नाशिक, शिर्डी, औरंगाबाद

 गतांक से आगे


कैलाशा मंदिर 

कैलाशा मंदिर 

कैलाशा मंदिर 






एलोरा की गुफाएं हमारी इस यात्रा के सबसे रोमांचक और अद्भुत यादगार पल बने।इनकी संख्या सौ के करीब है पर पर्यटकों के लिए चौंतीस गुफाएं ही खुली हुई हैं।हमने देखा कुछ देशी-विदेशी पर्यटक पहाड़ों में भी चढ़ रहे थे,कुछ तलहटी में दिखाई दे रहे थे पर यह सब करने की हिम्मत हममें नहीं थी।अभी हमें हिंदू गुफाएं और कैलाशा मंदिर भी देखना था। कार्ट में बैठकर हम गुफा संख्या सोलह के सामने उतर गए थे।यह सब टिकट काउंटर के ठीक सामने है। यहां तेरह से उनतीस गुफाएं हैं जिनमें सबसे अहम गुफा संख्या सोलह थी।जो आज भी संपूर्ण विश्व के लिए पहेली बनी हुई है।

हिंदू धर्म से संबंधित गुफाओं में सभी देवी-देवताओं की आकृतियां बड़ी ही सुंदरता से उकेरी गईं थी।हिंदू धर्म के प्रतीकों से सज्जित इन गुफाओं में सनातनी संस्कृति का जीवंत रूप दिखाई देता है।कैलाशा मंदिर दो मंजिला बना हुआ है।इसकी विशेषता यह है कि इसे एक विशालकाय चट्टान को पहाड़ से अलग कर उसी चट्टान को दो मंजिला मंदिर के रूप में बनाया गया है। इसमें शिव,नंदी की प्रतिमा के साथ रावण को कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास करते दिखाया है। मंदिर के बड़े-बड़े आलों में शिव, पार्वती और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनी हुई है।मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर भी मंदिर बने हुए हुए हैं जो देखने में अत्यंत सुंदर है। मंदिर के भार को उठाए हाथियों की मूर्तियां बनी हुई हैं।ये हाथी मंदिर के चारों ओर बने हुए हैं, इनमें से कुछ क्षतिग्रस्त भी हो गए हैं। मंदिर की दीवारों पर हिन्दू देवी-देवताओं की प्रेमालाप करती मूर्तियां बनी हुई हैं।इस मंदिर के चारों ओर पहाड़ के अंदर ही गलियारा बना है , उसमें भी छोटे-छोटे मंदिर बने हैं।गलियारे के ऊपर पहाड़ है और उस पहाड़ के लटकते हिस्से में भी छोटी-छोटी मूर्तियां कुशलता से उकेरी गई हैं।यह सारी गुफाएं पुरातत्व विभाग को खुदाई में मिली हैं।

हजारों साल पुरानी इन गुफाओं में भारतीय संस्कृति की समृद्धता,ज्ञान , कल्पनाशीलता और महात्म्य देखने को मिलता है।जब ये गुफाएं निर्मित हुई होंगी तब छैनी और हथोड़ा ही होता होगा..!!!!कैसे पहाड़ के एक हिस्से को काटा गया होगा....??कैसे उस हिस्से को मंदिर का रूप दिया गया होगा..?कैसे इतनी सुंदर शिल्पकला-मूर्तिकला को इनपर उकेरा गया होगा...?कैसे एक ही चट्टान को दो मंजिला मंदिर और पांच मंदिरों का समूह बनाया गया होगा...? मंदिर के दर्शन कर इन प्रश्नों ने मन में तूफान उठा दिया था... मंदिर की भव्यता ने जहां उस कालखंड के विषय में सोचने पर मजबूर किया था वहीं हमें तमाम प्रश्नों में उलझा दिया था।यह कैसे बना होगा...?यह आज भी हमारे मन को उद्वेलित करता है और हमें उस काल के भारत की महानता का बोध‌ होने लगता है। यहां मंदिर का जयघोष करते दो विशाल हाथियों की मूर्तियां मंदिर के मुख्य द्वार पर बनी हुई हैं और पास में ही एक विशाल स्तंभ है जो शायद दीपस्तंभ रहा होगा।

इन गुफाओं ने मन को आश्चर्य बोध से भर दिया था। वहां से आने का मन नहीं हो रहा था पर चार बजने वाले थे और शरीर ने अब जबाव दे दिया था।आज हम लोग करीबन बीस हजार कदम चल लिए थे,ऐसा मोबाइल ही नहीं शरीर भी बता रहा था।मन नहीं भरा था ,तन थक गया था।अभी और भी यात्रा बाकी थी तो हम होटल आ गए।आज का दिन हमारे लिए यादगार बन गया था।रात को हम हनुमान मंदिर गए और अगले दिन की योजना बनाने लगे , हमें पता चला कि अजंता अगले दिन बंद हैं।एलोरा और अजंता गुफाएं हफ्ते में अलग-अलग दिन पर बंद रहती हैं।होटल वाले से इस विषय में बात हुई तो उसने बताया कि मुख्य तो एलोरा ही है ,अजंता भी हुबहू इसकी प्रतिकृति है। वहां पर बौद्ध विहार,स्मारक और चैत्य इत्यादि बने हुए हैं। अजंता की एलोरा से दूरी भी सौ किलोमीटर थी और मुंबई से हमारी फ्लाइट दो दिन बाद थी।हम सब सोच में पड़ गए कि क्या करना चाहिए...?


अजंता जाकर लौटना तो मुमकिन नहीं था सो सबने यही कहा कि यहां से शनि शिंगणापुर चलते हैं और वहां से नासिक....!!!सहमति बनते ही अगले दिन हम सुबह-सुबह शनि शिंगणापुर के लिए निकल गए। यहां से शनि शिंगणापुर कोई इक्यासी किलोमीटर था।करीब तीन -चार घंटे बाद हम शनि शिंगणापुर में थे। यहां भी सब बदला-बदला हुआ था।पहले टैक्सी स्टैण्ड से सड़क पर लाइन लगाते हुए मंदिर में जाना होता था।अब स्टैंड से भूमिगत मार्ग बना दिया गया था जो सीधे मंदिर प्रांगण में निकलता था।ये काम बहुत अच्छा हुआ था। नहीं तो अधिक भीड़ में सड़क पर तपती धूप में लाइन लगाना बहुत ही मुश्किल होता था और पैर जलते थे सो अलग.... यहां भूमिगत मार्ग बहुत अच्छा बना हुआ था।बैठने की जगह भी बनी हुई थी। मंदिर में भी टोकन सुविधा थी।अगर आप पांच सौ रूपये जमा करते हैं तो शनि देव को स्वयं तेल चढ़ा सकते हैं।हमने भी यही किया.... जगह-जगह पार्क बना दिए थे। छायादार वृक्ष भी लगे हुए थे और एक विशाल और काफी ऊंचे दीप स्तंभ का भी निर्माण हुआ था। सामने ही आई लव शिंगणापुर का बोर्ड लगा था....वास्तव में इस बार यहां आकर मन खुश हो गया।जितना काम यहां हुआ है उतना त्र्यंबक या घृष्णेश्वर में नहीं।सब कुछ घूमते हुए हम वापस अपनी गाड़ी के पास आ गए थे। यहां हमें दो घंटे लगे।पहले हम जितने बार भी शनि शिंगणापुर आए ,हमने देखा था कि यहां लोगों के घरों में दरवाजे ही नहीं थे.... यहां कोई ताला नहीं लगाता था पर अब समय बदला है और दरवाजे हैं तो ताले भी होंगे।


दोपहर का एक बज रहा था ।सोचा कहीं अच्छे से रेस्टोरेंट में पहले पेटपूजा की जाए।अब यहां रुकना तो था नहीं, यहां से नाशिक की दूरी १४४ किलोमीटर थी।दो बजे भी यदि निकले तो सात बजे तक पहुंच जाएंगे। इसलिए हम वहां से चल दिए अपने अगले और अंतिम मुकाम पर....रास्ते में खाना खाया....हाइवे पर गाड़ी सरपट दौड़ती है तो हमने सोचा क्यों ना पहले ही होटल बुक कर लिया जाए पर होटल जमे नहीं,तब हमने यात्राधाम पर धर्मशालाएं देखी ....पंचवटी पर हमें एमबीएम ट्रस्ट की धर्मशाला में कमरे मिल गए....पंचवटी इसलिए चुना था कि यहां आस-पास बहुत कुछ दर्शनीय है।करीब सात बजे तक हम नाशिक पहुंच गए थे।शेष कल..



क्रमशः 



अभिलाषा चौहान 





टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही सुंदर और मनभावन वर्णन है आपकी लेखनी से आपकी इस यात्रा का। आपने अपने पाठकों को इस यात्रा में अपने साथ जोड़ लिया है।

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