हिंदी भाषा और अशुद्धिकरण की समस्या-3

गतांक से आगे-
वर्तनी की अशुद्धि से शब्द का अर्थ ही नहीं बदलता बल्कि उसका सौंदर्य भी नष्ट हो जाता है।इसके बाद यदि वाक्य में शब्द का अन्वय सही नहीं है तो वाक्य अशुद्ध हो जाता है।मुझे यह जान कर दुख होता है कि जिस भाषा को काव्य की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपना जीवन समर्पित कर दिया ,आज उसी हिंदी भाषा में गद्य और पद्य दोनों में त्रुटियों का समावेश हो चुका है।कितना अथक परिश्रम किया था उन्होंने ,संपादक का पूर्ण दायित्व निभाते हुए प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक तो  बने ही, पुनर्जागरण काल के प्रणेता थे वे। खड़ी बोली को काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
सरस्वती पत्रिका का संपादन कार्य‌‌‌ सम्हालने
के साथ ही उन्होंने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार का कार्य भार सम्हाल लिया।पत्रिका में जितनी भी रचनाएं प्रकाशित होती,उनकी वर्तनी और व्याकरणिक अशुद्धियों को वे जब तक शुद्ध न कर लेते तब तक पत्रिका में
प्रकाशित नहीं करते थे,उन्होंने कवियों को खड़ी बोली में काव्य रचना के लिए प्रोत्साहित किया। अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध द्वारा रचित "प्रियप्रवास'' खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है।राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त इस युग की ही देन हैं।इन दोनों कवियों की भाषा का सौंदर्य देखते ही बनता है।शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का अनुपम उदाहरण हैं इनकी रचनाएँ।इसके बाद हिंदी भाषा में सौंदर्य निखरता गया जो बाद में छायावाद में चरम पर दिखाई देता है।मेरे यह सब कहने का तात्पर्य यह नहीं कि हिंदी भाषा का सौंदर्य नष्ट हो गया है बल्कि अशुद्ध उच्चारण और अशुद्ध लेखन से उसका मूल सौंदर्य नष्ट हो रहा है।भाषा हमेशा परिवर्तन शील होती है ,समय के साथ उसमें परिवर्तन होते हैं,जो साहित्य की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होती है ,वह बोल-चाल की भाषा से अलग होती है।आंचलिकता का समावेश और विदेशज शब्दों का प्रयोग होने से उसका रूप बदल जाता है। लेकिन फिर भी हम घूम-फिर कर वहीं आ जाते हैं ।अशुद्धिकरण पर ।यह एक बहुत बड़ी समस्या है।
जिन्होंने विद्यार्थी जीवन में हिंदी भाषा को महत्व नहीं दिया और उसके व्याकरणिक पक्ष पर ध्यान नहीं दिया ,आज वे जब लेखन,प्रकाशन,सरकारी सेवा या किसी भी कार्य क्षेत्र से जुड़े हैं,ऐसी अशुद्धियाँ कर जाते हैं क्योंकि उन्हें हिंदी का व्यावहारिक ज्ञान नहीं है।

क्रमशः

अभिलाषा चौहान
स्वरचित मौलिक

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