यात्रा भव्यता से दिव्यता तक




यात्राएं मन को आह्लादित करती हैं। अनुभव देती हैं और खुद से परे सोचने पर विवश करती हैं।यदि ये यात्राएं धार्मिक स्थलों से जुड़ी हों तो आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति कराती हैं।ऐसी ही यात्रा की हमने अभी..."प्रयागराज,वाराणसी और अयोध्या "की।

सनातन और शाश्वत का संगम इन धार्मिक नगरियों में देखने को मिला,जो अद्वितीय और अलौकिक था।हम क्षणभंगुर इंसान उस परम सत्य की अनुभूति वहीं जाकर कर पाते हैं।हम आज हैं और कल नहीं होंगे पर हमारे सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्रबिंदु तब भी थे जब आततायी इन्हें मिटाने की कोशिश कर रहे थे और आज भी हैं और हमेशा रहेंगे।भारत के अतुलनीय वैभव को सहेजे इन्हीं स्थलों में एकता और अखंडता के दिव्य दर्शन होते हैं।

राजनीतिक प्रपंचों से रहित, जातिगत भेदभाव से ऊपर और अमीर-गरीब के पाखंड से रहित ये स्थल एक पल में सांस्कृतिक समागम की भव्यता के दर्शनीय स्थल बन जाते हैं।बस एक ही चेतना सर्वत्र व्याप्त हो जाती है जो है अहम के विसर्जन की....बस अपने अंतर में आराध्य के दर्शन की ललक लिए दीन-दुनिया से बेखबर हर इंसान बस भक्त बन जाता है।यही दिव्यता उस भव्यता को प्रकट करती है जिसने आर्यावर्त को अभी भी जीवंत बना रखा है।यह कालखंड सांस्कृतिक पुनःजागरण का है।भारत के सभी धार्मिक स्थल एकता का मूल है।हमारी अक्षुण्ण एकता के संवाहक हैं। आश्चर्य होता है इन्हें देखकर कि कितने प्रवीण थे इन्हें निर्मित करने वाले...बिना साधन के उस कालखड में इनका निर्माण कितना दुष्कर रहा होगा..? पहाड़ों की चोटी पर बने हों या गुफाओं में या फिर समतल में,इनकी शिल्पकला की बारीकी मन मोह लेती है।इनका वैभव अतुलनीय है। इसीलिए आक्रांताओं ने हमारे मंदिरों को निशाना बनाया। इन्होंने हमारी सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने की भरसक कोशिश की पर ये सफल नहीं हो पाए।

जब हम यात्रा पर गए तो देखा लोगों का वह रूप जिसमें कहीं भी कलुषता नहीं थी। भक्ति का उन्माद और ईष्ट के प्रति श्रद्धा उन्हें किस तरह जोड़ रही थी। घंटों-घंटों लाइन में खड़े,नंगे पैर चलते,दंडवत प्रणाम करते चलते हुए,असाध्य सीढ़ियों को रुक-रुक कर चढ़ते हुए ये लोग वहां सब भूल जाते हैं लेकिन सामाजिक जीवन में आते ही फिर एक दायरे में कैद हो जाते हैं।

इस यात्रा में हमारा पहला पड़ाव तीर्थराज प्रयागराज था।हवा में ही जैसे भक्ति का संचार हो रहा था।सबसे पहले हम संगम तट पहुंचे....त्रिवेणी संगम पर अभी भी मेला सा लगा हुआ था।जाने कहां-कहां से लोग आए हुए थे। गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम जहां मन निर्मल हो जाता है। कल-कल बहती जलधारा और किलोल करते पक्षी मन को जैसे बांध लेते हैं।संगम में स्नान करते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे मां की गोद में समा गए हों।नौका वालों की अपनी व्यवस्था है तो पूजा-पाठ कराने वालों की अपनी।सारी व्यवस्था बनी हुई हैं। बीच-बीच में जल पुलिस का निरीक्षण भी चलता रहता है।


संगम की झलक


यहीं पर अकबर फोर्ट है।फोर्ट मिलट्री के अंडर में है।
यह जनता जनार्दन के लिए नहीं खुला है। लेकिन यहां "अक्षय वट" है ।कहते हैं कि वनवास गमन के समय प्रभु श्रीराम और माता सीता और लक्ष्मण ने यहां विश्राम किया था। यह मोक्ष का द्वार भी है। मान्यता है कि प्रलयकाल में भी इस वृक्ष का अस्तित्व विद्यमान था
विशालकाय वटवृक्ष जिसे देख ऐसा लगता है जैसे पेड़ों का समूह हो।उसके नीचे छोटा सा मंदिर हैं।यह किले के प्रांगण में स्थित है। जहां जाकर आप आराम से इसका दर्शन कर सकते हैं। यहां पर भी मिलट्री का पहरा है।



अक्षय वट और अकबर फोर्ट 


अक्षयवट का दर्शन कर हमने बड़े हनुमान मंदिर,अलोपी देवी शक्तिपीठ, नागवासुकी मंदिर के दर्शन किए।इन सब धार्मिक स्थलों पर अच्छी-खासी भीड़ थी।यहां पर नवनिर्मित नवग्रह मंदिर भी है जिसके विशाल परिसर में कई मंदिर हैं।गंगावतरण,नवग्रह मंदिर,खाटूश्याम,सालासर बालाजी,राधाकृष्ण,सियाराम सभी के मंदिर बने हुए हैं।इसी के पास प्राचीन हनुमान मंदिर भी है।

अलोपी देवी शक्तिपीठ 


नाग वासुकि मंदिर 


नवग्रह मंदिर 





वैसे भी प्रयागराज हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। यहीं पर पिछले वर्ष जब महाकुंभ हुआ था तब भी हम गए थे पर तब हम इन धार्मिक स्थलों का दर्शन नहीं कर पाए थे क्योंकि उस समय पैर रखने की जगह नहीं थी। लेकिन मेला तो अब भी था।उतनी भीड़ ना भी हो पर संगम तट पर लोगों का हुजूम विद्यमान था।ऐसे तो प्रयागराज में और भी दर्शनीय स्थल हैं पर हम सिर्फ आजाद ही गए।यह वह स्थली है जहां चंद्रशेखर आजाद ने अपना बलिदान दिया था।यह पार्क बहुत बड़ा है जिसे घूमना है तो कम से कम तीन-चार घंटे चाहिए।हरियाली से आच्छादित इस पार्क में चन्द्रशेखर आजाद की विशालकाय प्रतिमा है।जिसके समीप बैठने पर मन शांत हो जाता है और यह सोचने पर बाध्य हो जाता है कि हमारी स्वतंत्रता हमें ऐसे ही नहीं मिली,इसके पीछे कितने त्याग और बलिदान निहित हैं।


चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा





प्रयागराज पहले कैसा था..?यह तो पता नहीं पर वहां के लोगों के हिसाब से अब प्रयाग बदल गया है।विकास की लहर ने प्रयाग को भी बदला है।बढ़िया हाइवे,बढ़िया रेलवे स्टेशन और देश के अन्य स्थानों से कनेक्टिविटी ने प्रयाग को पर्यटन स्थल भी बना दिया है।



क्रमशः 

अभिलाषा चौहान 


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