नाशिक, शिर्डी, औरंगाबाद
गतांक से आगे
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| एलोरा |
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| Elora caves |
मंदिर पहुंचने में हमें एक मिनट ही लगा...इस समय आना वरदान से कम नहीं था....भीड़ ही नहीं थी।हम जल्दी-जल्दी चलते हुए मंदिर में पहुंच गए थे। मंदिर काले और लाल पत्थर से बना हुआ था और क्यों ना हो क्योंकि हमारे प्राचीन मंदिरों ने आक्रांताओं के जितने दंश सहे हैं वो किसी से भी छिपे नहीं हैं।इस मंदिर को भी बार-बार तोड़ा गया लेकिन फिर भी यह अपनी धर्म ध्वजा को आज भी लहरा रहा है। दक्षिणी शिल्प कला का सुंदर उदाहरण है यह मंदिर।यह मंदिर इसलिए भी अनोखा है क्योंकि यहां पूरा शिव परिवार स्थापित है।हम लोग ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर चुके थे।मन अगाध आनंद से भर गया था।थोड़ी देर रुकने के बाद हम प्रांगण में आ गए।बैठकर मंदिर को निहारते रहे आसमान में चमकता चांद मंदिर के शिखर पर लगा हुआ प्रतीत हो रहा था। मंदिर के कपाट बंद हो चुके थे।हम लोग भी बाहर निकल आए क्योंकि सुबह रुद्राभिषेक के लिए वापस आना था।पैदल चलते हुए हमने जो देखा वो हमारे मन को दुखी कर रहा था।गंदगी बहुत थी....चाहे यहां हो या त्र्यंबकेश्वर....इतने महत्व के स्थानों की अनदेखी स्वीकार्य नहीं है। शिर्डी जहां साफ-सुथरा था वहीं इन दोनों स्थानों पर मंदिर के आस-पास जो गंदगी थी,यह वहां के व्यवस्थापकों की अनदेखी है।पैसा सभी मंदिरों में आता है पर उसका उपयोग यदि मंदिरों के रखरखाव में ना हो तो व्यर्थ है।सनातन संस्कृति के संवाहक हैं यह मंदिर... सदियों से हिंदू आस्था के प्रतीक.... पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के इन स्थलों को सहेजना सिर्फ सरकार का दायित्व नहीं है बल्कि मंदिर ट्रस्ट और जनता का भी है।हमने अपने इस खूबसूरत देश को गंदगी का ढेर बना दिया है। स्वच्छता हमारे यहां जुबानी जुमला बन चुकी है।हम कभी नहीं सोचते कि इस गंदगी के कितने दुष्प्रभाव सामने आते हैं।सब एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते रहते हैं और सिर्फ अपने घर को ही देश मान बैठते हैं।यह दायित्व हम सबका है कि कचरा हर जगह ना फेंके।
खाना खाकर हम होटल आ गए थे।सुबह छह बजे मंदिर पहुंचना था क्योंकि हम रुद्राभिषेक की पर्ची कटाकर आए थे।सुबह जल्दी ही मंदिर पहुंच गए। यहां गर्भगृह में पुरूष केवल धोती पहन कर ही प्रवेश कर सकते हैं। गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग का स्पर्श करना आध्यात्मिक आनंद से भर देता है।करीब एक घंटा लगा हमें....बाहर आकर हम वह तालाब खोजते रहे जहां घुष्मा के पुत्र को सौतेली माता ने वध करके डुबो दिया था पर वह स्थान अभी भक्तों के लिए बंद था।बगल में मस्जिद का गुबंद सिर उठाए खड़ा था,यह बात हजम नहीं होती कि जहां हमारे वे मंदिर हैं जिनका वर्णन पुराणों में है वहां मस्जिदें बनी हो पर यही तो बताता है कि मुस्लिम आक्रांताओं की मंशा क्या थी...? यहां और भी मंदिर बने थे,उन सबके दर्शन कर हम होटल आ गए।होटल जहां बना था, वहां आसपास हरे-भरे पहाड़ दिखाई दे रहे थे।दस बजे हमें एलोरा के लिए निकलना था जो कि चार मिनट की दूरी पर ही थीं।
एलोरा गुफाएं युनेस्को विश्व धरोहर की सूची में शामिल हैं।यह अत्यंत प्राचीन गुफाएं हैं।राष्ट्रकूट शासकों ने इन गुफाओं का निर्माण करवाया था। चट्टानों को काटकर इन गुफाओं को बनाया गया था। धार्मिक एकता,सनातनी संस्कृति और हिंदुत्व की महानता का उदाहरण हैं ये गुफाएं।प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति का जीवंत प्रतीक हैं ये गुफाएं।चट्टान कट शैली और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण हैं ये गुफाएं,जो यह सोचने पर विवश कर देती हैं कि उस समय जब आधुनिक औजार नहीं थे तब कैसे इंसानों ने पहाड़ को काटकर गुफाओं का निर्माण किया होगा और गुफाओं का ही नहीं, उसमें किस तरह पत्थरों को तराशकर इतनी सारी भव्य और दिव्य मूर्तियां बनाई गई होंगी....!!!!हमारे लिए यह आश्चर्य जनक और अकल्पनीय था।
एलोरा गुफाओं में प्रवेश के लिए आपको टिकट लेना पड़ता है और यह ठीक भी है, पुरातात्विक स्थलों की देखभाल के लिए यह जरूरी भी है।यह गुफाएं आप पैदल चलकर नहीं घूम सकते क्योंकि यह पहाड़ों में फैली हुई हैं। यहां कुल चौंतीस गुफाएं हैं जो कि किलोमीटर के दायरे में फैली हुई हैं, इसलिए यहां पर कार्ट चलती हैं जो आपको गुफाओं तक पहुंचा देती हैं। प्रवेशद्वार से सबसे दूर जो गुफाएं हैं उनकी संख्या तीस से चौंतीस है।कार्ट पर्यटकों को सबसे पहले वहीं ले जाती है। यहां पर पहाड़ों में बनी गुफाएं दूर से ऐसी लगती हैं जैसे पहाड़ों में किसी ने दरवाजे बना दिए हों पर जब आप अंदर पहुंचते हैं तो.....!!बस सिर झुक जाता है उन लोगों के प्रति जिन्होंने खून-पसीना बहाकर इनका निर्माण किया होगा....अंदर बड़े-बड़े हाॅल बने हैं,धम्म सभास्थल बने हैं,और तो और यह सारी गुफाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और दो मंजिला हैं।क्या जज्बा रहा होगा उस काल में इन गुफाओं को आकार देने वालों का और उनकी बौद्धिक क्षमता और कल्पनाशीलता का.....पहाड़ को काटकर दो मंजिला भवन बनाना और उसमें बाहर से कोई सामग्री प्रयुक्त ना करना.... यहां पर बारह बौद्ध गुफाएं,सत्रह हिंदू गुफाएं और पांच जैन गुफाएं हैं।इन गुफाओं में छोटी से लेकर बड़ी मूर्तियां पत्थर काटकर ही उकेरी गई हैं। गुफाओं में प्रवेश करने के बाद शीतल हवाएं आपकी सारी थकान हर लेती हैं।जैन धर्म के तीर्थंकरों की प्रतिमाएं ध्यानावस्थित, खड़ी हुई, उपदेश देती हुई दिखाई देतीं है।हाथी,कमल ,शंख और भी ना जाने कितनी आकृतियां उकेरी गई हैं। गुफाओं को जोड़ने के लिए सीढ़ियां भी बनी हुई हैं।इन प्रतिमाओं के सौंदर्य और अद्भुत कारीगरी को देख मन खो जाता है और अपनी ऐतिहासिक समृद्धता के सामने नतमस्तक हो जाता है।कितना दबाया गया,कुचला गया और उजाड़ा गया भारतीय संस्कृति को,उसकी सभ्यता को, नहीं तो विश्व में कोई हमारा मुकाबला नहीं कर सकता था कितने प्रबुद्ध,कर्मठ,कल्पनाशील रहे होंगे वे लोग जो पहाड़ को नुक़सान पहुंचाए बिना उसके अंदर पूरा मठ बना दें....!!! लेकिन अभी हमने वह स्थल नहीं देखा था जो विश्व के लिए भी आश्चर्यजनक है और अकल्पनीय, अद्भुत है।इन गुफाओं को देखने में एक घंटा लगा.... सबकुछ अविश्वसनीय था, आंखें उस सौंदर्य को,शिल्प को निहारते हुए थक ही नहीं रहीं थीं यह सभी जैन गुफाएं थीं।
इसके बाद हमने देखा कि कार्ट आ गई थी और हम सब लोग अब जिन गुफाओं के दर्शन के लिए जाने वाले थे,वे बौद्ध धर्म, दर्शन और अध्यात्म की प्रतीक थीं। बहुत चलना पड़ता है इन्हें देखने के लिए...अभी तो कुछ भी नहीं देखा था पर थकान अनुभव हो रही थी।अब कार्ट ने हमें गुफा संख्या एक के सामने उतार दिया था।एक से लेकर बारह तक बौद्ध गुफाएं हैं। इनमें बौद्ध विहार,मठ तथा चैत्य बने हुए हैं। दीवारों पर नक्काशी देखते ही बनती हैं। भगवान बुद्ध की पंद्रह फीट ऊंची प्रतिमा की भव्यता देखते ही बनती थी। कहीं वे उपदेश देते हुए दिखाई दे रहे थे।ये गुफाएं दो तल और तीन तल की थीं।सारी तो हम नहीं घूम पाए क्योंकि इतना चलना पड़ रहा था कि पूछो मत....हम यहां नीचे ही सारी गुफाओं को देखते हुए आश्चर्य चकित और श्रद्धावनत होते रहे....इन गुफाओं ने कलात्मकता की श्रेष्ठता को छू लिया था। संपूर्ण भारतीय दर्शन जैसे पत्थरों में झलक आया था। यहां शिलालेख भी देखने को मिले.... बहुत कुछ था वहां... अद्भुत अकल्पनीय और अविश्वसनीय.....अभी बहुत कुछ देखना बाकी था।भारत की श्रेष्ठता , अध्यात्म और जीवन शैली का प्रतिबिम्ब इन गुफाओं में झलक रहा था।
क्रमशः
अभिलाषा चौहान


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