द्वारका-सोमनाथ
भारत के चार धामों में प्रमुख द्वारका गुजरात में स्थित है।इस बार हम भी द्वारका दर्शन के लिए गए।द्वारका नाम सुनते ही मन भक्ति भाव से भर उठता है।इस पावन भूमि पर पहुंचते ही मन शांत और प्रसन्न हो उठा।हवा में भी श्री कृष्ण की भक्ति प्रवाहित हो रही थी।हम अहमदाबाद से वंदे भारत से द्वारका पहुंचे थे।वंदे भारत से सफर बहुत आसान,सुगम और समय को बचाने वाला हो गया है।
द्वारकाधीश मंदिर के समीप ही होटल था हमारा। नहा-धोकर हम श्री द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन के लिए निकल पड़े पर वहां बहुत भीड़ थी। लंबी-लंबी कतारें लगी थीं।हम भी कतार में खड़े हो गए। यहां सुरक्षा के बहुत इंतजाम थे।आप कोई सामान अंदर नहीं ले जा सकते।मंदिर दूर से ही दिखाई दे रहा था।उसपर लहराता ध्वज सनातन धर्म की दिव्यता का संदेश दे रहा था। यहां पर दो द्वार हैं।स्वर्ग द्वार और मोक्ष द्वार।जब हम मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचे तो पता चला कि हम मोक्ष द्वार से अंदर आए हैं।तो स्वर्ग द्वार कहां है....?पता करने ज्ञात हुआ कि स्वर्ग द्वार गोमती घाट के पास स्थित है और वहां छप्पन सीढ़ियां हैं जिनको पार कर मंदिर में प्रवेश किया जाता है ।मान्यता है कि स्वर्ग द्वार से प्रवेश कर मोक्ष द्वार से निकलना चाहिए पर अब तो कतार में थे।मन भाव विभोर हो रहा था।लोग जयकारे लगा रहे थे।कतार में चलते-फिरते हम मुख्य मंदिर के अंदर प्रवेश कर चुके थे। द्वारकाधीश की भव्य प्रतिमा हमारे सामने थी। आंखें दर्शन कर भीग उठी थीं। जन्मों की प्रतीक्षा सार्थक हो उठी थीं। पलकें झपकना भूल गई थी।राजसी ठाट-बाट से सजे श्री द्वारकाधीश जी की नयनाभिराम छवि,दिव्यता की पराकाष्ठा,मोहक मनभावन स्वरूप अतुलित आनंद की अनुभूति करा रहा था। मंदिर का शिल्प अनूठा था। सनातन की गरिमा का प्रतीक ,हृदय में सनातनी होने का गौरव और बढ़ गया था।हमारा सनातन धर्म शाश्वत है। संपूर्ण विश्व में इसकी आभा व्याप्त है।देशी पर्यटकों के साथ ही विदेशी पर्यटकों की बड़ी संख्या इसका अहसास कराती है,कृष्ण सर्वव्यापी है,सबको बांध लेते हैं।हमने अमेरिका में भी भव्य और विशाल मंदिर देखे, कहां नहीं है हमारे मंदिर...!!सनातन को जितना मिटाने की कोशिश की गई,यह उतनी ही भव्यता और दिव्यता से शीश उठाकर खड़ा हुआ।
इस मंदिर का निर्माण श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने कराया था।यह चालुक्य शैली में चूना पत्थर से बना पांच मंजिला मंदिर है। आक्रमण कारियों ने मंदिर को क्षति पहुंचाने का अक्षम्य कार्य किया पर यह मंदिर शीश उठाए खड़ा रहा।इसकी दिव्य ध्वजा जिसे दिन में पांच बार बदला जाता है,सनातन चेतना और उसकी शाश्वतता की संवाहक है।जगत मंदिर के रूप में विख्यात यह मंदिर भक्त और भगवान के मध्य की दूरी मिटाकर आत्मा और परमात्मा को एकाकार करता है।हम प्रांगण में आ गए थे। यहां और भी मंदिर बने हुए थे।हमने सबके दर्शन किए।तभी मंदिर के शिखर पर ध्वज पताका बदलना प्रारंभ हुई।यह सब बहुत ही विस्मयकारी था। प्रांगण में भजन हो रहे थे,भक्त जयकारे लगाते आसमान की ओर ताक रहे थे।ध्वज को पांच बार बदलना कितना मुश्किल होता होगा...?मेरे तो पैर कांप रहे थे....इतनी ऊंचाई पर दो व्यक्ति बावन फिट लंबी ध्वजा को बदल रहे थे,हे जगत शिरोमणि इनकी रक्षा करना....मन यही जप रहा था,मालुम था यह उनका रोज का कार्य है पर फिर भी भय का अहसास हो रहा था और क्यों ना हो....मुझे ऊंचाई से डर लगता है,अपने लिए नहीं बल्कि सबके लिए।यह उनका रोज का काम है।थोड़ी देर में ही पंचरंगी ध्वजा लहराने लगी थी।
मंदिर के पास ही मार्केट था,मार्केट घूमते हुए हम लोग लंच करके होटल आ गए।घूमने जाओ तो होटल में मन कहां लगता है....जो लोग रुकना चाहते थे वो रुके...हम लोग पैदल ही गोमती घाट की ओर निकल गए, वहां एक कुंड था जो शायद कभी स्वच्छ जल से भरा रहता होगा.... लेकिन अभी उसमें गंदगी का साम्राज्य था....गंदगी करता कौन है...?हम लोग ही...? क्योंकि हम अपने देश को सुंदर रख नहीं सकते...!!हर कार्य का उत्तर दायित्व सरकार है,यही सोचकर यहां -वहां कचरा फेंकना हमारी आदत बन गई है। जहां एक ओर मन जगत शिरोमणि के दर्शन से प्रफुल्लित था , वहीं दूसरी और यह गंदगी मन को क्षुब्ध कर रही थी।यह सिर्फ द्वारका की समस्या नहीं है। स्वच्छता अभियान में असफलता का प्रतीक है।जब तक देश का प्रत्येक नागरिक जागरूक नहीं होगा तब तक देश कचरागाह बना रहेगा।
गोमती घाट के किनारे चलते-चलते हम संगम नारायण या समुद्र नारायण के मंदिर पहुंच गए थे। यहां पर गोमती नदी का अरब सागर में संगम होता है।बड़ा ही विहंगम दृश्य था। दूर-दूर तक अरब सागर का विस्तार एक अनोखी अनुभूति करा रहा था।घाट पर ही गोमती माता का मंदिर भी था, जिनके दर्शन पाकर जीवन धन्य हो गया।किलोल करते पक्षी दृश्य को और भी सुंदर बना रहे थे।हमने घाट पर जल का स्पर्श कर माता का आशीर्वाद लिया। यहां शाम को गोमती मैया की आरती भी होती है। चलते-चलते हम भड़केश्वर महादेव मंदिर पहुंच गए थे। यहां विशाल शिवलिंग स्थापित है।कहते हैं यह स्वयंभू शिवलिंग है,अरब सागर की लहरें इसका स्पर्श करने को आतुर रहतीं हैं। बहुत ही मनभावन था यहां का नजारा पर थोड़ा सा मन खराब भी हुआ , व्यवस्था को देखकर...वैसे कार्य चल रहा है पर समुद्र का खारा पानी और रेत वहां निर्माणाधीन स्थलों पर अपनी छाप छोड़ रहा था। आश्चर्य की बात है जो नवनिर्मित स्थान थे उनपर नमक और सीलन थी लेकिन महादेव का शिवलिंग जस का तस था।
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| द्वारकाधीश मंदिर |
क्रमशः


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