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पौध

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  पौध  नीति नियम संस्कारों की पौध  हमारी संस्कृति सुविचारों की धीरे-धीरे  मरती जा रही है  जंगली खरपतवार  उग रही है जगह-जगह  जंगलियत का पनपना बताता है हमें  हमारा अतीत वो अतीत जिसे हमने संस्कार,नीति-नियम के सुंदर उपवन में  छिपा दिया था कभी लेकिन....? जहर कभी मरता क्या अब वही जहर सशक्त बन रहा है  जहरीली पौध उर्वरता को कर रही नष्ट पक्की बंजर जमीन पर कहाँ फूटते अंकुर नहीं खिलते सद्भावनाओं के फूल जगह-जगह उगते देखा मैंने जंगली बबूल को जिसके कांटे नश्तर से चुभते हैं  जो नहीं देता छाया जिसमें नहीं लगते फल परोपकार के  अब तो हर ओर बस पनप रहें हैं ये जंगली पौधे स्वार्थ लोभ छल मद के बीज घर के भीतर भी मैंने इन्हें उगते देखा है  नई पीढ़ी  ये जंगली बबूल दे रहे नित समस्याओं को जन्म बेशर्मी से पनपती यह पौध छीन रही मानवीयता की सुंदरता  हम बेबस से देख रहे हैं  हमने ही की है गलती समय रहते नहीं दिया ध्यान  उगने दिया इस जंगली पौध को  जिसने मूल्यों को रख दिया है ताक पर  बेशर्म सी यह जंगली पौध सिर उठाए बढ़ती जा रही ह...

नमी

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नमी सूख रही है  वो नमी  जो बेहद जरूरी है  तभी पनपते हैं बीज दया के ,करुणा के  तभी फूटता है अंकुर  प्रेम का,सद्भाव का इस सूखती नमी से  बंजर हो रही भूमि हृदय की.. लग रही है दीमक मूल्यों में, संस्कारों में  स्वार्थ की दीमक चट कर जाती है रिश्ते इन खोखले तनों में  नहीं उगती जीवन की कोंपल नहीं खिलते फूल सर्वनाश की आहट  हर रोज सुनाई देती है  दहलीज़ों के अंदर अब उजाड़ सा है जीवन बाड़े में बंधे पशुओं की तरह लड़ते-झगड़ते दूसरों की क्षति में अपना लाभ ढूंढने की संस्कृति सिर चढ़ रही है मर्यादा की सीमाएं  उफनती वासना की नदी नित तोड़ रही है टूटती सड़कों से हो गए हैं रिश्ते  सड़कें जो खुद टूटी हैं असहाय सी देखती बदहाली  स्वसुख से बड़ा धर्म शायद अब कोई नहीं है  गीता का ज्ञान  कर्म करो ,फल की चिंता मत करो अंगीकार कर बिना सोचे-विचारे लोग कर रहे कुत्सित कर्म पाषाण हृदय में  नहीं है कोई निर्झर नमी के अभाव से पनप रहे हैं मरुस्थल  जिनमें उगे बबूल नहीं देते छाया मिलते हैं शूलों का दंश......? अभिलाषा चौहान 

बात छोटी -सी

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तने ने  सभी शाखाओं को मजबूती से थाम रखा था भ्रम था उसे अपने अस्तित्व पर भूल गया था जड़ को उपेक्षित जड़ कुंठा में रोगी बन गई  लग गई दीमक और सूखने लगा तना भी जड़ और तने की निर्बलता  शाखाओं पर बिजली सी गिरी अधर में लटकी शाखाएं  जड़ और तने के बिना एक पल में बिखर गई  सूख गया रस नहीं बची पनपने की राह पड़ गई अलग-थलग  जीवन के लिए  दोनों ही जरूरी है  ये शाखाओं ने उस दिन जाना जिन्हें गुरुर में  कभी अपना ना माना...!! 2. तना  तना हुआ...!! अपनी मजबूती पर इतरा रहा था; शाखाओं को देखकर मुस्करा रहा था; अहम से भरा अपने वजूद की अहमियत बता रहा था; जड़ बेचारी,दबी,सहमी,उपेक्षिता  मौन होकर सब देख रही थी; इनकी अज्ञानता पर  मन ही मन रो रही थी; जिनको सहेजने में लुटा बैठी सब वह तेज अपना खो रही थी..!! अपनी जड़ों को भूलकर  भला कोई कैसे पनप सकता है?  यह सत्य तब साक्षात हुआ...! जड़ की निर्बलता से तने की जड़ता खोने लगी...!! शाखाएं वजूद के लिए  लड़ने लगीं...!! उस दिन अहसास हुआ..; बिना जड़ के भला कौन  खास हुआ...? बात छोटी सी थी पर मन उदास हु...

यादें....

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यादें उमड़ते बादलों सी देती हैं सौगातें  दिलाती हैं हर पल याद  ये जो पल तुमने जिए यही है तुम्हारी असली धरोहर खट्टी-मीठी इमली सी सौंधी मिट्टी की गंध सी महकती बयार सी इठलाती नवयौवना सी बिन बुलाए मेहमान सी  कभी भी चली आती हैं  कभी हंसाती तो कभी रुलाती हैं ये धन,वैभव, संपत्ति भी नगण्य है इनके समक्ष इनके लिए होते हैं मतभेद टूटते हैं घर बिखरते हैं रिश्ते  क्षीण पड़ती संबंधों की डोर बस ये यादें ही अपनी सबसे सगी होश संभालते ही यादें देने लगती हैं साथ दिल की धड़कन सी झपकती पलकों सी चलती सांसों सी कौन छीन सकता है भला ईश्वर भी नहीं  यही है बस अपनी अकेलेपन की सच्ची साथी प्राणों के लिए जैसे बाती कराती हैं भूलों का अहसास  बुझाती अपनेपन की प्यास ये यादें जो संचित है  ये सिखाती है जीवन का महत्व  यही है जीवन का सार तत्व  वर्तमान और भविष्य भी इनके समक्ष है नगण्य  यादें जो चली आती हैं  पखेरु सी चुगती है दाना और फिर कर देती है संचार  प्राणों में उत्साह का या छलकता निर्झर आह का  लेकिन फिर भी ये सत्य है  हम हैं ये तब भी हैं  और ह...

बस पतझड़ बाकी है.....

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मिट सकता है क्या कभी अंतर  स्त्री-पुरुष का..! तुम्हें है अहम सर्वज्ञता का मैं अज्ञ सदा से मेरा विज्ञ होना  तुम्हें झकझोरता है.! तन जाते हैं तुम्हारे नथुने पड़ जाती हैं तुम्हारे भवों में सिलवटें गुर्राहट तुम्हारी अचानक से मुझे दिलाती है याद वीरान जंगल में एकत्र हिंसक जानवरों की। उनमें खो जाती है तुम्हारी पहचान डर जाती हूं मैं जब घिर जाती हूं इतने हिंसक जानवरों से..!! मिटेगा अंतर कभी समझ का मैं झुकती जाती हूं मिटाती अपना अस्तित्व तुम्हें समझने में...और तुम और ऊंचे होते चले जाते हो...! बन जाते हैं हम दो छोर कैसे मिटेगा अंतर...!! ताली दो हाथों से बजती है कमी सामंजस्य की समर्पण की बना देती है नदी के दो  किनारे.…!! जो चलते हैं साथ पर मिलते नहीं कभी पुरुष-स्त्री प्रतीक हैं अर्धनारीश्वर का मैं-तुम का विलय देता है सृष्टि को नवरुप यही सत्य,यही शिव,यही सुंदर है जो मात्र है एक स्वप्न हम बने हैं दो ध्रुव सिमटे हुए खुद में ख़ो दिया है हमने जीवन का बसंत बस पतझड़ ही बाकी है। अभिलाषा चौहान 

मुर्दे

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अभी तक सुना था कि होता है नरक...!! मैंने देखा नरक को...!! रिश्तों के नाम पर जुटे स्वार्थी लोग अपनी लोभ-पिपासा के लिए  लाश के पास चिल्लाते समझ से परे मरा कौन था....? वो जो भूमि पर पड़ा था जड़ निर्जीव...!! या जो लड़ने को खड़ा था आत्मा से रहित निर्जीव  भावनाशून्य....!! मैं अवाक...? संवेदनाशून्य इस जगत में  चिता की अग्नि पर स्वार्थ की रोटियां सेंकते ये मुर्दे आज  हर घर में मौजूद हैं ..!! जिनके अंदर बसा है मरुस्थल जिनकी अंदर की नदी सूख गई है...!! पेट की आग इनके लिए  इतनी बड़ी है...!! लाश भी इनके सवालों  पर बेबस पड़ी है ...!! सिसकती है मृतात्मा  इन पापियों के लिए  मैंने क्या कुछ ना किया क्यों ना स्वार्थी बन जिया ये क्या जाने किसी का दर्द पत्थर से भी गए-बीते संस्कार से रहित भौतिक संपत्ति का लालच बना देता है इन्हें अंधा ये अंधे जौंक बनकर  चूसते हैं रक्त और एक दिन मर जाते हैं  इनका जीवन नहीं आता किसी के काम ये मुर्दे जो स्वर्ग को  बना देते हैं नरक....?? अभिलाषा चौहान 

क्या भूलूं क्या याद करूं!!

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क्या भूलूँ क्या याद करूं  कैसे मन में अब धीर धरुं सूना जग सूना मन  तुमसे पाया जीवन धन  छाया बनकर साथ रहे पीर कहे अब किससे मन। क्या भूलूं.................? छूटा ममता का आंचल  क्रूर कठिन आया ये पल छिना पिता का भी साया छलक रहे आंसू छल-छल। क्या भूलूं....................? सागर दुख का लहराया छाई अमावस की छाया खड़ी अकेली सोचूं मैं  हे प्रभू कैसी ये माया!! क्या भूलूं......................? मां की ममता क्या छूटी खुशियां सारी सब रूठी पिता बिना बेवश सी मैं विपदाएं आकर टूटीं !! क्या भूलूं........................? जीवन लगता तपती धूप सूख गए अब मन के कूप टूट गए सारे बंधन जग ने दिखाया ऐसा रूप!! क्या भूलूं.........................? मात-पिता सा प्रेम कहां  लुटा-लुटा सा लगे जहां  रीता-रीता सा है जीवन कौन करे भरपाई यहां !! क्या भूलूं........................? रिश्तों के कड़वे रूप दिखे जिनमें स्वारथ के लेख लिखे इंसान का कितना मोल यहां  जिंदों में मुर्दे खड़े दिखे!! क्या भूलूं.......................? हृदय में जिनके लोभ गड़ा आंखों में मद भी रहा अड़ा पत्थर भी जिनसे शर्मिं...

जोड़ा कितना मेला

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जोड़ा कितना मेला, जग का सभी झमेला। पर काम नहीं कुछ आया, फिर भी पड़ा अकेला। ये रिश्ते नाते झूठे, क्यों माने इन्हें अनूठे। सब स्वार्थ के हैं साथी, वक्त पड़े सब रूठे। छोड़ो चिंता सारी, माया तलवार दुधारी, इसमें उलझोगे जितना, संकट झेलोगे भारी। कर्तव्य निभाओ अपना, पर देखो क्यों ये सपना। उम्मीदों से दिल टूटे, फिर दुख पड़ता है सहना। जीवन नश्वर ये सारा, दुख का सागर ये खारा। मृत्यु शाश्वत सत्य है, सबको बनना है तारा। ईश कृपा जब होगी, मानो खुद को सुखभोगी। चिंता करके क्यों सूखे, बनते हो दुख के रोगी। ये दुख खुद तुमने बोया, लालच मन में था सोया। सब मेरे अपने हो जाएं, पर मन का चैन ही खोया। मन करता है मनमानी, तन बूढ़ा हार ना जानी। तन-मन की इस उलझन में, जीवन होता बेमानी। बस सच है तो वो पल है, जो सुख से जीया कल है। रोना किसको सुनना है, सब उम्मीदों का छल है। अंत समय तू अकेला, पीछे छूटे जग मेला। तू जोड़-तोड़ में उलझा, जाएगा संग कब धेला ? रोते-रोते जग में ही आया, बचपन खुशियां ही लाया। फिर तूने दुख ही पाले,  सच भूला मन भरमाया। चिड़िया से सीखो जीना, बच्चों से ना उड़ना छीना। तुम उनको बांधों बंधन में, तो कष्...

जमी है बर्फ

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  बर्फ आसमान से नहीं गिरती बूंद ही बनती है बर्फ धरती तक आते-आते आजकल हर ओर जमी है बर्फ...!! इस बर्फ ने दबाया उबलता लावा जमा दिया है रक्त जम गईं वे झीलें जहां संवेदन थी लहरें  छीन ली रौनकें जिंदगी की सर्वत्र है यही बर्फ.... जो जड़ है जड़ता का यह साम्राज्य जिससे चल रहा है अब भी अस्तित्व का संघर्ष प्रयास भी कि कभी यह बर्फ पिघल जाए और निकल आएँ अंकुर लहलहाने लगे जिंदगी चमकने लगे सत्य सूर्य की तरह यह बर्फ जो जरुरी है प्रकृति के लिए ..... लेकिन दुश्मन है मानवीयता की इसके जमने से  जीवंत होती निष्क्रियता परिवर्तन की चाह होती बेमानी  बर्फ की सतहों में दबे वायरस सक्रिय हैं  मिटाने को इंसानियत बुराई इसीलिए है शक्तिमान अच्छाई के समक्ष बर्फ में दबी अच्छाई हो जाती है दुर्बल भूल जाती है अहमियत अपनी। अभिलाषा चौहान 

मुक्तक

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मुक्तक विधान  मुक्तक में सामान्यतःचार पंक्तियाँ होती है।चारों पंक्तियों में मात्रा भार समान होता है।मुक्तक में लय और सुविधानुसार मात्रा निर्धारित की जा सकती है।इसकी चारों पंक्तियां अपने आप में भाव को अभिव्यक्त करने में सक्षम होती हैं। अर्थात मुक्तक चार पंक्तियों में भाव को अभिव्यक्त करने में सक्षम। इसके लक्षण निम्न प्रकार के हैं - १)मुक्तक पूर्वापर संबंध से मुक्त होते हैं।अर्थात यदि मुक्तक काव्य के रुप में प्रयुक्त हो रहा है तो उसका प्रत्येक छंद अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र होगा। २) मुक्तक में प्रथम,द्वितीय और चतुर्थ पंक्ति तुकांत और तीसरी पंक्ति अतुकांत होती है। ३) गेयता और लयात्मकता मुक्तक का गुण है। इसलिए वर्ण या मात्रा का ध्यान रखा जाता है। ४) मुक्तक  चार पंक्तियों की ऐसी कविता रचना है।जो नियमबद्ध व लयबद्ध तरीके से किसी घटना या भाव को स्वतंत्र व सम्पूर्ण रूप से प्रकट करनें में सक्षम हो। यहां मैंने १६ मात्रा के मुक्तक लिखे हैं।इनका मात्रा भार कथन के हिसाब से बदल सकता है।ये २४,२८ मात्राओं वाले भी हो सकते हैं। मात्राएं समान होने से लय भंग नहीं होती। उदाहरण - कैसे-कैसे ये दिन...

मन की मन में मत रहने दो

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मेरे अपने विचार  जीवन कितना भी निष्ठुर हो, हालत कितने भी अस्थिर हों। चाहे घोर निराशा घेरे हो, तू हार नहीं तू हार नहीं। कहना सरल है लेकिन करना भी मुश्किल नहीं है।आज पढ़ने वाले बच्चों को जीवन हारते देखतीं हूं तो सोच में पढ़ जाती हूं,ये कैसा समय है,कैसी परवरिश है कि बच्चे संघर्ष नहीं कर पा रहे।कोटा कोचिंग सेंटरों के लिए विख्यात है। यहां पूरे देश से बच्चे पढ़ने आते हैं। माता-पिता बड़ी उम्मीदों से बच्चों को पढ़ने भेजते हैं।सबकी यही चाह होती है कि बच्चा डाक्टर बने या इंजीनियर बने,या उच्च पदों पर आसीन हो। माता-पिता उम्मीद तो कर लेते हैं,पर बच्चे का मन नहीं पढ़ पाते।वो घर से दूर रह पाएगा या नहीं?वह इतनी मेहनत कर पाएगा या नहीं?उसके साथ वहां क्या हो रहा है?क्या वह स्थितियों के अनुसार खुद को ढाल पाने में सक्षम है या नहीं?ऐसे बहुत सारे प्रश्न हैं जिनका जबाव शायद किसी के पास नहीं है।आए दिन बच्चे आत्महत्या कर रहें हैं, जिंदगी का मोल समझे बिना कैसे ये बच्चे अपने जीवन का अंत कर देते हैं और क्यों?इसका जबाव शायद उनके माता-पिता के पास भी नहीं है।        सब कुछ अच्छा है लेकिन फिर भ...

कभी-कभी

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कभी-कभी लगता है ऐसा कि  हम खो रहें हैं या डूब रहें हैं हमारी उदासीनता बना देती है हमें निष्क्रिय हम होते हुए भी नहीं होते  हमारे शब्द अंदर ही घुटते मचलते हैं बाहर आने को पर एक सोच...? जो हावी हो रही है सब पर कौन सुनेगा...? हमारी बेसिर -पैर की बेतुकी बातें..? सब डूबें हैं अपने ख्यालों में जुड़ने की प्रक्रिया...? अब ले चुकी है विराम सोशल मीडिया की चमक में बनने सितारा लगा रहें हम अंधी दौड़ भूलकर कि हमने क्यों उठाई थी कलम..? कलम-कागज भी कहां हैं अब तो नया जमाना है वही बिकता है जो चमकता है...!! हम जैसे चमकहीन पुरातनपंथी..? इस दौड़ में हार चुके हैं हमारे जज़्बात...? किसी को रास नहीं आते सीख लिया है हमने हारना...!! हार जो आसानी से हो जाती है नसीब छोड़ दिए हैं प्रयास क्या करना है हमें...? चमक नहीं सकते तो छुपे रहना ही ठीक है आज श्रेष्ठता का मापदंड लाइक्स और फाॅलोअर्स हैं फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या कर रहें हैं..? इस अंधी दौड़ में  भुलाकर सभी मायने हमने बस पहने हैं मुखौटे...!! हम नहीं चाहते कि कोई देखे हमारे अंदर की आग...? हमारी चिंता...? हमारी परेशानी...? सफलता का ढोंग करते हैं हम...

साथ दो,स्वामी बनो

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झड़े हुए पीले पत्ते चल पड़े अपनी यात्रा पर  अपनी विरासत  सौंप दी उन कोंपलों को कर दी जगह ख़ाली पर कुछ हठी पत्ते अब भी कर रहे संघर्ष नयी पीढ़ी से है उनका टकराव नहीं छोड़ना चाहते स्थान उनका अहम है सर्वोपरि नयी कोंपलों को सिखाने दुनियादारी अपने अनुभवों से बैठें हैं अपने स्थान पर अड़कर उनकी यही जड़ता है परिवर्तन की राह का रोड़ा आंधियों के थपेड़े सूरज की तपिश  बारिश की मार सिखाती है संघर्ष करना खुद को स्थापित करना स्वयं को सर्वज्ञ समझना है पीले पत्तों की भूल परंपराओं की रूढ़ियां और उनका अहम कोंपलों में भर देता है रोष टकराव और दूरियों के जनक उदारवादी बनो समय के साथ बहो स्वीकारो सत्य ये संसार किसी का नहीं सम्मान करो उन कोंपलों का ,जो तुम्हारी परंपरा को  इस सृष्टि को संवारना  चाहती हैं साथ दो ,स्वामी न बनो। अभिलाषा चौहान 

कभी सोचा तो न था...???

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  दुशासन के पंजों में सहमी बेसुध मर्यादा  सहस्त्र बाहु दुशासन की अट्टहास ,भद्दी टिप्पणियों से जलती उसकी रूह पथराई आंखों में  खौफ का तांडव  ऐसा भी होगा कभी सोचा तो न था...?? भक्षकों की अनियंत्रित भीड़ में कोई रक्षक तो न था...?? चीरहरण को रोकने कोई कृष्ण तो न था..?? असुरों की फौज में असहाय कठपुतली सी अपनी आंखों को भींचे तन पर रेंगते असंख्य  सर्पों के दंश ऐसे होगा उसका विध्वंस  कभी सोचा न था...?? सीता का हरण द्रौपदी का चीरहरण हर युग में होगा और  बार बार होगा  कभी सोचा तो न था...?? राम और कृष्ण का भय अब किसी को कहां रावण और दुशासन का राज हर ओर होगा कभी सोचा तो न था...?? सभ्यता के चरणों में संस्कृति का मरण  ऐसे होगा कभी सोचा तो न था..?? सभ्य समाज की  बढ़ती असभ्यता का भुगतेंगी दंड बेटियां कभी सोचा न था...?? अभिलाषा चौहान 

कितने विवश हैं हम

खेत में खड़ी फसल पर ओलों की मार आकाश में उड़ते बादलों से बारिश की मनुहार बीज बुआई के बाद बारिश की आस नदियों के सिमटते आकार दरकते पहाड़ों का हाहाकार व्यग्र धरा की पुकार प्रकृति का रौद्रावतार सूखे कुओं में प्यासी बाल्टियां  पोखर में तरसती मछलियां  झोंपड़े में धधकती भूख आग की लपटों में भस्मीभूत खलिहान फुटपाथ पर फैले हाथ मखमली गद्दों पर करवटें  एसी में टपकता पसीना तपती धूप में श्वेद से शीतल तन थैले भर पैसों में मुट्ठी भर जरूरतें अस्पताल की चौखट पर सांसों का संग्राम सड़कों पर मंडराती मौत कितने विवश हैं हम सत्य को नकारते स्वयं से हारते झूठ का मुखौटा लगाए जिंदगी को तिजोरी में बंद कर कर रहें हैं संग्राम जिंदगी के लिए कितने विवश हैं हम कुछ भी नहीं है...! पर सब कुछ होने का करते हैं ढोंग सत्य को अनदेखा कर भरते श्रेष्ठता का दंभ कितने विवश हैं हम ....?? अभिलाषा चौहान 

हे ईश्वर....

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  हे ईश्वर! मुझमें है तेरा अंश तूने चुना है मुझे संघर्ष के लिए तेरा मुझमें होना यही है सर्वस्व मेरे होने का क्या महत्व महत्व है तेरे होने का  तू साथ है पग-पग पर विश्वास है इस मायावी दुनिया में भ्रमित मन जब भी तुझे भूलता है तभी उस अहम को एक पल में करा देता है  नगण्यता का अहसास करा देता है कर्तव्य बोध चल पड़ते हैं कदम उन कंटीली राहों पर जिसे चुना है तूने सिर्फ मेरे लिए हे ईश्वर...! तेरा बोध दुख के समंदर में देता है सहारा बस तू ही है मेरी आस जन्मों की प्यास मन का उजास। अभिलाषा चौहान 

जगा देता है आस

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समय के थपेड़े हिला देते हैं आत्मविश्वास..! डूबती-उतराती जीवन की नैया को भंवर से बचाने की कोशिश  कांपते हाथों में थामे पतवार लहरों से लड़ने की जद्दोजहद और अकेलापन....? खोखले रिश्ते में  दम तोड़ता अपनापन.. स्वार्थ की अमा उम्मीद की बुनियाद को चुनती दीमक सी.... नैराश्य के बादलों से दुख की बरसात... छीन लेना चाहती है जीवन का सुकून। फिर भी झिलमिलाती है अंतस में एक लौ जो बनती है प्रेरणा बनके सहारा टूटने नहीं देती है...! बूंद आंसू की जलते हुए हृदय को कर देती है शीतल। मैं कौन हूं...?? वह जो सृष्टि का नियंता ले रहा है परीक्षा शायद यही है वो अहसास जिससे आगे बढ़ने की चाह बलवती होती है उसके प्रेम का प्रसाद धो देता है अवसाद कहां हूं अकेली..!! जब वो है मेरे साथ मेरे लिए रचता व्यूह जिसे पार करना  और उसका सामीप्य पाना जगा देता है आस...! अभिलाषा चौहान 

जोशीमठ का दर्द

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मैं जोशीमठ छीन लिया मेरा रूप,अस्तित्व स्वतंत्रता किया अपमान  बसा दिया तुमने शहर गंदगी से अटा  मेरा हृदय फट रहा है  अंग-अंग मेरा कट रहा है  कभी था मैं  शाश्वत संस्कृति का प्रतीक शांति दूत छीन ली तुमने मुझसे शांति । मैं देता रहा तुम लेते रहे और हो गए बेशर्म... मैं पर्यटन स्थल नहीं मैं हूं अध्यात्म मैं ही ब्रह्म पर मेरा दर्द तुम क्या जानो ? तुमने बजाया सभ्यता का डंका रौंद दिए मेरे अरमान ध्यान-योग, ज्ञान का साक्षी समेटते हुए  तुम्हारी गंदगी मर रहा हूँ  धीरे-धीरे-धीरे.... अनियोजित  व्यवसाय और विकास से थक चुका हूं मैं मेरे आँसुओं का मूल्य तुम क्या जानो ...!! इन अत्याचारों से समा जाऊँगा मैं धरती के गर्भ में सीता के समान....!! अभिलाषा चौहान 

पेट की आग

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देखा मैंने धूप को काँपते सूर्य को ऊँघते कोहरे की रजाई में लिपटे पूस की शीत से डरे हुए अलसाए और दुबके! देखा मैंने चिथड़ों में लिपटे दो जून की रोटी के लिए शीत को धता बताते  कंपकंपाते हाड़ों को...... भीषण शीत से करते दो-दो हाथ। उनके बहते श्वेद के समक्ष सूर्य भी मान लेता हार मौसम उनके लिए कहां होते हैं...!! उनके लिए होती है  पेट की आग ..… जिसके के समक्ष सूर्य की तपिश शीत की बंदिश बेमानी हो जाती है देखा मैंने गर्म कपड़ों में बदन को छिपाए उन अमीरों को  जिन्हें फुटपाथ पर पड़ा कंपकंपाता जीवन बदनुमा धब्बा लगता है  एसी कमरों में और कारों में मौसम की मार से पीड़ित जीवन के संघर्ष से अपरिचित संवेदना हीन कहां समझ पाते हैं उनकी पीड़ा...!! जहां एक-एक रोटी के आगे फीकी है मौसम की मार जीवन यहीं पर खिलता है नेह भी यहीं पर पनपता है समभाव से अपनाते सुख-दुख जो हैं इनके सहभागी अविचल अडिग मुस्कुराते ये हाड़-मांस के पुतले संघर्ष के प्रतीक हंस कर सहते मौसम की मार। अभिलाषा चौहान 

जिसे देख छाता उल्लास

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पर्वतों के कपाट खोल सद्यस्नाता रश्मियाँ  झाँकती घूँघट की ओट से शनैं शनै पग बढ़ाती वधू सी धानी पांवड़ों पर छोड़ती पगों की छाप लिए स्वर्ण कलश करती गृहप्रवेश देख उस नवौढ़ा को लेता अंगड़ाई जीवन करता अगुवाई बिखर जाता स्वर्ण सुख चहुंओर खनकते कंगनों बजते नुपुरों से गूँज उठता घर का हर कोना उसके रूप के उजास से देदीप्यमान घर आंगन उसकी मुस्कराहट से खिलते सुमन  बिखरता मंकरद उस कामिनी की झलक पाने को आतुर झरोखों से झांकते नयन वृक्ष भी संगीतज्ञ से छेड़ देते ताल पंछी करते स्वागत गान  मनोरम वातावरण में आती वह शनै शनै वधू सी छिड़कती मंगल कुमकुम खेतों में झूमती फसलों को हौले-हौले सहलाती गाती गुनगुनाती गीत जिसे देख छाता उल्लास। अभिलाषा चौहान