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इंसान खो गया है

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इंसान खो गया है मजहब ही रह गया  इंसानियत की आबरू  का ताज ढह गया। कुछ आग यों लगी कि जलने लगा चमन समझे न धर्म को जो वो मिटा रहे वतन जो पत्थरों सा बना ये चोट सह गया। ये लड़ रहे लड़ा रहे, इस मूक भीड़ को बस देखते उजड़ते सब अपने नीड़ को आंसुओं की बाढ़ में प्रेम भाव बह गया। ये वो धरा नहीं जहां नीति न्याय समत्व था धर्म -धन से ज्यादा सबको प्रिय ममत्व था विषधरों की फूंक से गुलशन ही दह गया। अभिलाषा चौहान 

साथ दो,स्वामी बनो

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झड़े हुए पीले पत्ते चल पड़े अपनी यात्रा पर  अपनी विरासत  सौंप दी उन कोंपलों को कर दी जगह ख़ाली पर कुछ हठी पत्ते अब भी कर रहे संघर्ष नयी पीढ़ी से है उनका टकराव नहीं छोड़ना चाहते स्थान उनका अहम है सर्वोपरि नयी कोंपलों को सिखाने दुनियादारी अपने अनुभवों से बैठें हैं अपने स्थान पर अड़कर उनकी यही जड़ता है परिवर्तन की राह का रोड़ा आंधियों के थपेड़े सूरज की तपिश  बारिश की मार सिखाती है संघर्ष करना खुद को स्थापित करना स्वयं को सर्वज्ञ समझना है पीले पत्तों की भूल परंपराओं की रूढ़ियां और उनका अहम कोंपलों में भर देता है रोष टकराव और दूरियों के जनक उदारवादी बनो समय के साथ बहो स्वीकारो सत्य ये संसार किसी का नहीं सम्मान करो उन कोंपलों का ,जो तुम्हारी परंपरा को  इस सृष्टि को संवारना  चाहती हैं साथ दो ,स्वामी न बनो। अभिलाषा चौहान 

हो रही कितनी क्षति

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विकास के बढ़े चरण सभ्यता है बलवती दुराचार के राज में  गौण हो गई संस्कृति  कौन जाने किस घड़ी तन को कौन नोच ले गिद्ध मोर एक से  कैसे मन ये सोच ले घात में सियार भी ये समाज की गति.. युगों-युगों से चल रही रीति एक बस यही नारी तन को भोग लो लक्ष्य एक बस यही ताक पर नियम धरे फिर चली इनकी मति.. मुर्दों का समाज है  या लोग ही मुर्दा बने गैर तो बस गैर हैं रिश्ते धूल में सने हैं पतन की राह पर हो रही कितनी क्षति.. धर्म जाति शीर्ष पर इंसानियत रो रही है धरा भी हांफती मैल किसके ढो रही स्वर्ण सी आभा गई बन रहे सब अधिपति.. मुर्दों को जिंदा किया जिंदों को मुर्दा किया घृणा द्वेष बीज रोप अपनों को जुदा किया लकीर के फकीर सब बढ़ रहीं बस विकृति.. अभिलाषा चौहान 

हालत पतली जीवन जर्जर

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छलक रही है मन की गगरी नयनों से नित गिरते निर्झर भावों के अंकुर मुरझाए हृदय भूमि जब हो ना उर्वर जलते जग में जले वेदना तप्त धरा के सूखे उपवन करुणाकर की करुणा सोई टूट पड़े हैं आफत के घन बिन मोती के सीप आवारा बिन पानी के प्यासे सरवर... तोड़ किनारे बहती नदियां पर्वत अपनी व्यथा बताएं आंखों के अंधे सब देखें उनसे तो पाषाण लजाएं भौतिकता की चकाचौंध में सत्य झूठ पर होता निर्भर... पीड़ा जिसकी वो ही जाने पर हित धर्म की बातें झूठी सभ्य समाज का लगा मुखौटा जाने कितनी नींदें लूटी सुख की सब परिभाषा भूले हालत पतली जीवन जर्जर.... अभिलाषा चौहान 

कभी सोचा तो न था...???

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  दुशासन के पंजों में सहमी बेसुध मर्यादा  सहस्त्र बाहु दुशासन की अट्टहास ,भद्दी टिप्पणियों से जलती उसकी रूह पथराई आंखों में  खौफ का तांडव  ऐसा भी होगा कभी सोचा तो न था...?? भक्षकों की अनियंत्रित भीड़ में कोई रक्षक तो न था...?? चीरहरण को रोकने कोई कृष्ण तो न था..?? असुरों की फौज में असहाय कठपुतली सी अपनी आंखों को भींचे तन पर रेंगते असंख्य  सर्पों के दंश ऐसे होगा उसका विध्वंस  कभी सोचा न था...?? सीता का हरण द्रौपदी का चीरहरण हर युग में होगा और  बार बार होगा  कभी सोचा तो न था...?? राम और कृष्ण का भय अब किसी को कहां रावण और दुशासन का राज हर ओर होगा कभी सोचा तो न था...?? सभ्यता के चरणों में संस्कृति का मरण  ऐसे होगा कभी सोचा तो न था..?? सभ्य समाज की  बढ़ती असभ्यता का भुगतेंगी दंड बेटियां कभी सोचा न था...?? अभिलाषा चौहान 

जीवन के दोराहे पर

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जीवन के दोराहे पर लक्ष्य तक मुश्किल पहुंचना आंख में अंबुद बसा है कैसे संभव है किलकना। विवशता बंधन बनी  रास्ते शूलों भरे हैं घाव मन के टीस देते आज भी वैसे ही हरे हैं छटपटाती मीन जैसे प्राण का मुश्किल निकलना। शून्यता डाले बसेरा हास्य अधरों से छिना है केंचुली रिश्तों की उतरे हार को सबने गिना है धूप तन को है जलाए चांदनी में भी झुलसना। भोर धुंधली आस की जब बादलों से दुख बरसते कौन है वो है कहां पर नैन जिसको हैं तरसते है पथिक भटका हुआ जो उसका संभव है फिसलना। अभिलाषा चौहान