द्वारका-सोमनाथ
गतांक से आगे सोने की द्वारका द्वारकाधीश के मंदिर से लगभग दो-ढाई किलोमीटर दूर रुक्मिणी जी का मंदिर था।हम वहां दर्शन करने गए।मंदिर का स्थापत्य कुछ-कुछ द्वारकाधीश मंदिर जैसा ही था। यहां पर पानी के लिए दान किया जाता है वो भी श्रद्धानुसार, क्योंकि यहां पानी खारा है और जो वहां के रहवासी हैं,उनके लिए मीठा पानी लाने की व्यवस्था में इस दान का योगदान होता है।अरब सागर के किनारे बने इन मंदिरों में सागर के खारे पानी और नमी ने कोई असर नहीं डाला है पर नवनिर्मित होटलों पर इसकी छाप दिखाई देती है।माता रुक्मिणी जी का मंदिर अत्यंत भव्य और सुंदर था।हमारे मंदिर चाहे कितने ही पुराने क्यों ना हो,सबकी अपनी कहानी है पर यही हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत है।यही हमारी सनातनता का प्रतीक हैं। इसके बाद हम गीता भवन मंदिर गए। कृष्ण और राधा की भव्य प्रतिमाएं स्थापित थीं। यहां पर अठारह खंभों पर भगवद्गीता के अध्याय अंकित हैं।यह मंदिर भी गोमती नदी के तट स्थित है।यह बिरला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।इसे बिरला परिवार द्वारा बनवाया गया था।इसके अलावा हमने सिद्धेश्वर महादेव मंदिर और पंचमुखी हनुमान मंदिर के भ...