द्वारका-सोमनाथ
गतांक से आगे
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| नागेश्वर ज्योतिर्लिंग |
बेट द्वारका के रास्ते में ही गोपी तालाब पड़ता है।यह अपना पौराणिक महत्व रखता है।गोपी तालाब पहुंच कर हमने देखा कि यहां बहुत सारे प्राचीन मंदिर है,हर घर में मंदिर हैं।इसका नाम गोपी तालाब क्यों है...?पूछने पर हमें पता चला कि कृष्ण जब द्वारका आए थे तो उनके साथ सारी गोपियां भी आईं थीं और उन्होंने यहीं पर अपना देह त्याग किया था... यह उनके प्रेम और त्याग का अद्भुत उदाहरण था तबसे इसका नाम गोपी तालाब पड़ गया था। यहां की मिट्टी बिल्कुल पीली है जिसे गोपी चंदन के नाम से जाना जाता है।इस पवित्र मिट्टी से बना चंदन भक्त अपने माथे पर लगाते हैं और यहीं चंदन कृष्ण भक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक भी है,तालाब के पास घाट बने हुए थे।हमने घाट पर उतर कर जलांजलि अर्पित की।यह जगह पेड़ों से आच्छादित है और गोपी तीर्थ के रुप में जानी जाती है पर एक बात अखर रही थी कि हमारे भारतवर्ष में ऐसे स्थलों को जो अपना पौराणिक महत्व रखते हैं,उतना महत्व नहीं दिया जाता ,जितना देना चाहिए। यहां एक व्यवस्था होनी चाहिए जो यहां का रखरखाव करे,भले ही इसके लिए टिकट की व्यवस्था की जाए,इतने सुंदर और प्राचीन मंदिर पर लोगों की नासमझी की वजह से उपेक्षित सी लग रही थी।यह मुझे लगा क्योंकि कचरा या गंदगी फैलाते तो लोग हीं है,इन ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों से छेड़छाड़ भी लोग ही करते हैं। सरकार को ऐसे स्थलों पर ध्यान देना चाहिए जहां देशी-विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा रहता है।खैर,यह तो मेरे मन की बात है। हमारे भारत जैसा सुंदर देश नहीं है कहीं,ना ही किसी का इतना पौराणिक महत्व है पर हमारी अपनी ग़लती से यह सुंदर देश अपनी सुंदरता खो रहा है और यह लोगों की नासमझी है या लापरवाही।हमने पढ़ें लिखों को भी देखा जो ना खुद कचरा पात्र में कचरा डालते हैं और ना अपने बच्चों को सिखाते हैं। स्वच्छता का दायित्व सबका होता है।अपने घर से इतर ना सोच पाने वाले पड़ोसी के घर के सामने कचरा फैंकने से बाज नहीं आते और दोषी हमेशा सरकार होती है।
गोपी तालाब से नागेश्वर पहुंचते-पहुंचते हमें चार बज गए थे। पार्किंग से ही महादेव की विशाल मूर्ति जो काफी बड़ी और ऊंची थी ,वह दिखाई दे रही थी,बताया गया कि यह मूर्ति अस्सी फीट ऊंची है।जिसे देखकर लग रहा था कि ध्यानावस्थित महादेव की कृपा हर ओर बरस रही है। उसके समीप ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का लाल पत्थर से बना चमकता भव्य मंदिर दिखाई दे रहा था।'दारुकावने नागेश्वर "के नाम से जाना जाता है यह मंदिर। दारुका नामक राक्षसी का वध महादेव ने किया था और इसी कारण इसका यह नाम पड़ा। यहां शिव और पार्वती नाग-नागिन के रूप में विराजमान हैं। यहां पर नाग-नागिन का जोड़ा पूजा में अर्पित किया जाता है।बारह ज्योतिर्लिंगों में यह दसवें स्थान पर आता है।
मोबाइल ले जाना या कोई भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस प्रतिबंधित थी ।बड़ी संख्या में भक्तजन कतार में लगे थे।हम भी कतार में लग गए थे।आजकल मंदिरों में यह व्यवस्था बहुत बढ़िया है कि आप कतार में ही चल सकते हैं,झुंड बनाकर प्रवेश नहीं कर सकते।कतार के लिए बाकायदा व्यवस्था थी और ऊपर टीन शेड लगे हुए थे।हम मंदिर के मुख्य द्वार के समीप पहुंच चुके थे।मंदिर काफी विशाल था और गर्भगृह में आप तभी जा सकते हैं जब रुद्राभिषेक कराएं।हमने भी रुद्राभिषेक करने का निश्चय किया पर सायंकाल में रुद्राभिषेक नहीं होता तो दूसरी संकल्प पूजा विधि के तहत हमने गर्भगृह में जाकर ज्योतिर्लिंग की पूजा-अर्चना की। यहां पर पुरूषों को धोती पहननी होती है जो मंदिर में आसानी से मिल जाती है।
पूजा-अर्चना के बाद हम प्रांगण में आ गये थे। यहां पर और भी मंदिर बने हुए थे।सामने ही एक विशाल वृक्ष के नीचे पहाड़ के से आकार पर पूरा शिव परिवार विराजमान था।बड़ा ही भव्य नजारा था। मंदिर के पीछे शायद कोई नदी थी या तालाब, वहां का दृश्य बड़ा ही सुन्दर था। प्रांगण में लोग फोटो क्लिक कर रहे थे।हमने सारे मंदिरों के दर्शन किए और बढ़ चले गंतव्य की ओर....होटल अभी दूर था तो रास्ते में ही काठियावाड़ी रेस्टोरेंट में डिनर किया ।होटल पहुंचते-पहुंचते आठ बज गए थे।अब द्वारकाधीश के दर्शन तो संभव नहीं थे,पता नहीं क्यों पर द्वारकाधीश ने अपने आकर्षण में बांध लिया था।उनका वह स्वरूप,वह स्थान जैसे भक्तों के हृदय को लालायित कर देते हैं बार-बार दर्शन के लिए....तो हमने सोचा क्यों ना बाहर से ही मंदिर के सुंदर और अनुपम दृश्य का आनंद उठाया जाए।कदम होटल के अंदर नहीं बल्कि द्वारकाधीश मंदिर की ओर ही बढ़े।करीब दस बजे होटल आए हम लोग....।सुबह सोमनाथ के लिए निकलना भी था।
जब बिस्तर पर लेट मोबाइल देखा तो होश उड़ गए कि अब क्या होगा...? हमने सोमनाथ में जो होटल बुक किया था ,उसने हमारी बुकिंग ही रद्द कर दी थी।नींद उड़ गई थी।बड़ी मुश्किल से पहले ही यह होटल मिला था बजट के अनुसार।दूसरे हर कहीं रुक नहीं सकते, क्योंकि हर जगह साफ-सुथरी नहीं होती....पति की हैल्थ कंडीशन के कारण थोड़ा इस ओर ज्यादा ध्यान देना पड़ता है।
हमने तुरंत होटल वाले को फोन किया और पूछा कि आप हमारी बुकिंग कैसे कैंसल कर सकते हैं..?अब हमें इतनी जल्दी होटल कहां मिलेगा....?
उसने कहा कि आपको होटल नहीं मिलेगा क्योंकि प्रधानमंत्री जी सोमनाथ आ रहे हैं तो अधिकतर बुकिंग कैंसिल कर दी गई हैं...! हमें होटल के कमरे सरकार को देने पड़ते हैं उनके अधिकारियों के लिए।यह अप्रत्याशित था...वह कुछ नहीं कर सकते थे।हमने पूछा भी कि आप कहीं व्यवस्था करवा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यहां पर सारे होटल फुल है और शहर में जाना बहुत मुश्किल क्योंकि सुरक्षा के कड़े इंतजाम हैं।रुकने को तो द्वारका में रुक जाते पर उसने भी अगले दिन के लिए कमरे बुक कर लिए थे तो हमें तो दस बजे चेक आउट करना ही था।अब क्या करें...?
गाड़ी आ गई थी। उसमें सामान रख दिया और चल पड़े। ड्राइवर ने पूछा कि सोमनाथ ही चलना है ना..!
हमने उसे सारी बात बताई।"ओह!!वह अपने जानकारों को फोन करने लगा।टैक्सी ड्राइवरों की होटल वालों से सेटिंग होती है। तीन-चार फोन करने के बाद वह भी यही बोला-"मैडम!अच्छे होटल फुल हैं और आज और कल कहीं बुकिंग नहीं हो सकती।"
"तो फिर क्या करें...?आप ही बताओ।"हमने पूछा ।
"मैडम !गिर राष्ट्रीय उद्यान गए हैं क्या आप...?आपको वहां जंगल के बीच स्टे करना चाहिए।"
गिर तो शामिल ही नहीं था योजना में,हम सब सोच में पड़ गए...रास्ता भी नहीं था कोई... सोमनाथ के दर्शन किए बिना लौटना भी अच्छा नहीं लग रहा था।वंदे भारत से टिकट भी बुक था अगले दिन का।
"अरे आप लोग इतना क्यों सोच रहे...!!आपको बढ़िया से रिसोर्ट में लेकर चलूंगा।अपने जानकार का है।आपको अच्छा लगेगा,अब यहां तक आए हैं तो गिर अभ्यारण भी घूम लीजिए।"वह बोले जा रहा था और हम सोच रहे थे कि यह कमीशन का खेल, खेल रहा है ।
फिर सबसे पहले हमने टिकट कैंसिल कर एक दो दिन बाद के टिकट बुक कराए और चल दिए"गिर अभ्यारण "की ओर,अब यह भी देख ही लेते हैं।हम निकले तो सोमनाथ से ही... यहां से शासनगिर की दूरी करीब सत्तर किलोमीटर थी। अच्छा -खासा समय लगने वाला था। ड्राइवर ही जानता था रास्ता अपने हिसाब से वह शोर्ट कट के चक्कर में हमें गांवों के बीच से ले जाने लगा...उफ़!!!वो रास्ते जो बारिश ने धो दिए थे,बस गड्ढे ही गड्ढे....लग ही नहीं रहा था कि हम कार में हैं, बैलगाड़ी जैसी अनुभूति हो रही थी।
क्रमशः
अभिलाषा चौहान

आपका वर्णन इतना सजीव है कि पढ़ते हुए लग रहा है जैसे हम भी आपके साथ इस यात्रा में हैं और आपके साथ ही विविध अनुभवों को ले रहे हैं। कड़ी-दर-कड़ी उत्सुकता बढ़ती जा रही है।
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