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आजादी का महापर्व

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आजादी के महापर्व पर हो बस ये संकल्प हमारा गगन चूमता रहे तिरंगा उन्नत भारतवर्ष हमारा। बलिदानों की बलि वेदी पर जो आजादी हमने पाई अपने-अपने सुख में डूबे उसकी गरिमा आज भुलाई कर्म निष्ठ बन करें समर्पण  विश्व विजयी हो देश प्यारा गगन चूमता....................।। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आओ हम ये भेद भुला दें मातृभूमि हो सबको प्यारी कटुता के सब बीज गला दें  एक सूत्र में बँधे ये माला आशा साहस सत्य सहारा  गगन चूमता...................।। प्रेम अहिंसा करुणा का पथ सबसे उत्तम और निराला देशप्रेम हो सबसे ऊपर मित्र भाव मन हृदय विशाला धीर वीर बनकर उत्साही निज गौरव जग में विस्तारा  गगन चूमता.....................।। अभिलाषा चौहान 

कैसे अजब नजारे हैं

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बदले-बदले इस मौसम के रंग-ढंग न्यारे हैं  कैसे अजब नजारे हैं   धोरों में जब बहती नदियां नदियों के तन सूखे खेत करे मछली अठखेली और सरोवर भूखे सड़कों पर चलती नावें दिन दिखते तारे हैं  कैसे अजब नज़ारे हैं  पनघट घर के भीतर आया तैर रहे सब बासन कारागार से इस जीवन पर बादल करते शासन डूब चले सुख साधन सारे जो लगते प्यारे हैं  कैसे अजब नजारे हैं  सूख चले आंखों के आंसू कौन सुने अब किसकी आंख मूंद कर बैठा शासन जीवन भरता सिसकी गड्ढों में खोए विकास को ढूंढे बेचारे हैं  कैसे अजब नजारे हैं। बूंद -बूंद को तरसे प्राणी बूंद बनी है बैरन कोस रहा क्यों बैठा-बैठा  बूंद सत्य ज्यों जीवन  सागर में मिलना निश्चित है  सब भ्रम के मारे हैं  कैसे अजब नजारे हैं  अभिलाषा चौहान 

आ गई कैसी घड़ी...!!

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एक कली कोमल सी टूट कर बिखरी पड़ी फूल बनने से ही पहले आ गई कैसी घड़ी  कौन है वो दरिंदे जो थे इतने बेरहम पंखुड़ियां नोचते हुए  ना उन्हें आई शरम  स्वप्न बिखरे उस कली के झर गईं आंसू लड़ी  रो रहे पौधे सभी वो जिनकी थी वो लाड़ली दर्द में थी चीखती वो जो कभी नाजों पली कौन बैठे घात में थे  आंख किनकी थी गड़ी कितना तड़पी वो कली जब नोंच कर फेंका गया वो दरिंदे जानवर थे  जिनमें करुणा ना दया वहशियों ने रौंद डाला टूटी साँसों की कड़ी। अभिलाषा चौहान 

धूलि चरणों की.....

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धूलि चरणों की लगाए और समझे जिसे चंदन सौंपती सर्वस्व अपना देव सदृश्य करती वंदन है कहाँ अस्तित्व उसका नाम भी अपना मिटाती माँग का सिंदूर प्यारा साथ चले जैसे साथी देखती नित एक सपना पुष्प जैसा खिले उपवन। वेदना मन में छुपाए जो धरा सा धीर धरती शूल आँचल में समेटे हर्ष की बरसात करती मारती रहती सदा मन कौन करता इसका मंथन। आँख में अम्बुद छिपाए नाचता नित हास्य मुख पर प्रेम की साकार प्रतिमा वार देती सुख दुखों पर यूँ हथेली रोक लेती चूड़ियों का मौन क्रंदन मौन रहती देखती सब जो धुरी परिवार की है है समर्पित तन औ मन से दे रही संस्कार जो है त्याग का कौन मोल समझे लौह बनती जो है कंचन। अभिलाषा चौहान 

राम-राम बस सीताराम

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चित्र गूगल से साभार  भव्य सुशोभित मंदिर सुंदर अद्भुत अनुपम ललित ललाम आज अयोध्या हर्षित होती पुण्य पावनी राघव धाम। नागर शिल्प मनोहर मंदिर मंडप जिसमें दिखते पाँच स्तंभों पर देव विराजें  भित्ति चमकें जैसे काँच अष्टकोणीय गर्भ गृह में बाल रूप के शोभित राम आज अयोध्या................। तीन तलों का बना भवन ये स्वर्ण शिखर के शीश तने द्वार-द्वार पर बनी रंगोली  देख दीवाली आज मने झूम रहे भारत के वासी देखो पूर्ण हुआ शुभ काम आज अयोध्या...............। बाल राम की छवि अनोखी नैन तकें निशदिन अविराम राम रमें अब जग जीवन में राम राम बस सीता राम राम नाम की महिमा व्यापक राम चरण में कर विश्राम आज अयोध्या.................। अभिलाषा चौहान 

बना मंदिर सुहाना है

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बदलते भाग्य भारत के बना मंदिर सुहाना है स्वप्न जो था कभी मुश्किल हुआ अब वो पुराना है। उमड़ते हर्ष के बादल झड़ी आँसू की लगती है पधारे राम फिर कोशल दीवाली देख मनती है सभी भूले हैं सुध-बुध आज अवध को जो सजाना है। स्वप्न जो था कभी मुश्किल हुआ अब वो-----------। उछलती सरयू देखो आज चरण उनके पखारेगी छँटेंगे सारे अँधियारे कृपा प्रभु की निखारेगी हुआ वनवास अब पूरा जगत को ये दिखाना है  स्वप्न जो था कभी मुश्किल हुआ अब वो-----------। प्रतीक्षा आज शबरी की  हुई  है पूर्ण जग जाने अहिल्यायें हुईं जीवित रज पग राम की पाने बने श्री राम ही आदर्श उन्हें अपना बनाना है  स्वप्न था जो कभी मुश्किल हुआ अब वो------------। अभिलाषा चौहान 

तो असली दीवाली

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दिल के दीप जलें जब सबके तो आए खुशहाली  सुप्त भाव जब जगमग हों तो असली दीवाली दीपों से रोशन घर आंगन मन में घिरा अंधेरा अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखा हो बस तेरा-मेरा दृष्टि बाधित गूंगे-बहरे हाथों लिए कुदाली दिल जलते पर पीर न प्यारी शूल चुभा खुश होवें अपने घर को रोशन कर लें चैन इसी में खोवें बदली-बदली समय की धारा बढ़ती बस बदहाली गली-मोहल्ले और चौबारे रोशन हो जब फिर से दीन दुखी की समझें पीड़ा दिल मिल जाएं दिल से दीप से दीप जलें घर-घर में दीवाली हो निराली । अभिलाषा चौहान 

इंसान खो गया है

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इंसान खो गया है मजहब ही रह गया  इंसानियत की आबरू  का ताज ढह गया। कुछ आग यों लगी कि जलने लगा चमन समझे न धर्म को जो वो मिटा रहे वतन जो पत्थरों सा बना ये चोट सह गया। ये लड़ रहे लड़ा रहे, इस मूक भीड़ को बस देखते उजड़ते सब अपने नीड़ को आंसुओं की बाढ़ में प्रेम भाव बह गया। ये वो धरा नहीं जहां नीति न्याय समत्व था धर्म -धन से ज्यादा सबको प्रिय ममत्व था विषधरों की फूंक से गुलशन ही दह गया। अभिलाषा चौहान 

हो रही कितनी क्षति

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विकास के बढ़े चरण सभ्यता है बलवती दुराचार के राज में  गौण हो गई संस्कृति  कौन जाने किस घड़ी तन को कौन नोच ले गिद्ध मोर एक से  कैसे मन ये सोच ले घात में सियार भी ये समाज की गति.. युगों-युगों से चल रही रीति एक बस यही नारी तन को भोग लो लक्ष्य एक बस यही ताक पर नियम धरे फिर चली इनकी मति.. मुर्दों का समाज है  या लोग ही मुर्दा बने गैर तो बस गैर हैं रिश्ते धूल में सने हैं पतन की राह पर हो रही कितनी क्षति.. धर्म जाति शीर्ष पर इंसानियत रो रही है धरा भी हांफती मैल किसके ढो रही स्वर्ण सी आभा गई बन रहे सब अधिपति.. मुर्दों को जिंदा किया जिंदों को मुर्दा किया घृणा द्वेष बीज रोप अपनों को जुदा किया लकीर के फकीर सब बढ़ रहीं बस विकृति.. अभिलाषा चौहान 

हालत पतली जीवन जर्जर

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छलक रही है मन की गगरी नयनों से नित गिरते निर्झर भावों के अंकुर मुरझाए हृदय भूमि जब हो ना उर्वर जलते जग में जले वेदना तप्त धरा के सूखे उपवन करुणाकर की करुणा सोई टूट पड़े हैं आफत के घन बिन मोती के सीप आवारा बिन पानी के प्यासे सरवर... तोड़ किनारे बहती नदियां पर्वत अपनी व्यथा बताएं आंखों के अंधे सब देखें उनसे तो पाषाण लजाएं भौतिकता की चकाचौंध में सत्य झूठ पर होता निर्भर... पीड़ा जिसकी वो ही जाने पर हित धर्म की बातें झूठी सभ्य समाज का लगा मुखौटा जाने कितनी नींदें लूटी सुख की सब परिभाषा भूले हालत पतली जीवन जर्जर.... अभिलाषा चौहान 

जीवन के दोराहे पर

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जीवन के दोराहे पर लक्ष्य तक मुश्किल पहुंचना आंख में अंबुद बसा है कैसे संभव है किलकना। विवशता बंधन बनी  रास्ते शूलों भरे हैं घाव मन के टीस देते आज भी वैसे ही हरे हैं छटपटाती मीन जैसे प्राण का मुश्किल निकलना। शून्यता डाले बसेरा हास्य अधरों से छिना है केंचुली रिश्तों की उतरे हार को सबने गिना है धूप तन को है जलाए चांदनी में भी झुलसना। भोर धुंधली आस की जब बादलों से दुख बरसते कौन है वो है कहां पर नैन जिसको हैं तरसते है पथिक भटका हुआ जो उसका संभव है फिसलना। अभिलाषा चौहान 

टूट-टूट कर बिखर रहीं हूँ...

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टूट-टूट कर बिखर रही हूँ, विपदा कैसी आई। पग-पग पर नित छली गई हूँ सहमी हूँ घबराई। लावा अंतस में बहता था, जला न कोई पापी। आग लगाई औरों ने थी, हरपल धरणी काँपी। लाज गठरिया मिलकर लूटी, कौन करे भरपाई। पग-पग पर नित छली गई हूँ, सहमी हूँ घबराई। टूट-टूट कर बिखर रहीं हूँ, कैसी विपदा आई। अपने ही बैरी बन बैठे रोज तराजू तोले। कठपुतली सा नाच नचाकर, जीवन में विष घोले। खंड-खंड में बाँट दिया है, मानव बना कसाई। पग-पग पर नित छली गई हूँ सहमी हूँ घबराई। टूट-टूट कर बिखर रही हूँ, कैसी विपदा आई। अपना ही अस्तित्व मिटाती करती इनका पोषण सर्पों जैसी फितरत इनकी करते कितना शोषण कुछ भी मेरा रहा न अपना दुख से हूं झुलसाई पग-पग पर नित छली गई हूँ सहमी हूँ घबराई। अभिलाषा चौहान 

सब भूले वो गीत सुहाना

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भौतिकता की चकाचौंध में, सब भूले वो गीत सुहाना वो चूल्हे को बैठ घेरकर माँ की सेंकी रोटी खाना। कब देखी थी वो पगडंडी जो खेतों के बीच खड़ी थी कहाँ गई वो सखी सहेली जो झूले के लिए लड़ी थी भूल गए वो गुड्डे -गुड़िया बिसर गया वो ब्याह रचाना। वो चूल्हे.....................।। नीम निबौली कच्ची अमियाँ खट्टी-मीठी इमली खाना घर-घर की टूटी दीवारें छत से छत का बात बनाना प्रेम की धारा बहती अविरल जिसमें मिलकर रोज नहाना वो चूल्हे के पास...............।। अंतर्मन में कसक उठी है बचपन की वो याद पुरानी दादी-नानी की गोदी में सुनते बैठे रोज कहानी यूँ भी कश्ती भूल गई है कागज वाली आज ठिकाना वो चूल्हे के पास बैठकर माँ की सेंकी रोटी खाना।। अभिलाषा चौहान 

संशय मिटे तभी सारा

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घनगर्जित साखी से फूटी भावों की उन्नत धारा तोड़ तोड़ तटबंध उछलती उन्मत चंचल ज्यों पारा। रिक्त कूप में छलका पानी सत्य सुहाना सुंदर सा अंधकार में चमके जुगनू हृदय लगे फिर मंदिर सा बुद्धि कल्पना संगी बनती संशय मिटे तभी सारा कलुष कालिमा गरल मिटा सब निर्मल कलित गगन मन का धरती अंबर मध्य बसा ये कुसुम खिला जग यौवन का और भैरवी नृत्य करे जब तब टूट गई सारी कारा तोड़-तोड़................ जड़ता मिटी वेदना उपजी करुणा के अब बरसे घन सागर सा विस्तृत उर हो जब प्रेम बरसता ज्यों सावन चंद्र चांदनी रस छलकाती जीत ज्योति की भ्रम हारा तोड़-तोड़..................

मेहनत ही श्रृंगार बनी

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जठराग्नि के प्रबल प्रभाव से मेहनत ही श्रृंगार बनी जीवन श्रम से सिंचित होगा सृष्टि की ये पुकार बनी श्वेद बहाते तप्त धूप में खेतों में श्रमदान करे भूमिपुत्र गलहार जगत के अन्न-धन के भंडार भरे कोप प्रकृति का जब-जब टूटा आशा की बुझ गई कनी जीवन श्रम से....... पाथर तोड़े महल बनाए ढोते गारा 'औ' माटी भीषण गर्मी,शीत प्रबल हो पीर कहाँ किसने बाँटी दो पाटों के बीच पिसे हैं आँसू की बरसात घनी जीवन श्रम से....... सपने आशा साहस जीतें भाग्य बदलता मानव का गढ़ लेते जो लक्ष्य अनोखे नाम अमर रहता उनका संकट जिनको लगते प्यारे मृत्यु से उनकी रार ठनी जीवन श्रम से....... अभिलाषा चौहान 

पत्थरों के हैं शहर ये

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पत्थरों के हैं शहर ये लोग भी पत्थर बने खो गए कानन कहीं पर ये भवन ऊँचे तने....? देख कर मन जल रहा है नयनों से बरसे जल आज भी अब जल रहा है जल रहा है इसमें कल जलजले को देख जड़वत वेदना बादल घने खो गए ................... खोखले होते तनों में दीमकें ऐसी लगी मौत भी अब कांपती है देखती जो दरिंदगी सभ्यता की सीढ़ियों ने कलियुगी दानव जने खो गए...................... साँस भी सौ बार सोचे छोड़ दूं मैं ये शहर प्राण तड़पें जग बुरा है वारुणी पीती जहर भाव संन्यासी बने हैं हैं लहू से उर सने खो गए...................... अभिलाषा चौहान 

नींद चुराई है किसने

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रात अमावस की है काली दीप बुझाए हैं किसने घृणा-द्वेष की दीवारों से नींव हिलाई है जिसने। कुरुक्षेत्र लगता मरघट सा डाली के सब पुष्प झरे  वंशबेल की होगी समृद्धि कौन कामना भला करे शमशीरों की रक्त पिपासा देख जगाई है इसने घृणा-द्वेष की दीवारों से नींव हिलाई है जिसने। आँसू की बहती नदियों में कोख उजड़ती है कितनी सूनी माँगों में सपनों की जली चिताएँ हैं उतनी सोच-सोच भयकंपित होती काल-व्याल लगता डसने घृणा-द्वेष की दीवारों से नींव हिलाई है जिसने। मस्तक पर है श्वेद छलकता रोम-रोम फिर काँप उठा चुभने लगा अजब सन्नाटा संकट हिय अब भाँप उठा आज सुभद्रा की आँखों से नींद चुराई है किसने घृणा-द्वेष की दीवारों से नींव हिलाई है जिसने। अभिलाषा चौहान 

कविता का कल्पित कानन

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चहक रहीं चिड़ियाँ नीड़ों में किरणें थिरक रही आँगन मलयानिल मदमाता बहता पुष्प खिलें हैं मनभावन।। कलियाँ इठलाती डालों पे लता वृक्ष से प्रणय करें भ्रमर डोलते प्रेमी बनकर तितली कैसे नृत्य करें  चित्रलिखित सी मैं बन जाऊँ मन में बरस रहा सावन चहक रहीं....................। चित्रकार की देख चित्रकृति  करती हूँ नित अभिनंदन दृष्टि पटल से पलक उठी फिर  गिरती सी करती वंदन वसुधा नववधु सी मुस्काए घर आए जैसे साजन चहक रहीं..................। नवजीवन के फूटे अंकुर तिनका-तिनका झूम रहा अंतस में उमड़ा आकर्षण नयनों से फिर प्रेम बहा शब्द हृदय में करें ठिठोली कविता का कल्पित कानन. चहक रहीं...................। अभिलाषा चौहान 

आत्म-मंथन कर सको तो...

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आत्म-मंथन कर सको तो, भूल भी तुमको दिखेगी। धुंध जो छाई छटेगी... कल्पना के पंख ऐसे,उड़ रहे जिनकी वजह से। सत्यता को भूल बैठे,भटकते अपनी जगह से। कर्म का फल ही मिलेगा,सीख गीता ने सिखाई। धर्म को जिसने भुलाया,पीर बस बदले में पाई। लक्ष्य चिंतन कर सको तो, राह भी तुमको दिखेगी। धुंध जो छाई छटेगी.… हो सफल हर बार ऐसा,भ्रम कभी मन में रखों क्यों ? ठोकरें दे सीख देती,देख उनको डर रहे क्यों ? सीप में मोती पले ज्यों,स्वप्न मन में पल रहें हैं। कंटकों के बीच देखो,पुष्प कैसे खिल रहें हैं। साधना यदि कर सको तो, साध पूरी हो रहेगी। धुंध जो छाई छटेगी हे पथिक!ये ध्यान धर लो,पंथ तो परिचित न होगा। शृंग, खंदक ,खाई होंगे,प्रेम न तुमको मिलेगा। छत भी सिर से छिनेगी,और दुख झोली भरेंगे। ठान लो अब जीतना है,दिन तुम्हारे भी फिरेंगे। और संयम रख सको तो, जिंदगी फिर से हँसेगी। धुंध जो छाई छटेगी.... अभिलाषा चौहान 

दूर हो सारा अंधेरा

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रेत का उठता बवंडर फूस के तिनके उड़ाता टूटता तटबंध मन का साथ अपना छोड़ जाता। शब्द सारे शून्य होते मौन लिखता है कहानी नैन प्यासे कुएँ जैसे ढूँढते दो बूँद पानी दर्द का सागर उमड़ता चैन कैसे कौन पाता। खोल दो अब राज सारे धो चलो अब मैल मन का बीज रोपो प्रेम के अब भार उतरे आज तन का दूर हो सारा अँधेरा सूर्य जब है मुस्कुराता पीत पत्ते शाख पर अब झर रहे हैं पुष्प सारे आग लगती है वनों में दूर होते हैं किनारे और अंबर हँस पड़ा फिर प्यास धरती की बुझाता। अभिलाषा चौहान