माउंट आबू यादगार पल -३
चाय पीने के बाद बारिश थोड़ी थम सी गई थी।ये तो समझ आ गया था कि यह बारिश बादलों के अत्यधिक नीचे होने के कारण हो रही थी, हमें अस्सी सीढ़ियां और चढ़नी थी। सीढ़ियां गीली होने के कारण फिसलन हो गई थी।हम ऊपर पहुंचे तो कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।यह मंदिर भी गुफा में ही बना हुआ था।भीड़ नहीं थी तो दर्शन बड़े ही आराम से हो गए। भगवान दत्तात्रेय की सुंदर प्रतिमा सामने थी।मन भक्ति भाव से भर उठा था। दर्शन कर हम लोग नीचे उतर आए।इस समय आबू का मौसम बहुत ही खुशगवार था। हमें इल्म ही नहीं था कि राजस्थान में हैं,ऐसा लग रहा था कि हम शायद हिमाचल के किसी हिल स्टेशन पर हैं।
इसके बाद ड्राइवर ने एक जगह गाड़ी रोक दी।हम चौंक गए... यहां क्यों....?उसने कहा कि यह तो सेल्फी पोइंट है।इसे हनीमून पोइंट (honeymoon point abu)भी कहते हैं।सड़क से थोड़ी ऊंचाई पर ढलानदार पहाड़ी थी,जहां लोग
सेल्फी खींच रहे थे। ड्राईवर ने बताया कि यहां पर फिल्मों की शूटिंग भी हुई है।जगह अच्छी थी पर इस समय तेज ठंडी हवा चल रही थी, जिससे थोड़ी ही देर रुक सके वहां.....बादल तो साथ ही चल रहे थे,इसके बाद हम पीस पार्क आ गए।यह स्थान बहुत ही सुन्दर था। यहां इतनी हरियाली और शांति थी कि मन प्रसन्न हो उठा।यह पीस पार्क ब्रह्मकुमारी आर्गनाइजेशन ने बनवाया है।आबू रोड पर उनका मुख्यालय भी है। यहां पर हमें संसार में आने का उद्देश्य और सनातन के प्रति हमारे कर्तव्य का बोध कराया गया।यह आश्रम या यूं कहें यह आर्गनाइजेशन पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित है। संपूर्ण विश्व में इसकी शाखाएं हैं।यह जगह वास्तव में आध्यात्मिकता का केन्द्र बिंदू है। ब्रह्मकुमारी आर्गनाइजेशन आध्यात्मिकता के प्रचार-प्रसार के साथ सनातन धर्म के उत्थान और समाज-कल्याण के कार्य करती है।
यहां हमने एक घंटा बिताया।इसके बाद देलवाड़ा जैन मंदिर पहुंच गए। देलवाड़ा जैन मंदिर (delwara jain temple) श्वेतांबर जैन मंदिरों का समूह है।यह मंदिर अत्यंत विशाल क्षेत्र में स्थापित है।इनका निर्माण ग्यारहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच हुआ था।विमल वसाही यहां का सबसे प्राचीन मंदिर है।श्वेत संगमरमर से निर्मित यह मंदिर अपनी अनूठी शिल्पकला के लिए विख्यात है। ये मंदिर पंच तीर्थ के रूप में भी जाने जाते हैं।इनके निर्माता विमल,वास्तुपाल और तेजपाल थे।
विमल जैन गुर्जर सोलंकी राजा भीम प्रथम के मंत्री थे। वहां वास्तुपाल और तेजपाल के मंदिर भी बने हुए हैं। यहां पर उन हाथियों की भी प्रतिमा है जो समतल से पहाड़ पर संगमरमर का पत्थर लेकर जाते थे।पहाड़ी पर उस समय पत्थर पहुंचाना आसान नहीं था इसलिए हाथियों के द्वारा ही पत्थर ऊपर ले जाया जाता था।यह उन प्रतिमाओं के पास शिलालेख पर अंकित था।सारे मंदिर शिल्पकला की दृष्टि से अद्वितीय हैं और भारतीय संस्कृति की अनुपम धरोहर है। मंदिर घूमने में हमें करीबन दो घंटे का समय लगा। भगवान तीर्थंकर स्वामी की प्रतिमा अद्भुत अद्वितीय थीं।पूरा परिसर ही आध्यात्मिक चेतना से ओत-प्रोत था। यहां सिक्योरिटी बहुत थीं।सारे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस,पर्स, पानी की बोतल भी बाहर ही रखवा दी गई थी। मंदिर परिसर में शोर मचाने की मनाही थी।यह शांति अद्भुत थी।श्वेत संगमरमर की छटा आंखों को शीतलता प्रदान कर रही थी।कितने कुशल थे हमारे यहां के पुरातन लोग...कितनी भव्य है हमारी धरोहर...जो हमें पल-पल आभास कराती है कि हम सबसे प्राचीन सभ्यता हैं।विश्व की सबसे उन्नत सभ्यता थे हम।ज्ञान, ध्यान,योग, निर्माण , यहां तक जीवन जीने का उद्देश्य हमारी सनातन संस्कृति की देन था। हमारे यहां विश्व के सबसे प्राचीन मंदिर है,उनकी स्थापत्य कला और शैली बेजोड़ है।यह हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव था।हमने यहां प्राकृतिक, आध्यात्मिक चेतना का लाभ उठाया।सुंदर दृश्य देखे... लेकिन वर्तमान में की जा रही इन स्थलों की उपेक्षा ने दिल भी दुखाया। हमें अब यह सीखना होगा कि यह हमारी धरोहर है,इसके संरक्षण का दायित्व सिर्फ सरकार का मानकर हम अपनी गलतियों से मुख नहीं फेर सकते।हम कुछ ना करें तो कम से कम इन प्राकृतिक स्थलों को गंदा तो ना करें।ये हमारे जीवन के स्त्रोत है और हम लापरवाही से यहां-वहां गंदगी करते हैं और फिर सरकार को कोसते हैं।यह हमारा दायित्व है कि पर्यावरण सुरक्षित रहें। हमें अपने इस कर्तव्य को पहचानना और अपनाना होगा।
समाप्त
अभिलाषा चौहान


सुंदर
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