सब भूले वो गीत सुहाना






भौतिकता की चकाचौंध में,

सब भूले वो गीत सुहाना

वो चूल्हे को बैठ घेरकर

माँ की सेंकी रोटी खाना।


कब देखी थी वो पगडंडी

जो खेतों के बीच खड़ी थी

कहाँ गई वो सखी सहेली

जो झूले के लिए लड़ी थी

भूल गए वो गुड्डे -गुड़िया

बिसर गया वो ब्याह रचाना।

वो चूल्हे.....................।।


नीम निबौली कच्ची अमियाँ

खट्टी-मीठी इमली खाना

घर-घर की टूटी दीवारें

छत से छत का बात बनाना

प्रेम की धारा बहती अविरल

जिसमें मिलकर रोज नहाना

वो चूल्हे के पास...............।।


अंतर्मन में कसक उठी है

बचपन की वो याद पुरानी

दादी-नानी की गोदी में

सुनते बैठे रोज कहानी

यूँ भी कश्ती भूल गई है

कागज वाली आज ठिकाना

वो चूल्हे के पास बैठकर

माँ की सेंकी रोटी खाना।।



अभिलाषा चौहान 


संशय मिटे तभी सारा




घनगर्जित साखी से फूटी

भावों की उन्नत धारा

तोड़ तोड़ तटबंध उछलती

उन्मत चंचल ज्यों पारा।


रिक्त कूप में छलका पानी

सत्य सुहाना सुंदर सा

अंधकार में चमके जुगनू

हृदय लगे फिर मंदिर सा

बुद्धि कल्पना संगी बनती

संशय मिटे तभी सारा


कलुष कालिमा गरल मिटा सब

निर्मल कलित गगन मन का

धरती अंबर मध्य बसा ये

कुसुम खिला जग यौवन का

और भैरवी नृत्य करे जब

तब टूट गई सारी कारा

तोड़-तोड़................


जड़ता मिटी वेदना उपजी

करुणा के अब बरसे घन

सागर सा विस्तृत उर हो जब

प्रेम बरसता ज्यों सावन

चंद्र चांदनी रस छलकाती

जीत ज्योति की भ्रम हारा

तोड़-तोड़..................







मेहनत ही श्रृंगार बनी






जठराग्नि के प्रबल प्रभाव से

मेहनत ही श्रृंगार बनी

जीवन श्रम से सिंचित होगा

सृष्टि की ये पुकार बनी


श्वेद बहाते तप्त धूप में

खेतों में श्रमदान करे

भूमिपुत्र गलहार जगत के

अन्न-धन के भंडार भरे

कोप प्रकृति का जब-जब टूटा

आशा की बुझ गई कनी

जीवन श्रम से.......



पाथर तोड़े महल बनाए

ढोते गारा 'औ' माटी

भीषण गर्मी,शीत प्रबल हो

पीर कहाँ किसने बाँटी

दो पाटों के बीच पिसे हैं

आँसू की बरसात घनी

जीवन श्रम से.......


सपने आशा साहस जीतें

भाग्य बदलता मानव का

गढ़ लेते जो लक्ष्य अनोखे

नाम अमर रहता उनका

संकट जिनको लगते प्यारे

मृत्यु से उनकी रार ठनी

जीवन श्रम से.......


अभिलाषा चौहान