ऐसा भी व्यापार किया




काम क्रोध मद लोभ चढ़ा सिर

नैतिकता को त्याग दिया

घोला ऐसा विष जीवन में 

पैर कुल्हाड़ा मार लिया।


संबंधों पर डाली मिट्टी

और पतन की राह चले

मादकता में ऐसे डूबे

पालक भी कब लगे भले

भूल गए उन संस्कारों को

कब उनका सम्मान किया।


डोल रहें हैं लिए तराजू

पैसों को बस तोल रहे

जिससे स्वारथ निकले अपना

मीठा उससे बोल रहे

अँधियारा मन में छाया है

ज्ञान दीप का बुझा दिया।


धूप बेचते इनको देखा

छाँव छीनते हैं सिर की

रक्त चूसते बस औरों का

बातों की छोड़ें फिरकी

दूध फटे का मोल लगाया

ऐसा भी व्यापार किया।


अभिलाषा चौहान 


टिप्पणियाँ

  1. सत्य एवं सार्थक रचना

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  2. बहुत ही सुन्दर रचना

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत खूब अभिलाषा जी ! लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसे सैकड़ों-हज़ारों गुणवानों को हम करोड़ों लोगों ने अपना-अपना प्रतिनिधि क्यों चुना?

    जवाब देंहटाएं

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