नासिक, शिर्डी, औरंगाबाद
गतांक से आगे
![]() |
| रोप वे , सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ |
![]() |
| प्राचीन पर्णकुटी नासिक |
![]() |
| सप्तश्रृंगी देवी |
जिस धर्मशाला में हम रुकने वाले थे ,उसे देखकर आनंद ही आ गया। बड़े-बड़े छायादार पेड़ों से आच्छादित गार्डन और चारों और फूल-पौधे लताएं,बीच में दो मंदिर और दो मंजिला भवन चारों और हरियाली....ऐसा लगा जैसे हम वन में आ गए और फिर कमरे , उन्हें देख ऐसा लगा कि यहीं रुक जाओ कम से कम एक महीना....एक बड़ा सा कमरा ,हाल,किचन,बाथरूम और सभी सामान जैसे फ्रिज,अलमारी, सोफा सेट,डबल बेड, स्टडी टेबल, ड्रेसिंग टेबल,एसी,और आरो.... एक्स्ट्रा गद्दे और चादर।वाह....लिफ्ट की सुविधा अलग....बस मन गदगद हो गया....गलियारे में बैठने के लिए भी कुर्सियां पड़ी हुईं थीं और किराया मात्र ग्यारह सौ रूपए.... कहां होटल ढाई-तीन हजार से कम नहीं थे और कहां यह ,उन सभी होटलों को मात देती हुई।प्रबंधक ने कहा कि ऑफ सीजन के कारण आपको यहां जगह मिल गई, नहीं तो हमारे यहां पहले से ही बुक रहते हैं कमरे....हमने ईश्वर को धन्यवाद दिया, उन्होंने हमारे इस सफर को यादगार बना दिया था।अब हमारे पास पूरा एक दिन था....क्या किया जाए....?
रास्ते में आते हुए हमने गोदावरी रिवर फ्रंट देखा था जो यहां से एक किलोमीटर ही होगा शायद....थोड़ी देर रुककर हम वहां चले गए। बहुत ही सुन्दर रिवर फ्रंट था....यह अभी भी बना है क्योंकि हम पहले भी पंचवटी आए हैं तब ऐसा कुछ भी नहीं था।लोग झूम रहे थे ,नाच रहे थे....झरने बह रहे थे,रैन डांस के लिए जगह बनी हुई थी,लेजर शो चल रहा था और सारे पर्यटक मस्त हो रहे थे।
दस बजे हम होटल आ गए थे। सोच-विचार कर हमने सप्तश्रृंगी देवी मंदिर जो शक्ति पीठ भी है,जाने का निश्चय किया था।जो यहां से सत्तर किलोमीटर दूर था ।नाशिक शाम को घूमेंगे ,यही सोच कर हम सब लोग विश्राम करने चले गए।सुबह साढ़े सात बजे हम सप्तश्रृंगी देवी मंदिर के लिए निकल गए।यह नाशिक के वणी कस्बे में सह्याद्रि पर्वत माला में स्थित है। पहाड़ों में गोल-गोल घूमते हुए करीब दो-तीन घंटे बाद हम मंदिर पहुंच गए थे। लेकिन यह मंदिर पहाड़ पर था और करीबन पांच सौ या छह सौ सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाना था। लेकिन यहां पर यात्रियों की सुविधा के लिए रोप वे भी बना है ।यह रोप वे अन्य रोप वे से अलग है यहां पर यह ट्रेन की तरह है जो सीधी खड़ी चढ़ाई पर पटरियों के द्वारा ऊपर जाता है।इसे दो डिब्बे की छोटी ट्रेन भी कह सकते हैं। जहां से यह रोप वे ऊपर जाता है, वहां एक बहुत बड़ा माॅल भी बना हुआ है। यहां सभी सुविधाएं हैं।हम रोप वे से ऊपर गए। मंदिर बिल्कुल पहाड़ की गुफा में बना हुआ था।बाहर से देखने पर यह पहाड़ से चिपका हुआ लगता है।माता की मूर्ति जाग्रत और भव्य थी।उनकी आंखें तो ऐसी लग रहीं थीं कि जैसे कुछ बोल रहीं हों...!! मंदिर में काफी भीड़ थी।कतार में लगकर हमने दर्शन किए.... मंदिर प्रांगण ज्यादा बड़ा नहीं था.... दर्शन बहुत अच्छे हुए और मन आनंदित हो गया।दर्शन कर हम नीचे आ गए थे। यहां फूड कोर्ट भी है जहां चाय वगैरह पीकर हम बाहर आ गए, चारों ओर पहाड़ियां और बीच में हम ,यह बहुत सुंदर दृश्य था।उसके बाद ग्यारह बजे करीब हम वापस चल दिए और यहां से हम सीधे तपोवन जाने वाले थे जहां लक्ष्मण जी का मंदिर बना है।इस स्थान का अपना धार्मिक और ऐतिहासिक महत्त्व है।श्रीराम वनवास के समय यहां काफी समय रुके थे।कहते हैं यहीं पर शूर्पणखा की नासिका लक्ष्मण जी ने काटी थी इसलिए इस शहर का नाम नासिक पड़ा....। यहां पर कई आश्रम बने हुए हैं जो योग-ध्यान और अध्यात्म का केन्द्र है।
सर्वधर्म मंदिर में राम वनवास के कुछ दृश्य अंकित हैं। गोदावरी नदी और कपिला नदी का संगम भी यहीं होता है और यह स्थान कपिल तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है पर नदियों की जो दुर्दशा भारत में है वह किसी से छिपी नहीं है। गोदावरी भी इससे अछूती नहीं है। गोदावरी की निर्मलता भी इंसानों ने हर ली थी। यहां पर नीम ,बरगद ,पीपल,इमली और बिल्व पत्र के वृक्ष बहुत हैं।यह सब घूमकर हम चार बजे अपनी धर्मशाला में लौट आए थे।एक घंटा विश्राम कर हमने आस-पास के स्थलों को घूमने की योजना बनाई थी।शाम को हम सबसे पहले उस मूल पंचवटी को देखने गए जहां कभी श्री राम,सीता और लक्ष्मण ने निवास किया था, यहीं पर सीता गुफा भी है जहां से रावण ने सीता माता का हरण किया था पर हमें यहां निराशा हाथ लगी क्योंकि यहां सुधार कार्यों के चलते इन्हें बंद कर दिया गया था।पंचवटी का मूल सौंदर्य इन सुधारों में कहीं लुप्त ना हो जाए ,यही सोचते हुए हम काला राम मंदिर के दर्शन के लिए निकल पड़े।हर जगह काम चल रहा था और नासिक बदल रहा था...वह नासिक जो हमने २०१४ में देखा था....वह अब बदल गया था....पता चला कि सिंहस्थ कुंभ होने वाला है जो अक्टूबर २०२६ से प्रारंभ होगा ,उसको मद्देनजर रखते हुए विकास के काम हो रहें हैं। वहां दर्शन कर हम गोदावरी राम कुण्ड पर आ गए,कहते हैं यहां स्नान करने से जन्म चक्र से मोक्ष मिल जाता है पर यहां मैया गोदावरी खुद ही गंदगी से मोक्ष की कामना कर रहीं थीं।उनकी कल-कल बहती जलधारा थमी सी प्रतीत हो रही थी,पूछने पर पता चला कि जलप्रवाह को रोक रखा है क्योंकि नदी की सफाई होनी है ।सीवरेज प्लांट लग रहें हैं ताकि नदी को स्वच्छ रखा जा सके…यह आते हुए हमने देखा भी था क्योंकि पैदल घूमने हर चीज का पता चल ही जाता है।मां गोदावरी दक्षिण की गंगा हैं उनकी आरती की तैयारी हो रही थी।हम भी आरती में सम्मिलित हो गए।ठहरे हुए जल की अपनी विशेषता होती है और बहते हुए जल की अपनी.... गोदावरी के जल को हाथों में लेकर जलांजलि देते हुए इस बात का अहसास हो गया था।हम पहले जब आए थे तो रामकुण्ड में स्नान भी किया था,सबकी इच्छा थी स्नान की कि सुबह जल्दी आकर स्नान करेंगे जाने से पहले पर अब यह इच्छा मर गई थी। गोदावरी के तट पर अनेक मंदिर हैं,काशी जैसा दृश्य ही लगता है पर सब मंदिरों में जाना आसान नहीं था।आरती के बाद हमने गोरे राम के दर्शन किए और हमारे रास्ते में जो भी मंदिर आए उन सबके भी....अभी यहां जगह-जगह मशीनें लगी हुई थीं और खुदाई कार्य चल रहा था।कुंभ की तैयारियां जोरों पर थीं इसीलिए हम भीमाशंकर नहीं जा सके क्योंकि सुधार कार्य के चलते उसे तीन माह के लिए बंद कर दिया गया था।
नासिक की सबसे खूबसूरत बात यह थी कि यहां पर पेड़ बहुत हैं और वो भी ऐसे पेड़ जो हमारे शहरों में लुप्त से हो गए हैं।पीपल ,बरगद ,इमली और भी इस तरह के वृक्ष जो पर्यावरण के लिए लाभकारी हैं।मन यही सोच रहा था कि वर्षों पुराने या सदियों पुराने ये वृक्ष विकास कार्य की भेंट ना चढ़ जाएं पर अभी नासिक बहुत हरा-भरा और सुंदर है। मां गोदावरी भी साफ हो जाएं....उनकी पवित्रता को जिस तरह इंसान ने दूषित किया है वो निंदनीय है। हमारे देश को हरा-भरा रखने और उसे जीवन प्रदान करने वाली ये नदियां हमारी पौराणिकता और ऐतिहासिकता की पहचान है।हमारी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है पर हम लोगों ने किसी का महत्व नहीं समझा.... स्वार्थ के वशीभूत होकर हमने नदियों को दूषित किया, वनों को उजाड़ा और अब यह प्रवृत्ति हमारे परिवारों को आघात पहुंचा रही है जिस तरह परिवारों की संरचना बदल रही है जिस तरह भारतीय संस्कृति की उपेक्षा हो रही है वो स्वीकार्य नहीं है। हमें सोचना नहीं करना होगा क्योंकि हमारी आने वाली पीढ़ी भारत के गौरवशाली इतिहास को भूल रही है।उसे हमने क्या दिया है....?उसे क्या सिखा रहे हैं...?जीवन का सच्चा अर्थ भौतिक संसाधनों में खोजना व्यर्थ है।ये हमें सुख देते हैं पर आत्मिक आनंद नहीं....आत्मिक आनंद प्रकृति के सान्निध्य में मिलता है। पर्यावरण सुरक्षित है तो हम सुरक्षित हैं।गंदगी फैलाना आसान है,उसे देखकर मुंह फेरना उससे भी आसान.... लेकिन इसी गंदगी ने सेहत का खजाना चुराना प्रारंभ कर दिया है।हम जब तक सतर्क नहीं होंगे कुछ नहीं बदलेगा.... सरकार क्या कर सकती है जब कचरे वाली गाड़ी आने के बाद भी लोग सड़कों पर कचरा फेंकते हैं....सरकार एक बार कुछ कर सकती है पर उस व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाना जनता का काम है। विदेशों में जो सफाई नजर आती है उसका कारण यही है कि आम जन कचरा नहीं फैलाता।उसे कानून का डर है।हमारे यहां डर नहीं है ना कानून का,ना सेहत खराब होने का,ना प्रदूषण का।इस यात्रा में मैंने यही देखा कि व्यवस्थापक सजग हैं तो जनता भी सहयोग करती है अन्यथा जनता तो जनता है वह कुछ समझना या सोचना नहीं चाहती।
समाप्त
अभिलाषा चौहान



आपका यात्रा-वृतांत पढ़कर आनंद आ गया आदरणीया अभिलाषा जी। साझा करने हेतु बहुत-बहुत आभार आपका।
जवाब देंहटाएं