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कुंदलता सवैया छंद

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           "कुंदलता सवैया" कुंदलता वार्णिक सवैया छंद है।इस छंद की रचना आठ सगण और दो लघु वर्ण से होती है। इसमें कुल छब्बीस वर्ण होते हैं।इसके चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में बारह वर्णों के बाद यति होती है। 1 जीवन सत्य दिन जीवन के अब बीत चले,मन में हरि का बस नाम जपे हम। चित चंचल है उर भी भटके,अब ध्यान धरें बस मोह करें कम।क्षण-भंगुर जीवन में हमने,कुछ भी न किया मद चूर बढ़ा तम। सच झूठ कभी कब भेद किया, सुख में अटके दुख में भरते दम। 2 जीवन लक्ष्य चल रे मन तू हरि को सुमिरै,इस जीवन का बस लक्ष्य यही रख। वह पालक भी वह तारक भी,बस जीवन में रस देख यही चख। सब नश्वर है बस सत्य वही,नित वंदन पूजन मूरत को लख। मनमीत बना उर में रख ले,यह भाव बना तब वे बनते सख। 3.प्रभू भक्ति  जग में अति सुन्दर नाम सदा, घनश्याम कहो रघुनंदन राघव। तन श्यामल हैं जिनके नयना, कमलों सम वे जग के हित बांधव। जग पालक तारक हारक वे, समझो अपना जग में तुम लाघव। उर ध्यान धरो मन नाम जपो, परमार्थ करो बनके तुम साधव। अभिलाषा चौहान   

बस पतझड़ बाकी है.....

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मिट सकता है क्या कभी अंतर  स्त्री-पुरुष का..! तुम्हें है अहम सर्वज्ञता का मैं अज्ञ सदा से मेरा विज्ञ होना  तुम्हें झकझोरता है.! तन जाते हैं तुम्हारे नथुने पड़ जाती हैं तुम्हारे भवों में सिलवटें गुर्राहट तुम्हारी अचानक से मुझे दिलाती है याद वीरान जंगल में एकत्र हिंसक जानवरों की। उनमें खो जाती है तुम्हारी पहचान डर जाती हूं मैं जब घिर जाती हूं इतने हिंसक जानवरों से..!! मिटेगा अंतर कभी समझ का मैं झुकती जाती हूं मिटाती अपना अस्तित्व तुम्हें समझने में...और तुम और ऊंचे होते चले जाते हो...! बन जाते हैं हम दो छोर कैसे मिटेगा अंतर...!! ताली दो हाथों से बजती है कमी सामंजस्य की समर्पण की बना देती है नदी के दो  किनारे.…!! जो चलते हैं साथ पर मिलते नहीं कभी पुरुष-स्त्री प्रतीक हैं अर्धनारीश्वर का मैं-तुम का विलय देता है सृष्टि को नवरुप यही सत्य,यही शिव,यही सुंदर है जो मात्र है एक स्वप्न हम बने हैं दो ध्रुव सिमटे हुए खुद में ख़ो दिया है हमने जीवन का बसंत बस पतझड़ ही बाकी है। अभिलाषा चौहान 

मुर्दे

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अभी तक सुना था कि होता है नरक...!! मैंने देखा नरक को...!! रिश्तों के नाम पर जुटे स्वार्थी लोग अपनी लोभ-पिपासा के लिए  लाश के पास चिल्लाते समझ से परे मरा कौन था....? वो जो भूमि पर पड़ा था जड़ निर्जीव...!! या जो लड़ने को खड़ा था आत्मा से रहित निर्जीव  भावनाशून्य....!! मैं अवाक...? संवेदनाशून्य इस जगत में  चिता की अग्नि पर स्वार्थ की रोटियां सेंकते ये मुर्दे आज  हर घर में मौजूद हैं ..!! जिनके अंदर बसा है मरुस्थल जिनकी अंदर की नदी सूख गई है...!! पेट की आग इनके लिए  इतनी बड़ी है...!! लाश भी इनके सवालों  पर बेबस पड़ी है ...!! सिसकती है मृतात्मा  इन पापियों के लिए  मैंने क्या कुछ ना किया क्यों ना स्वार्थी बन जिया ये क्या जाने किसी का दर्द पत्थर से भी गए-बीते संस्कार से रहित भौतिक संपत्ति का लालच बना देता है इन्हें अंधा ये अंधे जौंक बनकर  चूसते हैं रक्त और एक दिन मर जाते हैं  इनका जीवन नहीं आता किसी के काम ये मुर्दे जो स्वर्ग को  बना देते हैं नरक....?? अभिलाषा चौहान 

क्या भूलूं क्या याद करूं!!

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क्या भूलूँ क्या याद करूं  कैसे मन में अब धीर धरुं सूना जग सूना मन  तुमसे पाया जीवन धन  छाया बनकर साथ रहे पीर कहे अब किससे मन। क्या भूलूं.................? छूटा ममता का आंचल  क्रूर कठिन आया ये पल छिना पिता का भी साया छलक रहे आंसू छल-छल। क्या भूलूं....................? सागर दुख का लहराया छाई अमावस की छाया खड़ी अकेली सोचूं मैं  हे प्रभू कैसी ये माया!! क्या भूलूं......................? मां की ममता क्या छूटी खुशियां सारी सब रूठी पिता बिना बेवश सी मैं विपदाएं आकर टूटीं !! क्या भूलूं........................? जीवन लगता तपती धूप सूख गए अब मन के कूप टूट गए सारे बंधन जग ने दिखाया ऐसा रूप!! क्या भूलूं.........................? मात-पिता सा प्रेम कहां  लुटा-लुटा सा लगे जहां  रीता-रीता सा है जीवन कौन करे भरपाई यहां !! क्या भूलूं........................? रिश्तों के कड़वे रूप दिखे जिनमें स्वारथ के लेख लिखे इंसान का कितना मोल यहां  जिंदों में मुर्दे खड़े दिखे!! क्या भूलूं.......................? हृदय में जिनके लोभ गड़ा आंखों में मद भी रहा अड़ा पत्थर भी जिनसे शर्मिंदा शव रोए देखो वहीं पड़ा। क्या भूलूं...

मेरे मोहन

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मेरे मोहन माधव मतवाले तेरे कुंतल काले घुंघराले इस सृष्टि का आधार हो तुम करूणा जल की रसधार हो तुम मैंने सौंप दिया सब है तुमको ये तुम जानो या मैं जानूं.... तेरे रूप की श्यामल देख घटा मेरे मन का अंधकार छटा तेरा प्रेम बरसता जीवन में तू ही तू है बस अब मन में  मैंने सौंप दिया है सब तुमको ये तुम जानो या मैं जानूं.... ये नैना कजरारे न्यारे हम तो अपना ही दिल हारे अब तुम श्रृंगार हो जीवन का सुध भूल चुके हैं इस तन का मैंने सौंप दिया है सब तुमको ये तुम जानो या मैं जानूं..... हम देख नहीं थकते तुम को तुम भूल गए हो क्या हम को कब आओगे मोहन प्यारे पथ देख-देख कर हैं हारे मैंने सौंप दिया है सब तुमको ये तुम जानो या मैं जानूं..... ये जीवन व्यर्थ हुआ तुम बिन पल घड़ियां बीती दिन गिन गिन पद पंकज की धूल हैं हम नित करते कितनी भूल हैं हम मैंने सौंप दिया है सब तुमको ये तुम जानो या मैं जानूं..... अभिलाषा चौहान 

धूलि चरणों की.....

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धूलि चरणों की लगाए और समझे जिसे चंदन सौंपती सर्वस्व अपना देव सदृश्य करती वंदन है कहाँ अस्तित्व उसका नाम भी अपना मिटाती माँग का सिंदूर प्यारा साथ चले जैसे साथी देखती नित एक सपना पुष्प जैसा खिले उपवन। वेदना मन में छुपाए जो धरा सा धीर धरती शूल आँचल में समेटे हर्ष की बरसात करती मारती रहती सदा मन कौन करता इसका मंथन। आँख में अम्बुद छिपाए नाचता नित हास्य मुख पर प्रेम की साकार प्रतिमा वार देती सुख दुखों पर यूँ हथेली रोक लेती चूड़ियों का मौन क्रंदन मौन रहती देखती सब जो धुरी परिवार की है है समर्पित तन औ मन से दे रही संस्कार जो है त्याग का कौन मोल समझे लौह बनती जो है कंचन। अभिलाषा चौहान