द्वारका-सोमनाथ
गतांक से आगे
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| सोने की द्वारका |
द्वारकाधीश के मंदिर से लगभग दो-ढाई किलोमीटर दूर रुक्मिणी जी का मंदिर था।हम वहां दर्शन करने गए।मंदिर का स्थापत्य कुछ-कुछ द्वारकाधीश मंदिर जैसा ही था। यहां पर पानी के लिए दान किया जाता है वो भी श्रद्धानुसार, क्योंकि यहां पानी खारा है और जो वहां के रहवासी हैं,उनके लिए मीठा पानी लाने की व्यवस्था में इस दान का योगदान होता है।अरब सागर के किनारे बने इन मंदिरों में सागर के खारे पानी और नमी ने कोई असर नहीं डाला है पर नवनिर्मित होटलों पर इसकी छाप दिखाई देती है।माता रुक्मिणी जी का मंदिर अत्यंत भव्य और सुंदर था।हमारे मंदिर चाहे कितने ही पुराने क्यों ना हो,सबकी अपनी कहानी है पर यही हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत है।यही हमारी सनातनता का प्रतीक हैं।
इसके बाद हम गीता भवन मंदिर गए। कृष्ण और राधा की भव्य प्रतिमाएं स्थापित थीं। यहां पर अठारह खंभों पर भगवद्गीता के अध्याय अंकित हैं।यह मंदिर भी गोमती नदी के तट स्थित है।यह बिरला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।इसे बिरला परिवार द्वारा बनवाया गया था।इसके अलावा हमने सिद्धेश्वर महादेव मंदिर और पंचमुखी हनुमान मंदिर के भी दर्शन किए।ये पल आध्यात्मिक चेतना और परमानंद की अनुभूति कराने वाले थे।
शाम हो चुकी थी ,मन अभी भी स्वर्ग द्वार में उलझा था ।छप्पन सीढ़ियां चढ़कर जगत शिरोमणि द्वारकाधीश के दर्शन करने की आतुरता चरम पर थी।पूछते-पूछते हम स्वर्ग द्वार की ओर चल दिए।बाजार से होते हुए हम गोमती घाट के किनारे ही पहुंच गए थे। यहां भी बहुत भीड़ थी, क्यों ना होती मान्यता ही ऐसी है पर यहां सुरक्षा के लिए ज्यादा इंतजाम नहीं थे।सामान तो पहले ही रखवा लेते हैं पर यहां भीड़ की अपनी व्यवस्था थी।दिख ही नहीं रहा था कि सीढ़ियां आखिर हैं कहां...?बस लोगों का हुजूम....मन डरा कि इतनी भीड़ में फंसना तो बेवकूफी है सो हम किनारे की ओर हो लिए... धीरे-धीरे हम आगे बढ़ रहे थे....पता चला कि यह समय शयन आरती का है...शयन आरती...?तो क्या हम वंचित रह जाएंगे द्वारकाधीश के दिव्य दर्शन से...?पर भीड़ सरकने लगी थी और फिर ज्यादा समय नहीं लगा और हम थोड़ी ही देर में मंदिर प्रांगण में पहुंच गए थे। दर्शन का यह आखिरी दौर था।जगत के स्वामी अब शयन करने वाले थे.....हम दर्शन कर होटल की ओर चल दिए।
एक बात और यहां खाना बहुत बढ़िया मिलता है। अनलिमिटेड थाली और लोटा भरकर छाछ,आप जितनी चाहे उतनी छाछ पियो । रात्रि विश्राम के बाद हमें अगले दिन बेट द्वारका जाना था।
सुबह आठ बजे हम तैयार हो गए।टैक्सी वाला हमें शिवराज पुर बीच ले गया।यह बीच बहुत ही साफ-सुथरा था।इसी कारण इसे ब्लू फ्लैग मिला हुआ है। दूर-दूर तक फैला अरब सागर और उसमें तैरती नौकाएं बहुत ही सुन्दर लग रहीं थीं। यहां कोरल बीच भी है जहां हमने काफी सीपियां एकत्र की।इसके बाद हम बेट द्वारका की ओर चल पड़े थे। वहां पहले नौका चलतीं थीं जिनसे बेट द्वारका तक पहुंचा जा सकता था। लेकिन अब सुदर्शन सेतु का निर्माण हो गया है।यह सेतु बड़ा ही सुन्दर है।इसपर बनी मोर पंख की आकृतियां सुदर्शन नाम सार्थक कर रहीं थीं।इस पर गीता के श्लोक भी अंकित है। लोगों के लिए यह सेल्फी पोइंट बन गया है।लोग गाडियां रोककर सेल्फी खींच रहे थे। हमारे ड्राइवर भैया ने बताया कि यह एक्सीडेंट का सबसे बड़ा कारण है कि लोग बीच रोड़ पर खड़े होकर सेल्फी लेंते है जबकि इन्हें पैदल चलने वालों के लिए बनाए गए पाथ वे पर अपने शौक पूरे करने चाहिए।बात थी तो सौ फीसदी सही....तेजी से गुजरती गाडियां और उसके बीच में ऐसे ही गाड़ी रोककर खड़ा होना अनहोनी को आमंत्रण है।
अब हमारी यात्रा ई रिक्शा से होनी थी क्योंकि गलियां बहुत संकरी थी।हमें उसने द्वारकाधीश के मुख्य मंदिर के पास उतार दिया था।बेट द्वारका को भगवान श्री कृष्ण का मूल निवास माना जाता है। यह कच्छ की खाड़ी के पास स्थित है जो ओखा जिले में आता है। यहां पर बना मंदिर भी अत्यंत भव्य और विशाल था। यहां पर चावलों का दान ही किया जाता है और प्रसाद रूप में भी चावल ही मिलते हैं।सुदामा जी का मंदिर भी बना हुआ है क्योंकि सुदामा जी ही तीन मुट्ठी चावल लेकर भगवान के द्वार पर आए थे। यहां भी कतार थी और मंदिर प्रांगण में भारी भीड़.... यहां पर छोटे-छोटे मंदिर भी बने हुए थे जिनमें कृष्ण के हर स्वरूप की प्रतिमा स्थापित थीं।माता देवकी और यशोदा की भी प्रतिमाएं थीं।हम लोग द्वारकाधीश के दर्शन कर बाहर आ गए थे।इस यात्रा में हमने जो अनुभूत किया ,वह था युवाओं में सनातन के प्रति बढ़ती आस्था...हम जहां भी गए , वहां युवा ज्यादा थे।उनका उत्साह और उल्लास देखते ही बनता था।यह सनातन की जागृति और सांस्कृतिक चेतना के उत्थान का काल है,ऐसा लग रहा था।
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| आशा पूर्णा माता |
पास में ही नवनिर्मित सोने की द्वारका थी।विशाल प्रांगण में स्थापित दो मंजिला भवन में प्रवेश करते ही ऐसा लगा कि जैसे हम वास्तव में सोने की द्वारका में आ गए.... यहां पर श्री कृष्ण के जीवन काल से संबंधित हर दृश्य प्रत्यक्ष था।उन सभी ऋषि मुनियों की ,कृष्ण की लीलाओं की झांकियां बनी हुई थी।इस मंदिर की दीवारों और छत पर सुंदर नक्काशी थी, इसके खंभे स्वर्णिम आभा से युक्त थे ....गलियारे में घूमते हुए आपकी पलकें इस सौंदर्य को देख झपकना भूल जाती हैं।भवन के बीच में शेषनाग की शैया पर भगवान विष्णु विराजमान थे।सबकुछ अद्वितीय, अनिर्वचनीय था।कृष्ण का पूरा जीवन चरित्र और उनकी लीलाएं भक्तों के अंतर्तम में समाहित हो जाती है।अब हमें जाना था आशा पूर्णा देवी मंदिर और मकरध्वज हनुमान मंदिर ।
मकरध्वज हनुमान मंदिर भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां हनुमानजी अपने पुत्र मकरध्वज के साथ विराजमान हैं। बहुत सुंदर जगह थी ये,बरगद पीपल और नीम के वृक्ष से घिरा मंदिर का प्रांगण और समुद्र के बिल्कुल किनारे.... यहीं पर आशा पूर्णा माता का भी मंदिर है ,ये चौहानों की कुलदेवी हैं। मंदिर के पास भी भंडारा चल रहा था। प्रतिदिन काफी संख्या में लोग यहां आते हैं और दर्शन के बाद प्रसादी ग्रहण करते हैं। यहां तक कि हमारी सारी यात्रा ई रिक्शा में ही हुई थी।बड़े वाहन यहां नहीं आ पाते.... लेकिन लगता है कि वह समय भी जल्दी आ जाएगा क्योंकि रोड का निर्माण कार्य चल रहा था । धार्मिक स्थलों के विकास का कार्य भी चल है।अब लौटने का समय हो गया था।भव्यता और दिव्यता को पलकों में समाए और आध्यात्मिक आनंद को हृदय में समाहित कर हम चल पड़े थे अपने अगले पड़ाव की ओर "नागेश्वर ज्योतिर्लिंग"जो यहां से पंद्रह -सोलह किलोमीटर दूर था।
क्रमशः
अभिलाषा चौहान


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