फेर में,भूले अपनी औकात। सूली पर नित चढ़ रहे,जनता के जज्बात। जनता के जज्बात,फिरे वह मारी-मारी। भ्रष्टाचार अपार, करें कालाबाजारी। कहती अभि निज बात,वादे का फेंके पत्ता। भटके युवा समाज,लगे बस प्यारी सत्ता। आया कैसा वक्त ये,टूट रहे परिवार। स्वार्थ के पड़ फेर में, अपनों से ही रार। अपनों से ही रार,करें अपनी मनमानी। भार बने मां -बाप,बहे आंखों से पानी। भूल गए औकात,असल ये रूप दिखाया। अपना सुख बस याद,कैसा वक्त ये आया। अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक

कुंडलियां छंद

"हालात" सारा देश उबल रहा, बड़े बुरे हालात। कैसा ये अधर्म हुआ,लगा बहुत आघात। लगा बहुत आघात,समय कैसा है आया। बना युवा उद्दंड,देख के मन घबराया। नहीं रहा संस्कार,चढ़ा रहता है पारा। बाल-वृद्ध लाचार,देखा खेल जो सारा। जलती बेटी आग में ,कैसे ये हालात। नरभक्षी मानव बना,करे घात पर घात। करे घात पर घात,हवस का बना पुजारी। करता मीठी बात,बना तलवार दुधारी। कहे अपना खुद को,मुंह से लार टपकती। बहू हो या बेटी,देखी आग में जलती। बढ़ती जाती कीमतें,प्याज छुए आकाश। आम आदमी पिस रहा,जाए किसके पास। जाए किसके पास,सभी है मन के राजा। बुरे हुए हालात,बजा है उसका बाजा। उड़ी हुई है नींद, गृहस्थी कैसे चलती। कमर तोड़ती आज,नित मंहगाई बढ़ती। अभिलाषा चौहान सादर समीक्षार्थ 🙏🌷