नाशिक, शिर्डी,औरंगाबाद

गतांक से आगे


द्वारावती भक्त निवास 


शिर्डी पहुंचते-पहुंचते हमें नौ बज गए थे। शिर्डी का वैभव कितना बढ़ गया है,साफ दिखाई दे रहा था। बड़े-बड़े होटल,शोरूम्स,शानदार सड़कें सबकुछ बहुत सुन्दर लग रहा था।हमने 'द्वारावती भक्त निवास'में अपने कमरे बुक किए थे।हम पहले भी यहां ठहर चुके थे।यह भक्त निवास शानदार,साफ-सुथरा और सभी सुविधाओं से युक्त है।यह चार मंजिला इमारत काफी लंबे-चौड़े एरिया में बनी हुई है। इसमें कितने कमरे हैं...ये तो नहीं पता पर यह कभी खाली नहीं होती... यहां आकर अगर इसमें आप ठहरना चाहें तो आपकी किस्मत ही होगी कि आपको कमरा मिले अन्यथा कमरा नहीं मिलता।इसकी बुकिंग साईं ट्रस्ट के माध्यम से आनलाइन ही दो माह पूर्व होती है अर्थात जिस तारीख को आपको कमरा चाहिए, उसी तारीख को दो महीने पहले बुक करें।यह स्थान इतना सुन्दर है कि आप यहां आकर जाना नहीं चाहेंगे।साफ-सुथरे एसी कमरे ,सभी सुविधाओं से युक्त और किराया मात्र नौ सौ रुपए और नान एसी रूम साढ़े चार सौ रुपए में मिल जाते हैं।यह स्थान शिर्डी समाधि स्थल से करीब आठ सौ या नौ सौ मीटर पर है। यहां केंटीन भी है जिसमें आपको खाना भी मुफ्त मिल जाता है और सामने बहुत बड़ा पार्क भी है। यहां कमरे बहुत बड़े हैं और तीन बेड पड़े हुए हैं।नीचे बड़े-बड़े हाॅल बने हुए हैं जिनमें वेटिंग एरिया है। बीच-बीच में सुंदर पेड़-पौधे भी लगे हुए हैं। यहां पर इस बार हमने साईं बाबा की लेटी हुई मूर्ति देखी जो वैक्स की बनी हुई थी और झूले पर लेटी हुई थी।यह मूर्ति अत्यंत सजीव लग रही थी।

सुबह जल्दी उठकर हम दर्शन के लिए निकल गए। बहुत कुछ बदल गया था यहां भी.... अलग-अलग रास्ते बना दिए गए थे।कतार में लगने के लिए अलग-अलग गेट थे ताकि एक ही जगह भीड़ इकट्ठी ना हो....हम देख ही रहे थे कि किस गेट से जाएं...?तभी एक व्यक्ति पास में आया और कहने लगा कि सीनियर सिटीजन की व्यवस्था अलग से है।आप गेट नंबर दो से जाइए।वह हमें अपने साथ ले गया और हम समझ गए कि यह अब बिना पैसे लिए नहीं मानेगा....इस तरह के लोगों की या तो खुद की दुकानें होती हैं या फिर ये उन दुकानों पर काम करते हैं,उसने ऐसा दिखाया कि उससे भला कोई नहीं है पर हमें जब प्रसाद लेना पड़ा तब समझ में आ गया कि अच्छी-खासी चपत पड़ गई है। साईं प्रसाद तो अंदर ही मिलता है,हमने कहा भी उसे पर माला और चादर के लिए ही उसने हमसे अच्छे-खासे पैसे वसूल लिए।उसके बाद हम कतार में लग गए।अंदर जिस हाॅल में पहुंचे वह वहीं हाॅल था जहां साईं बाबा की समाधि है,लोग चारों तरफ से आ रहे थे और हाॅल में चार लाइनों में लग रहे थे।

हमें दर्शन अच्छे हुए और आसानी से हुए।इसके लिए हमने मन से उस व्यक्ति का धन्यवाद किया कि उसने हमें गेट नंबर दो से जाने को कहा। यहां पर आपका आधार कार्ड चेक किया जाता है कि आप सीनियर सिटीजन हैं या नहीं।इसके बाद हम प्रांगण में घूमते रहे ।द्वारकामाई में दर्शन करने गए।कुछ खरीदारी की।लेंडी बाग में घूमें।करीब बारह बजे हम इस सबसे निपट गए थे।सोचा साईं प्रसादालय जाकर प्रसाद पाया जाए पर उसकी जगह बदल दी गई थी।पहले वह स्थान मंदिर के पास था,अब अन्यत्र बना दिया गया था। पूछते-पूछते पैदल ही चल दिए पर आधा घंटे बाद भी प्रसादालय को इंगित करते निशान ही दिख रहे थे।भूख जोरों की लगी थी तो हम द्वारावती भक्त निवास आ गए। यहां भी साईं प्रसादालय है तो यहीं प्रसाद पाया जाए।टोकन लेकर हम कैंटीन में चले गए। शुद्ध सात्विक भोजन खाकर आनंद आ गया। यहां चाय भी अच्छी और सस्ती मिलती है तथा पानी की बोटल भी दस रूपए में ही मिलती है।खाना खाकर हम आराम करने अपने-अपने कमरों में चले गए।

चार बजे हमें छत्रपति संभाजी नगर अर्थात औरंगाबाद के लिए निकलना था। शिर्डी से सत्तर किलोमीटर दूर शनि शिंगणापुर है, वहां भी जाना था। लेकिन वह हम औरंगाबाद से लौटते हुए जाने वाले थे। शिर्डी से औरंगाबाद जाने के लिए भी हम समृद्धि हाइवे से ही निकले,यह नागपुर तक जाता है।हाइवे पर गाड़ियां सरपट दौड़ रहीं थीं।नाक की सीध में सरपट भागती गाड़ियों को देख बोरियत हो रही थी।हमने ड्राइवर से भी यह पूछ लिया कि कैसा लगता है नाक की सीध में सिर्फ गाड़ी चलाते जाना।वह बोला कि तभी तो एक्सीडेंट हो जाते हैं क्योंकि नींद आ जाती है।उसका यह बोलना ही था कि एक जगह भीड़ दिखाई दी ,पता चला कि अभी -अभी एक्सीडेंट हुआ है।कार और ट्रक में भिड़ंत हो गई थी।पता नहीं उनमें सवार लोगों का क्या हुआ होगा...?

औरंगाबाद जो आज छत्रपति संभाजी नगर के नाम से जाना जाता है वह स्थान घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग,एलोरा अजंता की गुफाओं और अन्य ऐतिहासिक प्रतीकों के लिए प्रसिद्ध है पर हमें तो सिर्फ घृष्णेश्वर जाना था।मुगलकाल में बने स्मारकों के लिए ना हमारे पास समय था और ना ही उनमें हमारी दिलचस्पी थी। इसलिए हमने होटल भी घृष्नेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास ही बुक किया था।यह स्थान औरंगाबाद शहर से बाहर वेरुल गांव में स्थित है ये और भी अच्छा था। हमें शहर में नहीं जाना पड़ा। शिर्डी से औरंगाबाद तीन-साढ़े तीन घंटे में आराम से पहुंच जाते हैं।यह समय भी ज्यादा है अगर आप कहीं रास्ते में रुके नहीं तो...!!वैसे औरंगाबाद में बीबी का मकबरा,दौलताबाद का किला जैसे स्थान है जिनके नाम सुनकर ही जाने की इच्छा नहीं होती।

हमने रास्ते में होटल बुक कर लिया था।अच्छी जगह था होटल....मंदिर का शिखर दिखाई दे रहा था।मंत्रों की गूंज सुनाई दे रही थी।मन कर रहा था कि अभी पहुंच जाएं दर्शन को पर कोई फायदा नहीं था क्योंकि आठ बजने वाले थे ,शायद दर्शन ना मिलें....होटल वाले से इस विषय में बात की तो उसने कहा कि आप चले जाइए ,अगर भीड़ नहीं हुई तो दर्शन मिल जाएंगे और उसने बताया कि अगर आपको शुद्ध सात्विक भोजन करना है तो इन रेस्टोरेंट के अलावा कहीं भी ना जाएं...गाड़ी खड़ी ही थी।दो मिनट का रास्ता था...मन महादेव में अटका था सो हम दर्शन के लिए निकल गए।


क्रमशः


अभिलाषा चौहान 





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