मन की बात

आल्हा छंद में एक प्रयास ________________________ जीवन में संग्राम छिड़ा है, दुख से जलते हैं दिन-रात। धन का मूल्य चढ़ा सिर ऊपर, रिश्ते-नाते खाते मात।। हाल बुरा देखो जनता का, बढ़ती कीमत है बेहाल। नेता रंग बदलते ऐसे, जैसे गिरगिट चलता चाल।। मन में रावण पलता सबके, ऊपर से बनते हैं राम। सदियाँ कितनी बीत गई हैं, कब पूरे होते हैं काम। धर्म सभी का बनता धंधा, मन में उनके पलता खोट। घाव पुराने भरते कैसे, उनपर पड़ती रहती चोट।। सोते रहते सोने वाले, कैसे बदलेंगे हालात। आँखों पर सब पर्दा डाले कब सुनते हैं मन की बात।। अभिलाषा चौहान स्वरचित मौलिक