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अपूर्ण यात्रा

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भौतिकता और अध्यात्म में उलझता मानव जीवन फंस जाता है अक्सर भौतिकता के व्यामोह में। माया का आवरण ढंक लेता अंतरतम को नहीं सूझती कोई राह अध्यात्म से बेपरवाह कस्तूरी मृग सम भटकता संसार में। सुख, शांति,संतोष की प्रबल लालसा भौतिक साधनों में ढूंढती आत्मानंद। बौद्धिकता का बन प्रबल दास आत्मा को देता नकार अहम के घोड़े पर सवार चंचल मन व्याकुल अतृप्त प्यासा मायावी दुनिया में ढूंढता अमृत की बूँद। ध्यान, चिंतन, योग का अभाव घटता हुआ सद्भाव कर देता विमुख अध्यात्म से जो यात्रा है आत्मा की परमात्मा से मिलन की वह अपूर्ण रह जाती है। अभिलाषा चौहान स्वरचित 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

मिट जाएं दूरियां.....

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मिट जाएं दूरियां कोई बात तो हो, जीवन में प्यार की शुरुआत तो हो। क्यों बढ़ गई हैं तन्हाइयां इतनी, दूर हो जाएंगी रोज मुलाकात तो हो । हमने तो लुटाया दिल का चमन अपना, सहेज लो तुम इसे इतने जज्बात तो हो। दर्दे-इश्क के समंदर में डूबती कश्ती हमारी, रही इसकी वजह क्या हमें मालूमात तो हो। रह-रह के जागती अभिलाषा ये मन में, कभी बदलेंगी हवाएं सही हालात तो हो। अभिलाषा चौहान स्वरचित

करवाचौथ पर्व पुनीत प्रेम का

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करवाचौथ पर्व पुनीत प्रेम का, पति की दीर्घायु कुशल क्षेम का। फिर आया पावन पर्व मनोहर, हृदय भाव बहते हैं निर्झर। प्रेम - प्रीत परवान चढ़ी है , मन-वीणा झंकृत हो उठी है। प्रियतम जनम - जनम के साथी, साथ हमारा दिया और बाती। कभी ये सोलह श्रृंगार न छूटें, भाग्य मेरा मुझसे न रूठे। बनी सुहागन रहूं सुहागन, मर कर भी मैं सदा सुहागन। घूमूं फिरूं मैं तेरे आंगन, ओ मनमीत मेरे मनभावन। मांग सदा सिंदूर से दमके, माथे पर सदा बिंदिया चमके। हाथों में कंगन की खन-खन, पैरों में पायल की छन-छन। आज बनी मैं फिर से दुल्हन, भाव हृदय के तुझको अर्पण। तुम हो चांद मेरे जीवन के , सदा चमकना चंद्रमा जैसे। आओ तुम्हारी आरती उतारूं , नयनों से ये छवि निहारूं। करके पूजा मैं माता की दुआ मांगू तेरी लंबी उम्र की। रखना मेरी प्रीत का मान , मैं शरीर तुम मेरे प्राण। अभिलाषा चौहान स्वरचित

हृदय समंदर होता उनका...

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सीधा-सादा जीवन जिनका,              और होते हैं उच्च विचार। वे ही जन इस जगत का,              करते हैं सदा परिष्कार। करूणा के बादल बरसाते,              स्नेह-सुधा लुटाते हैं। दीन-दुखी की सेवा कर,              तन-मन से हरषाते हैं। हृदय - समंदर होता उनका,              जिसमें सभी समाते हैं। समदर्शी, समता भाव से              सबको गले लगाते हैं। वाणी से मधु-रस बरसाते,              प्रेम के पुष्प खिलाते हैं मानवता को धर्म मानकर,               उस पथ पर चलते जाते हैं । घर कितना ही छोटा हो,                हृदय बड़ा होता उनका। परोपकार और जग-कल्याण से,                सजा होता है घर उनका। जीवन को जीवन मानकर,   ...

मिट्टी से मिट्टी का नाता

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ये संसार मिट्टी का घड़ा, मिट्टी में मिल जाएगा। सोच रहा तू क्या बंदे! क्या लेकर के जाएगा? मिट्टी से बना शरीर, मिट्टी में मिल जाएगा । सोच रहा तू क्या बंदे! क्या लेकर के जाएगा? बात सही थी लेकिन तुझको, अब तक भी न खबर हुई। मेरा-तेरा करते-करते, तेरी पूरी उमर हुई। ये मिट्टी का घड़ा शरीर, आत्मा इसका है स्थान। जिस दिन त्यागा उसने इसको, पहुंच जाएगा तू श्मशान। आंखे खोलकर देख सत्य को, करले अपना जीवन आसान। वेद-पुराण भी इस सत्य का, करते आए सदा बखान। मिट्टी से मिट्टी का नाता कभी नहीं है टूटा । खाली हाथ जाना है सबको, जो जोड़ा सब यहीं छूटा। अभिलाषा चौहान

क्षण का ही खेल है सारा

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क्षणभंगुर संसार ये सारा क्षण का जीवन क्षण में मिटता क्षण में बीते जीवन सारा। क्षण ही सत्य क्षण ही शाश्वत क्षण का ही ये खेल है सारा। क्षण में राजा क्षण में रंक क्षण में बदले संसार ये सारा। क्षण का जीवन क्षण में ही जीना क्षण में मृत्यु ने आंचल पसारा। क्षण में दुख क्षण में सुख क्षण में नियति का परिवर्तन सारा। क्षण ही स्मृति क्षण ही स्वप्न क्षण संचालित काल ये सारा। क्षण में मिलन क्षण में जुदाई क्षण आधारित संसार ये सारा। अभिलाषा चौहान स्वरचित