द्वारका -सोमनाथ

अंतिम भाग





सोमनाथ मंदिर 





सोमनाथ में आरती का समय हो गया था।भोले बाबा के दर्शन कर चुके थे पर मन फिर लालायित 
हो उठा था... क्यों ना आरती में सम्मिलित हुआ जाए और हम फिर से कतार में लग चुके थे।आरती का आनंद ही कुछ अलग था। अनिर्वचनीय था। यहां पर लाइट और साउंड शो भी होता है पर दो दिन से यह बंद था क्योंकि प्रधानमंत्री जी का आगमन हुआ था।लोग मंदिर में सजावट के लिए लगे फूल ही तोड़ रहे थे...क्या करेंगे ये फूलों का...? पर आस्था की बात पर क्या प्रश्न करें...?तोड़ना तो नहीं चाहिए पर तोड़ रहे थे क्या ये इन्हें घर ले जाएंगे...?खैर....हम बाहर आ गए थे रात के नौ बजने वाले थे।भूख भी लग रही थी।हम चल दिए अपने होटल की ओर...रास्ते में अच्छा सा रेस्टोरेंट देख खाना खाया और बाकी जगह अगले दिन घूमेंगे यही सोच होटल पहुंच गए।

यहां हमारा होटल मंदिर से कम से कम आठ किलोमीटर दूर था।यह बात हमें परेशान भी कर रही थी क्योंकि अगर सोमनाथ मंदिर के आस-पास होटल होता तो हम पैदल ही समुद्र के किनारे चले जाते।

अगले दिन हमारी वंदे भारत अहमदाबाद के लिए बुक थी और हमें ग्यारह बजे चेक आउट भी करना था।सुबह जल्दी नहा-धोकर, चाय-नाश्ता कर हम फिर से सोमनाथ मंदिर चल दिए।अभी हमने पुराने सोमनाथ मंदिर के दर्शन नहीं किए थे।इस बार हम जिन गलियों से गुजरे वहां सिर्फ मछलियों की बू आ रही थी।यह बू सहन नहीं हो रही थी पर यह वहां काम करने वाले मछुआरों की आजिविका है।हम सोमनाथ मंदिर पहुंच गए थे।यह मंदिर नए सोमनाथ मंदिर के समीप ही स्थित है।इस मंदिर की विशेषता यही है कि आप स्वयं शिवलिंग का अभिषेक कर सकते हैं।हमने पूजन सामग्री खरीद ली थी।लोग रुद्राभिषेक भी करा रहे थे ,हमने स्वयं ही अभिषेक करने का निर्णय लिया।दूध भी अभिषेक के हिसाब से मिल रहा था।१०१,२५१,५०१ जैसा आप करना चाहो....दूध में पानी मिला हुआ था। खैर ,जो भी हो.... मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही माता अहिल्याबाई की बड़ी सी प्रतिमा स्थापित है। अहिल्याबाई होलकर ने आक्रांताओं द्वारा नष्ट किए गए हिंदू मंदिरोंको का पुनर्निर्माण करवाया।ना जाने कितने नए मंदिर बनवाए।उनके इन कार्यों ने निराशा में डूबीं हिंदू जनता में आशा का संचार किया।उनके द्वारा ना जाने कितने कुएं और बावड़ियां बनवाई गईं।भारत के पुनरुत्थान में उनका योगदान अविस्मरणीय है।मालवा साम्राज्य की मराठा रानी थीं । उन्होंने अपने जीवन-काल में जितनी कुशलता से शासन की डोर संभाली वैसे ही भारत की छिन्न-भिन्न हिंदू आस्था को संगठित करने का अथक प्रयास किया।

यह मंदिर अपनी शिल्प कला से मन मोह रहा था।मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग का अभिषेक कर जिन सीढ़ियों से हम बाहर निकले वो अत्यंत प्राचीन थीं। यहां और भी मंदिर बने हुए थे।सबके दर्शन करके हमने वहां से नए सोमनाथ मंदिर को भी देखा जिसके दर्शन हम कल कर चुके थे।नया सोमनाथ मंदिर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया था। अद्भुत इतिहास है सोमनाथ मंदिर का ,चाहे वो नया हो पुराना....कितनी बार इसे तोड़ा गया पर यह हमेशा तोड़ने वालों के लिए निराशा ही लेकर आया।जितना इसका विध्वंस हुआ उतना ही इसका निर्माण।

मंदिर के समीप ही बना हुआ था पक्षी घर,एक मीनार, जिसमें सैकड़ों पक्षियों के रहने की व्यवस्था थी। मंदिर से निकलकर हम उस जगह आए जहां लक्ष्मी-नारायण का मंदिर बना हुआ था।यह मंदिर रात से ही हमें अपनी ओर खींच रहा था पर रात्रि में हमें देर हो गई थी इसलिए दर्शन नहीं कर पाए थे।यह मंदिर मदुरई स्थित मीनाक्षी मंदिर जैसा प्रतीत हो रहा था अर्थात शिल्प और वास्तु में हुबहू वैसा ही, मंदिर पर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनी हुईं थीं। मंदिर के अंदर श्री लक्ष्मी नारायण की भव्य मूर्तियां स्थापित थीं। मंदिर की भव्यता और सौंदर्य ने मन मोह लिया था।इस मंदिर के बगल से ही एक रास्ता सोमनाथ मंदिर के पीछे बने वाॅक वे पर जाता है। यहां आप पैदल भी जा सकते हैं और ई रिक्शा से भी। यहां पर पांच रुपए एंट्री टिकट लगता है।यदि टिकट लगता है तो व्यवस्था भी अच्छी होती है।हम पैदल चलते हुए अरब सागर को निहार रहे थे।पहले यहां अरब सागर था पर फिर इस स्थान को पक्का करके यहां रोड बना दी गई है। रोड के किनारे भी स्थान को पक्का कर दिया गया है जिससे अरब सागर की लहरें सीधे मंदिर से नहीं टकरातीं। यहां एक और मंदिर निर्माणाधीन हैं।वह अभी बना नहीं था तब ही सुंदर लग रहा था।बनने के बाद तो उसकी खूबसूरती कितनी होगी..पता नहीं कब फिर यहां आना होगा....?

दिन के बारह बज रहे थे।सागर किनारे धूप कुछ ज्यादा ही तेज हो जाती है।धूप अब चुभने लगी थी।वैसे भी यात्रा पूर्णता की ओर थी।अब हमें यहां से होटल जाना था वहां से सामान उठाकर वेरावल जंक्शन।

बहुत ही सुखद रही थी ये यात्रा। बहुत कुछ देखा और जाना। जहां इस यात्रा से आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति हुई वहीं प्रकृति के सान्निध्य ने मन प्रफुल्लित कर दिया।मधुरिम यादें संजोए हम होटल पहुंच गए थे।होटल के रेस्टोरेंट में ही खाना खाया और करीब एक घंटे बाद हम वेरावल के लिए निकल पड़े। बहुत कुछ बदला है।स्टेशन अब साफ सुथरे दिखने लगे हैं।लिफ्ट और एस्केलेटर ने सुविधा जनक कर दिया है प्लेटफार्म पर इधर से उधर जाने का कार्य।सड़कें भी चौड़ी और साफ सुथरी। सोमनाथ मंदिर में एक पूरा मार्केट उन लोगों के लिए बनाया गया है जो सड़क किनारे टपरियों में दुकान लगाते थे। यह मार्केट हर तरह की सुविधा से युक्त हैं।कुल मिलाकर भारत में विकास की बातें कोरी बातें नहीं हैं,विकास करना सरकार की जिम्मेदारी है तो उसे सहेजना और साफ-सुथरा रखना जनता की। दोनों में से एक की भी सहभागिता में कमी विकास में अवरोध उत्पन्न करती है।यह मेरे अपने अनुभव हैं।


समाप्त 


अभिलाषा चौहान 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मनहरण घनाक्षरी छंद

सवैया छंद प्रवाह

सरसी छंद विधान