क्षणिकाएं (घटा, फुहार, गर्जना.....)
** घटा **
घिर के आई फिर घटा
याद आने लगा फिर
जीवन में जो भी था घटा।
** फुहार**
गिरने लगी रिमझिम फुहार
मन मचल करता गुहार
मत खोलो अब यादों के द्वार।
**गर्जना**
गरजते हैं जोर से बादल
धडकने लगता मेरा दिल
और भी मैं होती विकल ।
**दामिनी**
कड़क उठती जब दामिनी
तब दर्द की यादें घनी
बढा जाती हैं बैचेनी।
**छटा**
निखरने लगी प्रकृति की छटा
हटने लगी सारी धुंध भी
छाया था मन में जो अंधकार
धीरे धीरे वो भी छटा।
**ऊषा**
हुआ ऊषा का अब आगमन
हुआ दर्द का तब निगमन
खिल उठा फिर खुशियों का चमन।
अभिलाषा चौहान
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