नाशिक-शिर्डी-औरंगाबाद
फ़रवरी माह में हम नासिक, शिर्डी और औरंगाबाद की यात्रा पर गए।नासिक और शिर्डी तो हम पहले भी गए थे लेकिन इस बार औरंगाबाद नया था हमारे लिए। दरअसल हम मुंबई शादी में गए थे तो वहीं से इस यात्रा का आयोजन कर लिया।हमने अपनी गाड़ी बुक कर ली थी। कल्याण, मुंबई से हम सुबह आठ बजे त्र्यंबकेश्वर नाशिक के लिए निकल गए थे।हम जिस हाइवे से जा रहे थे,वह समृद्धि हाइवे है और शानदार बना हुआ है।साफ-सुथरे रेस्ट रूम बने हुए हैं।गाड़ी सरपट दौड़ रही थी।रास्ते में रुकते-रुकाते हम करीब दो बजे त्र्यंबकेश्वर पहुंच गए थे। यहां आने के लिए नाशिक जाना जरूरी नहीं है। यहां पहुंचे तो पुलिसवालों ने पार्किंग में जाने का रास्ता बंद कर रखा था।यह पार्किंग मंदिर के पास थी और दूसरी पार्किंग मंदिर से दो किलोमीटर दूर थी।हम गाड़ी मोड़ने लगे तो एक आदमी गाड़ी के पास आया और बोला-"पार्किंग जाना है तो चार सौ रुपए दो।"
हमने कहा-"पुलिस वाले तो मना कर रहें हैं फिर पैसे क्यों..?"आपको जाना है या नहीं "वह बोला।जाना तो था ,साथ में और लोग भी थे ,दे दिए चार सौ रूपए और इस बार पुलिसवालों ने नहीं रोका तब सारा माजरा समझ आ गया। भ्रष्टाचार हमारे जीवन में इस तरह समा गया है कि हर स्तर पर यह ना जाने कितने रूपों में दिखाई देता है।
चारों ओर पहाड़, हरियाली तथा बीच में महादेव का निवास स्थान....यह जगह बारिश में बहुत ही सुन्दर हो जाती है जब बादल पहाड़ों पर उतर आते हैं और झरने बहते दिखाई देते हैं तब यह जगह हिल स्टेशन प्रतीत होती है। लेकिन फरवरी माह में यह सब नहीं था पर जहां महादेव का वास हो वो स्थान हमेशा सुंदर होता है।...यहां भी काफी कुछ बदल गया था।हम मंदिर के दक्षिणी द्वार से अंदर गए....भीड़ काफी थी तो सोचा वीआईपी दर्शन के टिकट ले लेते हैं।टिकट लेने के लिए हमें दो किलोमीटर चलना पड़ा ।यह तो वही बात हो गई जिसके लिए चार सौ रुपए दिए थे क्योंकि यह काउंटर पूर्वी द्वार पर था।पहले त्र्यंबक में इतनी दुकानें वगैरह नहीं थी।ना ही मंदिर के निकट इतना कंस्ट्रक्शन था पर मंदिर अब चारों ओर से घिर गया था।हम टिकट लेकर कतार में खड़े हुए तो पता चला अभी एंट्री नहीं हो रही है।करीब आधा घंटे वहां खड़े रहे ।उसके बाद सिक्योरिटी गार्ड ने हमें हाॅल में प्रवेश करने दिया।यह नया बना था। यहां पर कतारें लगी हुई थीं।इन कतारों में चलते हुए हम मंदिर प्रांगण में पहुंचे.... यहां पर भी कतारें...!! वीआईपी टिकट किसी काम नहीं आया।आता भी नहीं है और लेना भी नहीं चाहिए। क्योंकि हम पहले भी यह अनुभव कर चुकें हैं।करीब एक घंटा कतार में चलते रहे ।यह एरिया पहले खुला हुआ था।अब कवर्ड है , पंखे भी लगे हुए हैं और पीने के पानी की व्यवस्था भी है लेकिन एक बात अखर रही थी।इस नए परिसर की खाली जगहों पर लोगों ने खाली बोतलें और चाय के खाली डिस्पोजेबल ग्लास और भी कचरा पटक रखा था।यह गंदगी बदबू उत्पन्न कर रही थी,पता नहीं कबसे सफाई नहीं हुई थी।मन दुखी हो गया कि लोग दर्शन करने आते हैं और कचरा फेंककर चले जाते हैं।सफाई का काम करने वाले भी शायद सोच बैठे हैं कि यह सब बार-बार होगा तो रहने दो गंदा...!! लेकिन गंदगी सुंदरता पर दाग बन जाती है और आस्थावान भक्तों की आस्था पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाता है कि वे सिर्फ गंदगी फैलाने आते हैं...!!
आखिर में हम मंदिर के गर्भगृह में पहुंच गए। यहां पर भी भीड़ थी। व्यवस्था की बात करें तो नाममात्र को थी।कुछ तो भक्तों की धक्का-मुक्की और कुछ सिक्योरिटी गार्ड के द्वारा दिए जाने वाले धक्के....मन को नाखुश कर रहे थे। व्यवस्था भी ताली की तरह होती है जैसे ताली दो हाथों से बजती है,वैसे ही व्यवस्था भी दोनों ओर से होती है।हम केवल सिक्योरिटी गार्ड्स को दोष नहीं दे सकते।सामने ही विशाल नंदी थे।नंदी को स्पर्श कर अब हम मुख्य गर्भ गृह के सामने थे। यहां पर ब्रह्मा विष्णु,महेश तीनों ही लिंग रूप में स्थापित हैं। यहां शिवलिंग जमीन के अंदर गड्ढे में स्थापित हैं,उसके दर्शन के लिए ऊपर बड़ा सा दर्पण लगा हुआ है।यह स्थान अत्यंत भव्य और दिव्य है।इस ज्योतिर्लिंग का दर्शन बहुत ध्यान से करना पड़ता है क्योंकि लिंग सिर्फ एक इंच के है।शिल्पकला की दृष्टि से यह मंदिर बहुत ही सुन्दर है।काले पत्थर से सिंधु-आर्य शैली में इसका निर्माण हुआ है।प्रागंण में दीप स्तंभ भी बने हैं।यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है।कहते हैं गौतम ऋषि के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां आकर लिंग रूप में विराजमान हुए। मंदिर के पास ही ब्रह्मगिरी पर्वत से दक्षिण की गंगा गोदावरी का उद्गम हुआ है। वहां जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं।युवा-उत्साही तो वहां चले जाते हैं गोमुख के दर्शन करते हैं पर हमारी श्रद्धा जबाव दे गई थी। हमें दर्शन करके बाहर निकलते हुए पांच बज गए थे। मंदिर के आस-पास दुकानें तो सजी हुई थीं पर गंदगी यहां भी थी। सोमनाथ और द्वारका जैसी सफाई का अभाव और अंतर साफ दिखाई दे रहा था।ट्रस्ट यहां भी है पर व्यवस्था की अनदेखी बहुत है।
यह मंदिर कालसर्प दोष की पूजा के लिए विख्यात है।अब हमें शिर्डी के लिए निकलना था।हमने वहां पहले से ही धर्मशाला बुक कर रखी थी। शिर्डी यहां से तीन घंटे दूर है।हाइवे होने के कारण हम शायद जल्दी भी पहुंच सकते थे।
क्रमशः
अभिलाषा चौहान

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