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महक रहा है कस्तूरी सा

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कोरे कागज सी ये काया इसका करले अभिनंदन महक रहा है कस्तूरी सा अंश प्रभो का कर वंदन काया कपट कुंडली उलझी काम क्रोध नित तड़पाए मद में अंधा होकर घूमे मन माया में भरमाए। हिय घट में नवनीत छुपा है उसका करले अब मंथन महक रहा है कस्तूरी सा अंश प्रभो का कर वंदन।। जीवन का उद्देश्य भुलाकर भटका जग के कानन में व्यसन अहेरी जाल बिछाता लोभ लुभाता आनन में जीव बना पिंजरे का पंछी करता रहता नित क्रंदन महक रहा है कस्तूरी सा अंश प्रभो का कर वंदन।। हीरे सा अनमोल जन्म ये अहंकार में सब भूला कालकूट का बनके आदी फिरता है फूला-फूला लोभकपट अब व्यसन रोग से, मुक्ति युक्ति का कर चिंतन। महक रहा है कस्तूरी सा अंश प्रभो का कर वंदन। अभिलाषा चौहान'सुज्ञ' स्वरचित मौलिक

शलभ शूलों पर चला है

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लगी लौ से लगन ऐसी प्रीत में जलना मिला शलभ शूलों पर चला है दोष किसका है भला। जल रहा है प्राण मेरा विरह का वरदान ये जल रहा है गात मेरा प्रेम का प्रतिदान ये यह मिलन तो है अधूरा चाह का है ये सिला शलभ शूलों पर चला है दोष किसका है भला लगी-------------------।। है अमरता कर्म में ही धर्म कहता है सदा जग प्रकाशित जो करे सदा उर उसका जला राह की ये विषमताएँ आस भेदे झिलमिला शलभ शूलों पर चला है दोष किसका है भला। लगी-------------------।। ये समर्पण पूर्ण तब हो स्वार्थ को जब त्याग दे लक्ष्य का संधान पूरा छोड़ कर क्यों भाग दें। आँख भीगी तृप्त मन है तन जला तो है जला शलभ शूलों पर चला है दोष किसका है भला। लगी-------------------।। अभिलाषा चौहान'सुज्ञ' स्वरचित मौलिक

और गाँव की याद आई...

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एक रोग सारी दुनिया की दिखलाता है सच्चाई। जिन शहरों को अपना माना उनमें ही ठोकर खाई। ऐसे उसने पैर पसारे काम-धाम सब बंद हुए लोगों ने तेवर दिखलाए रिश्ते सारे मंद हुए। और गांव के कच्चे घर की हूक हृदय में लहराई। जिन शहरों को अपना माना उनमें ही ठोकर खाई। प्रेम फला-फूला करता था गाँव गली-घर-आँगन में चिंता मुक्त रहा था जीवन मात-पिता की छाँवन में विपदा की इस कठिन घड़ी में याद गाँव की बस आई जिन शहरों को अपना माना उनमें ही ठोकर खाई। प्रीत बुलाती खेतों की अब नहर हाट बगियाँ गलियाँ खपरैलों की छत के नीचे रोटी-प्याज छाछ-दलिया नंगे पैरों दौड़ पड़े सब हृदय पीर जब अधिकाई। जिन शहरों को अपना माना उनमें ही ठोकर खाई। अभिलाषा चौहान'सुज्ञ' स्वरचित मौलिक

कदमों के निशान

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रास्ते यूँ ही नहीं बनते मुट्ठी भर लोग रचते हैं इतिहास बनकर मील का पत्थर गढ़ते नए आयाम जिंदगी को देते नई परिभाषा इतिहास के पन्नों में या वक्त की रेत पर छोड़ देते ये कदमों के निशां हमारी संस्कृति या सभ्यता उसी का है परिणाम ये पदचिह्न है सनातन शाश्वत सत्य जीवन यात्रा का हम सभी राही हैं रह जाएंगे बाकी हमारे कदमों के निशान चलते रहना ही जीवन है रह जाता है जो पीछे या छूट जाता है जो बनता है अतीत आने वाली पीढ़ी को सौंपता है विरासत ये पदचिह्न धरोहर हैं जो राह दिखाते हैं मंजिल तक पहुंचाते हैं। मार्गदर्शक बनकर जोड़ते हैं दो युगों को। अभिलाषा चौहान'सुज्ञ' स्वरचित मौलिक

अणु कोरोना हार चलेगा

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हाहाकार मचा है जग में कैसे बेड़ा पार लगेगा मन में आशा आस जगाए जीवन का ये पुष्प खिलेगा। लाशों के अंबार लगे हैं बिछड़ रहे अपनों से अपने साँसों की टूटी डोरी में टूट रहें हैं सपने कितने बंदी जीवन भय का घेरा लेकिन सुख का सूर्य उगेगा मन में आशा आस जगाए जीवन का ये पुष्प खिलेगा।। काल कठोर भयंकर भारी निर्धन को अब भूख निगलती रोग नचाता नाच अनोखा उसके आगे किसकी चलती हार गया वो मानव कैसा साहस संयम साथ चलेगा मन में आशा आस जगाए जीवन का ये पुष्प खिलेगा।। थमती रुकती जीवन धारा फिर से हो मदमस्त बहेगी अंधकार की काली छाया ज्यादा दिन तक नहीं रहेगी प्रचण्ड रूप देख अणिमा का अणु कोरोना हार चलेगा मन में आशा आस जगाए जीवन का ये पुष्प खिलेगा।। अभिलाषा चौहान'सुज्ञ' स्वरचित मौलिक

भरते ऊँची उड़ान

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कंटक पथ पर चलने वाले भरते ऊँची उड़ान राह रोकती खड़ी आँधियाँ वे छूते आसमान पाषाणों के बीच दबा ज्यों बीज बना दुख हरता शौर्य बड़े साहस के कारज बीज एक लघु करता फोड़ धरा को निकले बाहर ये सृष्टि का वरदान राह रोकती खड़ी आँधियाँ वे छूते आसमान।। अपने श्रम से लिखते रहते नित नित नई कहानी नाम अमर कर जाते जग में वीर बड़े बलिदानी मुट्ठी में संसार बसाते रखते अपनी आन राह रोकती खड़ी आँधियाँ वे छूते आसमान।। सोए हिय में आग लगादें पत्थर करदें पानी जग परिवर्तन की वे लिखते नित नित नई कहानी बीज रोपते जन के मन में करते नित संधान राह रोकती खड़ी आँधियाँ वे छूते आसमान।। अभिलाषा चौहान'सुज्ञ' स्वरचित मौलिक