संकट लगते छुई-मुई

पीड़ा की गगरी भरकर के
जीवन की शुरुआत हुई
अंगारों पर लोट-लोट कर
संकट लगते छुई-मुई।

उद्वेलित हो कहती लहरें
रूकना अपना काम नहीं
तूफानों को करले वश में
नौका लगती पार वही।
सागर से चुनता जो मोती
प्यासी जिसकी ज्ञान कुईं।
अंगारों पर-------------।।

कर्म तेल की जलती बाती
दीपक का तब मान यहाँ
सुख-शैया के सपने देखे
उसकी अब पहचान कहाँ
उड़ता फिरता नीलगगन में
औंधे मुँह गिर पड़ा भुंई।
अंगारों पर --------------।।

पग के छाले जिसे हँसाए
आँसू जिसके मित्र बने।
ओढ़ दुशाला हिय घावों का
उसने चित्र विचित्र चुने
कष्ट हँसे जब पुष्प चुभोये
कंटक की बरसात हुई।
अंगारों पर लोट-लोट कर
संकट लगते छुई-मुई।।

अभिलाषा चौहान'सुज्ञ'
स्वरचित मौलिक


देख दशा तब काँपी

झंझावात में घिरा जीवन
चिंताओं की वापी।
झूला झूलूँ दुविधाओं में
झूलत-झूलत हाँपी।।

चाँद जलाता सूरज जैसे,
पवन लगाती चाँटे।
फूस झोंपड़ी सा तन सुलगे
अंतस चुभते काँटे।
साया साथ छोड़ के बैठा
भय से नैना ढाँपी।
झूला झूलूँ दुविधाओं में
झूलत-झूलत हाँपी।।


हंसा पिंजर में बंदी है,
तड़प-तड़प रह जाए।
उड़न खटोला कब ये बैठे,
कब पी से मिल पाए।
माया मकड़जाल सी लिपटी,
देख दशा तब काँपी
झूला झूलूँ दुविधाओं में
झूलत-झूलत हाँपी।।


पल में रूप बदलता ये जग,
होती घोर निराशा।
तन ही अपना साथ न देवे,
किससे करना आशा।
दूर-दूर तक धुंध छाई है,
राह न जाए नापी
झूला झूलूँ दुविधाओं में
झूलत-झूलत हाँपी।।


अभिलाषा चौहान'सुज्ञ'
स्वरचित मौलिक





टूट गया जब मन का दर्पण


टूट गया मन का जब दर्पण
प्रेम फलित फिर कैसे होता
निज भावों की शव शैया को
अश्रुधार से नित है धोता।

आस अधूरी प्यास अधूरी
जीने की कैसी मजबूरी
साथ-साथ चलते-चलते भी
नित बढ़ती जाती है दूरी
नागफनी से उगते काँटे
विष-बीजों को फिर भी बोता
निज भावों----------------।।

तिनका-तिनका बिखरा जीवन
एक प्रभंजन आया ऐसा
सुख-सपनों में लगी आग थी
संबंधों पर छाया पैसा।
पलक पटल पर घूम रहा है
एक स्वप्न आधा नित रोता।
निज भावों------------------।।

प्याज परत सा उधड़ रहा है
रिश्तों का ये ताना-बाना
समय बीतते लगने लगता
हर कोई जैसे अनजाना
उजडे कानन में एकाकी
भटक रहा सब खोता-खोता।
निज भावों-----------------।।

अभिलाषा चौहान'सुज्ञ'
स्वरचित मौलिक







स्वतंत्र हूँ मैं

स्वतंत्र हूँ मैं,
हाँ बिल्कुल स्वतंत्र
कुछ भी कर सकता हूँ।
राह के रोड़े
चुटकियों में हटा सकता हूँ
ये प्रकृति ,
मेरे हाथों का खिलौना है
खेल सकता हूँ मनचाहे खेल।
मुझे पसंद हैं
वो पहाड़ जो मैंने स्वयं
निर्मित किए हैं कूड़े के ढेर से।
साफ-सफाई मुझे कहां भाती है।
पक्षियों के नीड़ो में
मेरा ही बसेरा है
आसमान को काले धुएँ से घेरा है।
ये देश मेरा है,
मुझे पूर्ण स्वतंत्रता है
दीवारों पर चित्रकारी करने की।
जाति-धर्म,सम्प्रदाय
के नाम पर इसे बाँट सकता हूँ।
अपने सुख
के लिए औरों के घरों में
आग लगा सकता हूँ।
नीति नियम
स्वयं ही बनाता हूँ
भ्रष्टाचार से काम चलाता हूँ।
मैं स्वतंत्र हूँ
परंपराओं से मुझे बैर है।
बंदिशों से लगता डर है।
वृद्धाश्रम का
चलन तभी तो बढ़ा है
मेरा सुख सबसे बड़ा है।
मेरी स्वतंत्रता सबसे बड़ी है
उखाड़ी वो कील जो सुख में गड़ी है।
पाप-पुण्य मुझे अब नहीं सताते हैं।
स्वर्ग-नर्क भी प्राप्त करने आते हैं।

अभिलाषा चौहान'सुज्ञ'
स्वरचित मौलिक

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